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गंदे खेल और टालमटोल से परहेज का आखिरी मौका

सुनीता नारायण /  December 30, 2019

यह एक दशक के अवसान और संभवत: नए युग के आरंभ का वक्त है। हम जिस दशक (2010-2019) को अपने पीछे छोडऩे जा रहे हैं उसमें यह दुनिया खंडित हुई है, नाकाम हुई है, हमारे नेताओं का पतन हुआ है, अर्थव्यवस्थाएं मुश्किलों में घिरी हैं और हमारे चारों तरफ संघर्ष एवं विवाद नजर आते हैं। इस दशक में हमें यह अहसास हुआ है कि जलवायु परिवर्तन कोई सुदूर भविष्य का मसला नहीं रह गया है। यह घटित हो रहा है और इसके प्रभाव बढ़ते ही जाएंगे। इस दशक में हरेक साल नए रिकॉर्ड बनते रहे हैं- कभी अधिकतम तापमान का तो कभी सबसे प्रतिकूल मौसम का। लेकिन मामला सिर्फ मौसम का ही नहीं है। मुद्दा यह है कि दुनिया में लोग अपने वर्तमान को किस तरह देखते हैं और अपने भविष्य के बारे में कैसी सोच रखते हैं?

हमें मालूम है कि आज युवा बेचैन हैं और शायद पिछले किसी भी दशक की तुलना में सबसे ज्यादा बेचैनी है। अपेक्षाकृत धनी दुनिया में युवा तबका अधिक चिंतित एवं बेचैन है क्योंकि उन्हें तेजी से गर्म होती दुनिया में अपना वजूद बचाए रख पाने का तरीका ही नहीं मालूम है। लेकिन मेरे ख्याल से युवाओं को सबसे ज्यादा चिंतित यह बात करती है कि वे फर्क पैदा कर पाने में खुद को अशक्त महसूस करते हैं। उनकी जिंदगी में सारभूत एवं आवश्यक हरेक चीज को समस्या के तौर पर पेश किया जा रहा है। वे इस स्थिति को कैसे बदलेंगे? युवा इस बात को लेकर चिंतित हैं और उन्हें ऐसा होना भी चाहिए।

वहीं विपन्न दुनिया में युवाओं को अवसर की चाहत है। लेकिन उन्हें अपने आसपास भविष्य की संभावनाएं क्षीण दिखाई देती हैं। वे गांव से शहर और वहां से दूसरे देश जाना चाहते हैं। वे अपने माता-पिता की दुर्दशा से इत्तफाक नहीं रखते हैं। सरकारी स्तर पर सही व्यवस्था नहीं होने से वे समुचित औपचारिक शिक्षा से भी वंचित होते हैं फिर भी वे अपने मोबाइल फोन के जरिये मौजूदा दौर से तालमेल बिठाए हुए हैं। वे दूर चमकती रोशनी से परिचित हैं और उन्हें बखूबी पता है कि दुनिया उनका इंतजार कर रही है। वे इसे चाहते हैं। वे अपने आसपास की दुनिया को टुकड़े-टुकड़े होते देखते हैं। खेती-किसानी से जुड़े उनके मां-बाप दोनों मकसद नहीं पूरे कर पाते हैं।

खाद्यान्न उपजाने से जुड़े मौसमी जोखिम एवं लागत दिन-पर-दिन बढ़ती जा रही है और हरेक मौसम में कर्ज का जाल उलझता जाता है। लेकिन युवा ऐसा नहीं होने देना चाहते हैं। यह पीढ़ी एक और लिहाज से अलग है। वे निरीह या दब्बू नहीं हैं। वे अधिक के लिए भूखे होने के साथ उतावले भी हैं। 

ऐसे में कोई आश्चर्य नहीं है कि दुनिया के करीब हरेक हिस्से में हालात बहुत जल्द काबू से बाहर जा सकते हैं। ईंधन के दाम या शिक्षण संस्थानों के शुल्क में बढ़ोतरी का मुद्दा भी सरकारों को गिरा सकता है, सेना को सड़क पर ला सकता है और आगजनी, लूट एवं गोलीबारी की नौबत आ सकती है। विस्फोटकों से भरी यह दुनिया उबाल पर है।

