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नियामकीय चुनौतियों के डर से जूझता रहा घरेलू दवा उद्योग

सोहिनी दास /  December 29, 2019

इस साल देश का दवा उद्योग घटनापूर्ण रहा। देश के प्रमुख निर्यात बाजार अमेरिका में वहां के नियामक  के डर की वजह से चीन और जापान जैसे नए क्षेत्रों में नई संभावनाएं तलाशने की कोशिश तेज हुई। इसके अलावा घरेलू बाजार में वृद्धि दर के लिहाज से अच्छा-खासा उतार-चढ़ाव देखा गया। इस क्षेत्र में कैंसर को बढ़ावा देने वाले पदार्थ की चिंता ज्यादा बढ़ती दिखी जो आमतौर पर एंटासिड्स और मधुमेह से जुड़ी दवाइयों में मौजूद हो सकता है। हालांकि इस साल उद्योग को भारतीय औषधि मूल्य नियंत्रक की तरफ से थोड़ी राहत मिली जिसने ज्यादा लागत का दबाव झेल रही कुछ प्रमुख दवाइयों की न्यूनतम कीमत एक बार बढ़ाने की इजाजत दी। 

अगर इस क्षेत्र की दवा कंपनियों के शेयरों की कीमत के लिहाज से उनके प्रदर्शन का आकलन किया जाए तब सन फार्मा, ल्यूपिन और सिप्ला जैसी बड़ी दवा कंपनियों के शेयरों में एक साल पहले की अवधि के मुकाबले गिरावट दर्ज की गई। अच्छे प्रदर्शन से हैरान करने वाली कंपनियों में डिवीज लैबोरेटरीज भी शामिल रही। हैदराबाद की इस कंपनी की शेयर कीमतों में 2019 में 22 फीसदी से अधिक की उछाल देखी गई। नियामकीय चुनौतियों के बावजूद लागत का बेहतर इस्तेमाल करने वाले उपायों और अमेरिका से जुड़ी योजना की वजह से हैदराबाद की दूसरी दवा कंपनी डॉ रेड्डïीज लैबोरेटरीज ने भी अच्छा प्रदर्शन किया। 

रेटिंग एजेंसी इक्रा के मुताबिक देश के दवा उद्योग में स्थिरता है। इस क्षेत्र पर इक्रा ने ताजा टिप्पणी करते हुए कहा है, 'दुनिया के सबसे नियंत्रित बाजार अमेरिका में कीमतों के दबाव जैसी विपरीत परिस्थिति पर नियंत्रण बनाने के साथ ही, स्वास्थ्य सेवा खर्च में बढ़ोतरी और इन सेवाओं तक अच्छी पहुंच के जरिये भारतीय बाजार में अच्छी वृद्धि के हालात हैं। अब मुमकिन है कि देश की दवा कंपनियों के लिए अच्छी वृद्धि की संभावना बने।' इक्रा का कहना है कि घरेलू दवा कंपनियों के लिए वित्त वर्ष 2019-2022 में सालाना चक्रवृद्धि दर करीब 10-12 फीसदी तक रह सकती है। 

नियामकीय जांच में तेजी

अमेरिकी खाद्य एवं दवा प्रशासक की जांच चलने की वजह से भारतीय निर्यातकों के लिए यह साल मुश्किल भरा रहा। आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि नियामकीय मुद्दों की वजह से इस क्षेत्र का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। 

आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि चालू वित्त वर्ष 2019 की पहली छमाही में नियामकीय मुद्दों, वृद्धि की कमी के साथ अस्थिर अमेरिकी कारोबार, ऊंची कीमतों में कटौती से इस क्षेत्र का प्रदर्शन शेयर बाजार में अच्छा नहीं रहा। इसने अपनी रिपोर्ट में कहा, 'देश के संयंत्रों को पहले के 7-10 पत्रों के चालू वित्त वर्ष 2019 में मुकाबले 15 चेतावनी भरे पत्र मिले क्योंकि देश में संयंत्रों और आवेदन की तादाद बढ़ रही है।' विश्लेषकों का मानना है कि देश की कंपनियां अमेरिका में जटिल दवाओं के लिए ज्यादा आवेदन दे रही हैं ऐसे में यूएसएफडीए की जांच-पड़ताल और ज्यादा बढऩे के आसार हैं। 

अमेरिका में निर्यात 

वाणिज्य मंत्रालय की एक इकाई औषधि निर्यात संवद्र्धन परिषद के मुताबिक वित्त वर्ष 2020 की पहली तिमाही के दौरान देश का कुल दवा निर्यात 11 फीसदी बढ़ा। फार्मेक्सिल के मुताबिक जून की तिमाही के दौरान अमेरिकी निर्यात में 28 फीसदी की वृद्धि दिखी। इसकी वजह यह है कि ज्यादातर कंपनियों ने अपने कारोबारी मॉडल को जोखिम से निकालने के लिए अपने प्रमुख उत्पाद तैयार करने के लिए पिछले कुछ सालों में वैकल्पिक जगहों और संयंत्रों को तैयार किया। 

