बिजनेस स्टैंडर्ड - हकीकत से दूर है सत्ता की मानसिकता
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हकीकत से दूर है सत्ता की मानसिकता

देवाशिष बसु /  December 31, 2019

भारत में शासन करने का पहला नियम यह है कि जन प्रतिनिधि सत्ता में आते ही जनता की बातें सुनना बंद कर देते हैं। दूसरा नियम यह है कि कोई समूह जितने लंबे समय तक सत्ता में रहता है, उतना ही अहंकारी और हकीकत से दूर होता जाता है। तीसरा नियम यह कि सत्ताधारी दल के राजनेता एक दूसरे की अनुगूंज बन जाते हैं, भले ही हम सुनने वालों को वह कितना ही मूर्खतापूर्ण और वास्तविकता से परे नजर आए। इन नियमों के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण इस समय हमारे आसपास हैं। 

कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार के 2011-13 के अंतिम दिनों को याद कीजिए। व्यापक भ्रष्टाचार, एक जघन्य बलात्कार, आर्थिक मोर्चे पर ठहराव और नीतिगत विफलताओं ने पूरे देश को जकड़ रखा था। इसका विरोध करने के लिए उस दौर में गरीब, व्यस्त और असंवेदनशील लोग भी सड़क पर उतर आए थे। क्या मौजूदा दौर में भी मनोदशा उसी दिशा में बढ़ रही है? संप्रग-2 के दौर के तमाम कारक हमारे बीच मौजूद हैं केवल भ्रष्टाचार को छोड़कर। कुशासन और उद्देश्यविहीन विचलन देखे जा सकते हैं। एक बार फिर जघन्य बलात्कार के खिलाफ प्रदर्शन देखने को मिल रहा है, अर्थव्यवस्था में गिरावट का सिलसिला जारी है, अब अचानक लोगों को नागरिकता और राष्ट्रीय पंजीयन की नई प्रक्रिया से दो-चार होना पड़ सकता है।

इसकी कुल लागत 70,000 करोड़ रुपये से अधिक होगी। यह ऐसे समय पर हो रहा है जब सरकार का खजाना खाली है। गलत समय पर उठाए गए इस कदम के खिलाफ स्वत: स्फूर्त विरोध देश भर में देखने को मिल रहा है। ठीक पिछली सरकार की तरह छह साल से सत्ता में बनी हुई यह सरकार भी सुनने को तैयार नहीं है। 

पिछले प्रधानमंत्री व्यक्तिगत रूप से ईमानदार थे लेकिन वह नागरिकों और कारोबारियों की रोजमर्रा की समस्याओं से दूर नजर आते थे। मौजूदा प्रधानमंत्री भी इससे कतई अलग नहीं नजर आते। उनके मंत्री भी एक सिरे से हकीकत से दूर नजर आते हैं। पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम किसी सम्राट की तरह बातें किया करते थे। वह आर्थिक कारकों को आदेश देते थे कि वे सक्रिय हों और वह मानो घटनाओं को सुनिश्चित करते थे। कुछ दिन पहले मौजूदा वित्त मंत्री ने भी लगभग वैसी ही टिप्पणी में कहा, 'मैंने सरकारी बैंकों से कहा है कि वे रिवर्स रीपो का इस्तेमाल करने के बजाय ऋण दें।'

उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार बैंकों की निर्णय प्रक्रिया में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगी। उन्होंने देश के कारोबारी जगत को भी यह 'सलाह' दी कि वे निजीकृत की जा रही सरकारी कंपनियों को लेकर उत्साह दिखाएं। उन्होंने कंपनियों से कहा कि वे अपने मन का संदेह दूर करें और कारोबारी भावना जागृत करें। 

जाहिर है कंपनियां उनकी बात नहीं सुन रहीं। करीब 16 वर्ष पहले तत्कालीन विनिवेश मंत्री अरुण शौरी ने कहा था कि सरकारी कंपनियां कोई ताज में जड़ा आभूषण नहीं हैं बल्कि ये ऐसे घाव हैं जिनसे रक्तस्राव हो रहा है। एक के बाद एक सरकारों के कार्यकाल में उनकी स्थिति और खराब हुई है। ऐसे में किसी से यह कहना कि वह इन कंपनियों के लिए उत्साहित होकर बोली लगाए, हास्यास्पद ही है। उसी दिन प्रधानमंत्री ने औद्योगिक संगठन एसोचैम के सदस्यों से कहा कि वे निर्भय होकर निवेश का निर्णय करें। सुनने वालों में देसी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दिग्गज शामिल थे। जैसा कि मैंने कहा, राजनेता एक अलग ही दुनिया में रहते हैं। 

