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डेटा विश्वसनीयता हो बहाल

संपादकीय /  December 30, 2019

यह एक स्वागतयोग्य खबर है कि पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद प्रणव सेन की अगुआई में एक उच्चस्तरीय पैनल बनाया गया है जो रोजगार, उद्योग एवं सेवाओं के फिलहाल होने वाले सर्वेक्षणों की पड़ताल  करेगा। विभिन्न प्रमुख सरकारी आंकड़ों खासकर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आकलन में ये सर्वेक्षण जरूरी इनपुट होते हैं। इस 28 सदस्यीय समिति को यह काम सौंप दिया गया है। भारत के आधिकारिक आंकड़ों पर हाल में काफी सवाल उठे हैं।

कई बार ये आंकड़े एक-दूसरे और अर्थव्यवस्था के अन्य संकेतकों के उलट मकसद से काम करते हैं। अधिक चिंताजनक बात यह है कि उनकी विश्वसनीयता और राजनीतिक हस्तक्षेप से स्वतंत्रता भी हमले की जद में रही है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के हालिया दौर जैसे कुछ आंकड़ों को छिपाने के मामले में सरकार की इच्छा ने इन आशंकाओं को निर्मूल साबित करने में मदद नहीं की है। इस समिति के गठन के साथ ही डॉ सेन को इसका अध्यक्ष बनाने और हालिया आंकड़ों को संदेह की नजर से देखने वाले विद्वानों को इसमें शामिल करना भारत के आधिकारिक आंकड़ों की प्रतिष्ठा बहाल करने में थोड़ा मददगार हो सकता है।

हालांकि बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि पैनल खुद को कितना सशक्त महसूस करता है और कितनी पारदर्शिता से वह सांख्यिकीय प्रणाली को पुनर्गठित कर सकता है। समिति को विभिन्न सरकारी डेटा समूहों के परीक्षण के लिए कहा गया है। मसलन, उद्योगों एवं सेवा क्षेत्र की इकाइयों और श्रम शक्ति के सर्वेक्षणों के अलावा औद्योगिक उत्पादन सूचकांक का परीक्षण यह समिति करेगी। समिति के दायरे के बाहर वही डेटा रखे जा सकते हैं जो लगातार स्थिर हैं और दूसरे के साथ तालमेल में हैं। माना जा रहा है कि समिति सर्वेक्षण रिपोर्ट तैयार करने की निगरानी और प्रशासकीय आंकड़ों के संकलन में आने वाली समस्याओं को चिह्निïत करने का भी काम करेगी।

इसका मतलब है कि अगर समिति चाहे तो उसके पास भारत के सांख्यिकीय परिप्रेक्ष्य को दुरुस्त करने की सापेक्षिक रूप से व्यापक शक्तियां हैं। यह महत्त्वपूर्ण है कि सरकार निष्पक्ष विशेषज्ञों की राय स्वीकार करे। शासन के प्रति अज्ञेयवादी सांख्यिकीय प्रणाली के साथ बड़ी समस्याएं हैं और उन्हें दूर करने की जरूरत है। उपभोग सर्वेक्षण में दिखाए जा रहे और राष्ट्रीय खातों से उजागर खपत के बीच भिन्नता होना ऐसा ही एक मसला है। संभवत: औपचारिक क्षेत्र पर अधिक जोर देने वाली जीडीपी की गणना कंपनी मामलों के मंत्रालय के आंकड़ों से करने का मुद्दा भी है। अपस्फीतिकारकों की गणना का तरीका और कॉर्पोरेट आंकड़ों को सही ढंग से अलग रखने का मुद्दा भी अहम होगा।

सरकार ने राष्ट्रीय सांख्यिकीय आयोग (एनएससी) के गठन की मंशा रखने वाले कानून का मसौदा जारी किया है जिसमें राष्ट्रीय आंकड़ों के लिए शीर्ष निकाय बनाने का प्रावधान है। माना जा सकता है कि संसद की आर्थिक सांख्यिकी समिति मसौदे पर चर्चा कर यह तय करेगी कि डेटा संग्रह एवं विश्लेषण पर भावी सुधारों का खाका बनाने के लिए क्या करने की जरूरत है? इन कदमों को लागू करने के लिए एनएससी जिम्मेदार होगा। हालांकि महत्त्वपूर्ण बात यह है कि एक संस्था के तौर पर एनएससी को मजबूत बुनियाद और ताकत मिले। एक स्वतंत्र एवं स्वायत्त निकाय होने के साथ ही आयोग के पास सरकारी स्तर पर संग्रहीत आंकड़ों के वितरण एवं उन्हें जारी करने पर निगरानी की शक्तियां भी होनी चाहिए। ऐसा होने पर यह संदेह नहीं रह जाएगा कि सरकार या उसके अफसर राजनीतिक कारणों से असुविधाजनक आंकड़ों को छिपा रहे हैं या उनसे छेड़छाड़ कर रहे हैं। एनएससी विधेयक में इन बातों का ध्यान नहीं रखा गया है।

 

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