हालांकि बड़े खिलाड़ी जिनमें सन फार्मा भी शामिल है उसने यह संकेत दिया है कि उनका इरादा जापान और चीन जैसे नियंत्रित बाजारों पर ध्यान देने का है। ल्यूपिन जैसी कुछ कंपनियों ने जेनेरिक दवाओं वाली अपनी जापानी सहयोगी इकाइयों को बेच दिया है और उनका कहना है कि वे विशेष तरह की दवाइयों में साझेदारी पर ध्यान देंगी।

उतार-चढ़ाव

देश के 1.3 लाख करोड़ रुपये के घरेलू बाजार में इस साल उतार-चढ़ाव की स्थिति देखी गई। जून की तिमाही में घरेलू बाजार में सालाना वृद्धि जून 2014 के बाद सबसे कम रही। इसके बाद बाजार में मॉनसून में तेजी आई और एंटी-इफेक्टिव जैसी श्रेणियों की दवाइयों की बिक्री में वृद्धि रही। जुलाई-सितंबर की तिमाही के दौरान बाजार में 11.5 फीसदी की वृद्धि देखी गई और यह वृद्धि कारोबार और कीमत दोनों में देखी गई। हालांकि इसके तुरंत बाद वृद्धि दर अक्टूबर में फिसल कर 5.1 फीसदी के स्तर पर चला गया और नवंबर में इसमें और तेजी आई। 

घरेलू बाजार में कारोबारी वृद्धि में गिरावट दिख रही है और कीमतों पर नियंत्रण का दबाव बढऩे से कंपनियों का जोर ज्यादा मुनाफा देने वाले ब्रांडों पर है। लागत बढऩे की वजह से दवा निर्माताओं के लिए कुछ उत्पाद का इस्तेमाल करना मुश्किल होने लगा। केंद्र सरकार ने इस स्थिति का संज्ञान लेते हुए दवा कीमत नियंत्रण आदेश, 2013 के पैराग्राफ 19 को हटा लिया ताकि 21 फॉम्र्यूलेशंस की न्यूनतम सीमा 50 फीसदी तक बढ़ाई जा सके। उद्योग ने काफी लंबे समय से इसकी मांग की थी क्योंकि चीन की तरफ से आपूर्ति बाधित होने से सक्रिय दवा सामग्री (एपीआई) की कीमतें पिछले दो सालों में 10-88 फीसदी तक बढ़ गईं। 

केंद्र ड्रग मैन्युफैक्चरिंग पार्क तैयार करने की दिशा में काम कर रही है ताकि स्थानीय स्तर पर दवा तैयार करने की प्रक्रिया में तेजी लाई जा सके और चीन पर निर्भरता कम हो जिसका हमारे एपीआई आयात में लगभग 70 फीसदी की हिस्सेदारी है। अब पूरा जोर आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश और असम चार बड़ा ड्रग पार्क तैयार करने पर है। 

कैंसर का डर

घरेलू बाजार में मांग में उतार-चढ़ाव, अमेरिकी नियामक से जुड़ी चिंताओं के अलावा देश की दवा कंपनियों को सामान्य एंटासिड रानीटिडाइन और डायबिटीज की दवा मेटफॉर्मिन जैसी दवाइयों की सामग्री में कैंसर के संभावित पदार्थ की चिंता है। यूएसएफडीए द्वारा चेतावनी जारी किए जाने के बाद बहुराष्ट्रीय कंपनी ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन फार्मा सहित कई कंपनियों ने रानीटिडाइन उत्पाद वैश्विक स्तर पर हटा दिया गया। देश का नियामक भी सक्रिय हो गया है और इसने इन दवाइयों में कार्सीनोजेन (एनडीएमए) की मौजूदगी की जांच करवानी शुरू कर दी।

2020 की राह

विश्लेषक 2020 को लेकर आशावादी हैं। आईसीआईसीआई का कहना है, 'दवा क्षेत्र के लिए अगला साल सकारात्मक रहने की उम्मीद है और हम देश में 10-11 फीसदी वृद्धि की उम्मीद कर रहे हैं। लागत नियंत्रण उपायों से मार्जिन में मदद मिलने के साथ-साथ कीमतों में कटौती से अमेरिकी बिक्री में सकारात्मक वृद्धि होगी। हमने जिन दवा कंपनियों का विश्लेषण किया उनकी शेयर कीमतों में एफडीए से जुड़े मुद्दे बढऩे और अमेरिकी बिक्री में कमी की वजह से पिछले एक साल में औसतन 11 फीसदी की गिरावट देखी गई।'

आने वाले दिनों में एफडीए की अक्सर होने वाली निगरानी की नियामकीय बाधाओं, मुद्रा में उतार-चढ़ाव और जरूरी दवाइयों की राष्ट्रीय सूची (जिनकी कीमतों पर सरकार का नियंत्रण होता है) में ज्यादा दवाइयों को शामिल किए जाने जैसे जोखिम बढ़ेंगे। 

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