बिजनेस स्टैंडर्ड - दशक में बैंकों पर बढ़ी सरकार की निर्भरता
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दशक में बैंकों पर बढ़ी सरकार की निर्भरता

अनूप रॉय /  December 30, 2019

पिछले दशक में सरकार के आर्थिक एजेंडा का आधार बैंकिंग क्षेत्र था। यह ऐसा दशक रहा, जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के कामकाज के माहौल में बड़े बदलाव किए जाने के बावजूद वे चुनौतियों से पार पाने में सफल रहे। निस्संदेह यह दशक बैंकिंग क्षेत्र में अहम घटनाक्रम से भरपूर रहा। ये घटनाक्रम 1970 के दशक में बैंकों के राष्ट्रीयकरण से भी बड़े रहे हैं। इन घटनाक्रमों में 23 नए बैंक लाइसेंस, बैंक विलय, मुद्रा संकट की वजह से डॉलर जमाओं में बढ़ोतरी, नोटबंदी, बड़े घोटालों का पर्दाफाश, डिजिटलीकरण, बैंक बोर्ड प्रशासनिक सुधार, निजी बैंकों के जाने-माने प्रमुखों का हटना, रिकॉर्ड फंसे कर्ज, ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) बनना आदि शामिल हैं। 

इस दशक में सरकार को बैंकों में नई पूंजी डालने की जरूरत महसूस हुई। इस दशक की शुरुआत में सरकार वैश्विक ऋण संकट से प्रभावित विभिन्न क्षेत्रों को उबारने के लिए प्रोत्साहन पैकेज देने में व्यस्त थी। खुद बैंक भी जूझ रहे थे कि कृषि ऋण माफी योजना कैसे लागू की जाए। बैंकों को सबवेंशन स्कीम और घाटे के रूप में प्रोत्साहन पैकेजों की कीमत चुकानी पड़ी। यह रुझान अब भी जारी है। बड़ी कंपनियों में फंसे कर्जों और बड़े घोटालों ने देश के बैंकिंग उद्योग को हिला दिया है। 

अश्विन पारेख एडवाइजरी सर्विसेज के प्रबंध साझेदार अश्विन पारेख ने कहा, 'अर्थव्यवस्था को बढ़ाने के लिए बैंकिंग तंत्र पर निर्भरता जरूरत से अधिक है। वैश्विक वित्तीय संकट के बाद प्रोत्साहन पैकेज शुरू किए गए, जिसकी कीमत बैंकिंग तंत्र को चुकानी पड़ी।' लेकिन ऐसी निर्भरता की सरकार को भी कीमत चुकानी पड़ती है। न केवल बैंकों में नई पूंजी डालने की जरूरत है बल्कि बोर्डों में भी बदलाव की दरकार है। पारेख के मुताबिक सरकार को सरकारी बैंकों में अपनी हिस्सेदारी घटाकर 51 फीसदी से कम करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकारी बैंकों के विलय से सार्थक नतीजे निकलने की संभावना नहीं है। 

जब बड़े कर्जदारों ने डिफॉल्ट करना शुरू किया तो बैंक अधिकारियों को गलत व्यावसायिक फैसलों के लिए घेरा गया। इससे बैंकरों ने ऋण देने में हाथ खींच लिए। इससे अर्थव्यवस्था में ऋण वितरण कमजोर पड़ा। यह भी भारी मंदी की एक वजह रहा है। 

दशक का एक महत्त्वपूर्ण घटनाक्रम यह भी था कि देश के निजी बैंकों की कमान संभाल रहे लोगों को बैंक छोडऩे पड़े। बैंक हमेशा ही सरकार के लिए महत्त्वपूर्ण रहे हैं। लेकिन 2014 में नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने सरकारी बैंकों के जरिये अपने आर्थिक और सामाजिक एजेंडे को आगे बढ़ाया। नवंबर 2016 में नोटबंदी के बाद बैंकिंग क्षेत्र मुश्किल दौर से गुजरा क्योंकि सरकार ने रातों-रात 500 और 1,000 रुपये के नोटों पर प्रतिबंध लगाते हुए 86 फीसदी नकदी चलन से बाहर कर दी। लेकिन लगभग पूरा पैसा आर्थिक तंत्र में आ गया, जिससे नोटबंदी को लेकर सवाल उठते हैं। हालांकि इससे डिजिटलीकरण में तेजी आई। मोबाइल आधारित यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई), इमिडिएट पेमेंट सर्विस (आईएमपीएस) और अब 24 घंटे नैशनल इलेक्ट्रॉनिक फंड्स ट्रांसफर (एनईएफटी) से भारत में बैंकिंग क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आए हैं। ऐसे डिजिटल ढांचे की नींव संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के कार्यकाल में रखी गई। लेकिन राजग सरकार ने इस पहल को नई ऊंचाई पर पहुंचाया। 

भारतीय रिजïर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर रघुराम राजन ने अप्रैल 2014 से 23 बैंक लाइसेंस जारी किए थे। दो को अप्रैल 2014 में यूनिवर्सल बैंकिंग लाइसेंस दिए गए। वहीं 11 को अगस्त 2015 में भुगतान बैंक लाइसेंस दिए गए। इसके अलावा 10 को सितंबर 2015 में लघु वित्त बैंक के लाइसेंस दिए गए। 