ऐसा कोई व्यक्ति जिसे देश में कारोबार की समझ है। वह जानता है कि देश में कारोबार को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाना और लाखों रोजगार तैयार करना कितना मुश्किल है। जो कंपनियां बची रहीं और देश की विषाक्त राजनीतिक अर्थव्यवस्था में फली-फूलीं उन्हें रोज रिश्वत, निर्णय प्रक्रिया में देरी, तमाम तरह के कायदों और लाइसेंस, अदालती मुकदमों, राजस्व विभाग की मांग, पुरातन कानूनों आदि से निपटना पड़ा। उन्हें भाषण की जरूरत नहीं है। आखिर राजनेता, जिनमें से कुछ ने तो चुनाव भी नहीं जीता, जीवन में बहुत उपयोगी कुछ नहीं किया, रोजगार या संपत्ति नहीं पैदा की, उन्हें इन सफल उद्योगपतियों को यह भाषण देने में शर्म नहीं आती कि वे साहसी बनें और अपने संशय से बाहर निकलें? 

वजह आसान है: एक बार सत्ता में आने के बाद वे हकीकत से दूर हो जाते हैं और तमाम असहज करने वाले तथ्यों को नकारात्मकता बताने लगते हैं। उन्हें लगता है कि जो वे कर रहे हैं वही सही है। वर्ष 2008 के बाद फंसे कर्ज में इजाफे के लिए जिम्मेदार रहे तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी का भी यही रुख था। हाल ही में प्रधानमंत्री ने स्पष्टï किया कि अर्थव्यवस्था डांवाडोल है क्योंकि मौजूदा सरकार को पिछली सरकार का कचरा साफ करना पड़ा। इसे सच मान लिया जाए तो क्या कोई प्रधानमंत्री से पूछेगा कि उन्होंने ऐसी गंदगी के जिम्मेदार व्यक्ति को भारत रत्न का खिताब क्यों दिया? हमसे यह अपेक्षा नहीं की जाती कि हम यह या ऐसे तमाम अन्य असहज करने वाले प्रश्न करें। जबकि नेता प्राय: एक दूसरे की बात दोहराते हुए यह बताते रहते हैं कि लोगों को क्या करना चाहिए। वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री ने एक ही दिन यह अपील की कि कारोबारियों को घबराना नहीं चाहिए। 

मुझे यह सब देखकर अचरज होता है कि आखिर रोजगार की कमी से जूझ रहे देश में रोजगार तैयार करने वाले सफल कारोबारी रोजगार नष्टï करने वाले राजनेताओं के समक्ष याचक की भूमिका में क्यों नजर आते हैं। उन्हें उनकी बेतुकी सलाह सुननी पड़ती है। पिछले दिनों एसोचैम की बैठक में प्रधानमंत्री पर्याप्त तालियां न बजने से नाखुश थे। उन्होंने यहां तक कह दिया कि वहां मौजूद लोग समझ ही नहीं रहे हैं कि वह क्या कहना चाहते हैं। इन सफल कारोबारियों ने इस अपमान पर हंसना शुरू किया और तालियां बजानी तेज कर दी। जब प्रधानमंत्री ने उनका और अपमान करते हुए आरोप लगाया कि वे विभिन्न मंत्रियों को फोन करके उनसे मदद का अनुरोध करते हैं तो वे खामोशी से सुनते रहे। 

मैं समझता हूं कि इस विषय में ज्यादा कुछ नहीं किया जा सकता है। सरकार को पांच साल में एक बार ही बदला जा सकता है और इससे भी कुछ खास नतीजा निकलता नहीं दिखता। हमें कम से कम इस अंतहीन भाषणबाजी की अनदेखी करनी चाहिए और देशभक्ति, राष्ट्रवाद, उद्यमिता, स्वच्छता आदि को लेकर अंतहीन सवालों की झड़ी का शिकार बनने से इनकार करना चाहिए। इसलिए क्योंकि नेता, बाबू और राजनीतिक दल स्वयं को इन तमाम परीक्षणों से सुरक्षित रखते हैं।

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