यह एक विभाजित विश्व भी है। देश अब एक साथ मिलकर काम नहीं करते हैं। हर देश केवल अपने हितों के बारे में सोचता है, किसी और के बारे में नहीं। ऐसा नहीं है कि पहले ऐसा नहीं होता था। लेकिन दिखावा अब नहीं रहा और असाधारण अंतसर्बंद्धता एवं अंतर्निभरता के इस दौर में भारी नतीजे देखे गए हैं। साफ है कि पिछले तीन दशकों (1990-2019) में अगर स्थानीय हवा को साफ किया गया है और उत्सर्जन को काबू में रखा गया है तब भी वृद्धि का खमियाजा पर्यावरण को उठाना पड़ा है जो वजूद पर खतरा बन रहे जलवायु परिवर्तन का सबब बन रहा है। हमारे उत्तराधिकारियों को यह बात याद रखनी चाहिए। 

इस दशक में याद रखने लायक कुछ और सबक भी हैं। हमारी दुनिया में हम अभूतपूर्व स्तर का आंतरिक प्रवास एवं ग्रामीण असंतोष देख रहे हैं। मैं प्रवासियों के बारे में व्यापक एवं अक्सर नकारे खुलासों की वजह से ऐसा नहीं कह रही बल्कि हमें पता है कि हमारे शहर गैरकानूनी ढंग से बढ़ रहे हैं और यह वृद्धि व्यापक एवं काबू से बाहर हो चुकी है।

यहीं पर चक्र बंद हो जाता है। सच यह है कि दिल्ली आज ठीक से सांस नहीं ले सकती है। हमारी हवा जहरीली एवं अशुद्ध है। हमारी सेहत के साथ खिलवाड़ हो रहा है। हमें यह समझना होगा कि करीब 30 फीसदी प्रदूषण हवा में उत्सर्जन करने वाले उद्योगों के नाते है। ये उद्योग प्राकृतिक गैस जैसे स्वच्छ ईंधन का खर्च नहीं उठा सकते हैं। वे पेट कोक जैसे गंदे ईंधन का इस्तेमाल करते हैं और इस पर प्रतिबंध लग जाने के बाद कोयले या किसी भी सस्ते ईंधन का इस्तेमाल करने लगते हैं। लेकिन दिल्ली में साफ हवा की चाहत होने पर भी हम इन उद्योगों को दूसरे इलाके में नहीं भेज सकते हैं। एयरशेड तो एक ही है। मेरा मानना है कि वायु प्रदूषण सबकुछ बराबर कर देता है। हमें यह ध्यान रखना होगा कि यह औद्योगिक वृद्धि पर्यावरण की लागत में किसी रियायत के बगैर आती है। हमें शहरी एवं ग्रामीण और अमीर एवं गरीब का समावेश करने वाले विकास की जरूरत है।

धनी देशों के अमीरों के लिए भी यही सबक होना चाहिए। उनकी सरकारों ने जलवायु वार्ताओं में समता एवं न्याय की बुनियादी धारणा को ही खत्म करने की कोशिश की है। लेकिन सच यह है कि यह एक साझा एयरशेड भी है। अगर अतीत में धनी देशों ने उत्सर्जन किया था तो गरीब भविष्य में ऐसा करेंगे। हमारा एक साझा भविष्य है और जलवायु प्रभावों के संदर्भ में यह उतना अच्छा नहीं लगता है।

लिहाजा अगले दशक में हम वास्तविकता के करीब रहें। अगर अपने लिए न सही तो इस ध्रुवीकृत, बेहद असमान और जोखिमों से भरपूर इस दुनिया की विरासत पाने वाले युवाओं के लिए ऐसा करें। अब खेल न खेलें और टालमटोल न करें। अगला दशक बातों पर खरा उतरने का आखिरी मौका है। हम इस मौके को नहीं गंवा सकते हैं।

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