प्रधानमंत्री मोदी ने देश को अपने पहले स्वतंत्रता दिवस संबोधन में देश भर में लोगों की पहुंच बैंकिंग सेवाओं तक बनाने की मुहिम की घोषणा की थी। प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत 12.5 करोड़ से अधिक खाते खोले गए। लेकिन पर्यवेक्षकों का कहना है कि इन खातों में से आधे से अधिक निष्क्रिय हैं। इसके बाद बैंकरों के साथ दो दिवसीय विचार मंथन सत्र 'ज्ञान सत्र' का आयोजन किया गया और फिर 'इंद्रधनुष' परियोजना पर काम शुरू हुआ। इस परियोजना के तहत केंद्र ने बैंक बोर्ड में बदलाव की कवायद शुरू की। इसके लिए एक बैंक बोर्ड ब्यूरो तैयार करना अहम था। इसके अलावा फंसे हुए कर्ज की पहचान करने और बैंकों के पर्याप्त पुनर्पूंजीकरण के जरिये समाधान की कोशिश की गई। ऐसा पहली बार हुआ जब सरकार ने सरकारी बैंकों की कमान संभालने के लिए निजी क्षेत्र से नियुक्ति का फैसला किया। 

दिसंबर 2015 में रघुराम राजन ने बैंकों की परिसंपत्ति गुणवत्ता का आकलन कराने का फैसला किया। तीन सालों की इस प्रक्रिया के बाद बैंकिंग क्षेत्र में 10 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा फंसे कर्ज का पता चला और इनमें से ज्यादातर के पास पर्याप्त पूंजी प्रावधान कवर की कमी थी। साफतौर पर सरकारी बैंकों के पास इस संकट से निपटने के लिए पर्याप्त पूंजी नहीं थी। नियमित तौर पर बैंकों को पूंजीगत मदद देने के साथ ही अक्टूबर 2017 में 2.11 लाख करोड़ रुपये की नई पूंजी देने का वादा किया गया। बैंकिंग क्षेत्र के लिए सबसे अहम, आईबीसी कानून इस दशक में ही अगस्त 2016 में बना। अब नए कानून की ताकत पाकर बैंकर भी आक्रामक दिखे और उन्होंने बड़े उद्योगपतियों से बैंक का कर्ज लौटाने को कहना शुरू किया। पारेख ने बताया, 'एस्सार स्टील पर फैसला होने के बाद आईबीसी और एनसीएलटी ने सही दिशा में काम करना शुरू कर दिया। इसके बाद यह स्पष्ट हुआ कि ऋणदाताओं की समिति को सशक्त बनाने की जरूरत है।' इस कानून की मदद से बैंकों ने अपने फंसे हुए कर्ज में से 4-5 लाख करोड़ रुपये वसूलने में सफलता पाई जिससे बैंकिंग क्षेत्र में थोड़ा सुधार दिखा। जून 2019 में 44 सूचीबद्ध बैंकों के कुल फंसे कर्ज 9.27 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर आ गए जो मार्च 2018 में 10 लाख करोड़ रुपये थे। इसमें आगे भी कमी आनी चाहिए थी लेकिन आर्थिक वृद्धि में गिरावट की वजह से फंसे कर्ज एक बार फिर से जमा होना शुरू हो गए। सितंबर के अंत तक आईबीसी में 10,860 मामले लंबित थे हालांकि इन मामलों में महज 15 फीसदी का ही समाधान हो सका। 

इस दशक में सरकार ने बैंकों के विलय पर जोर दिया। सबसे पहले भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) ने अपने पांच सहयोगी बैंकों के अलावा भारतीय महिला बैंक का विलय किया। आईडीबीआई का निजीकरण कर उसे एलआईसी को बेच दिया गया। इस साल अप्रैल में देना और विजया बैंक का बैंक ऑफ बड़ौदा में विलय हुआ। अगस्त में सरकार ने कहा कि पीएनबी और ओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स और यूनाइटेड बैंक का विलय किया जाएगा। सिंडिकेट बैंक का विलय केनरा बैंक के साथ, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, आंध्रा बैंक और कॉरपोरेशन बैंक के विलय के अलावा, इलाहाबाद बैंक  का इंडियन बैंक में विलय होगा। 2018 में देश के बैंकिंग उद्योग में तब हलचल मच गई जब दो जानेमाने आभूषण कारोबारियों ने फर्जी लेटर ऑफ क्रेडिट के जरिये पीएनबी बैंक में करीब13,000 करोड़ रुपये का चूना लगाया। आरबीआई के मुताबिक वित्त वर्ष 2018-19 में 71,500 करोड़ रुपये के घोटाले सामने लाए जिनमें से ज्यादातर सरकारी बैंकों में हुए थे। 2019 में एक बड़े सहकारी बैंक पंजाब एंड महाराष्ट्र कोऑपरेटिव (पीएमसी) बैंक ने एक रियल एस्टेट समूह को अपना 70 फीसदी से अधिक ऋण दे दिया जो बाद में दिवालिया हो गई।
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