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देश में सत्ता के बदले समीकरण

आदिति फडणीस /  December 29, 2019

राजनीतिक बहसों और मनोरंजन दोनों पर आधारित फिल्मों के ग्रीक-फ्रेंच निदेशक कोस्टा-गवरस को पिछले 10 साल की भारतीय राजनीति पर फिल्म बनाने के लिए कहा जाए तो यह उसके लिए सुखद अनुभव होगा। उनकी सबसे अधिक चर्चित फिल्म 'जेड' है। यह फिल्म राजनीतिक हत्या के बारे में है, लेकिन इसमें भ्रष्टाचार और उदार लोकतंत्र की सीमाओं का संदेश भी छिपा है। उनकी नई फिल्म ईडन इज वेस्ट यूरोप में ऐसे एक अवैध प्रवासी के बारे में है, जिसका सपना पेरिस पहुंचना है। इसमें प्रवासियों से भरी एक नाव के बहुत से लोग अपने पहचान के दस्तावेज नाव के बाहर फेंक देते हैं ताकि वे अपने अतीत को पीछे छोड़कर बिना कागजात वाले लोगों की जमात में शामिल हो सकें। 

वर्ष 2010 से 2020 तक भारत इन सभी स्थितियों से गुजरा है। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) के दूसरे कार्यकाल (2009-2014) की शुरुआत शानदार रही, लेकिन समाप्ति बदनामी के साथ हुई। इस अवधि की शुरुआत सामाजिक सुरक्षा की दूरदर्शी पहलों जैसे सभी के लिए शिक्षा और रोजगार गारंटी कार्यक्रम आदि के साथ हुई। लेकिन इसकी समाप्ति राष्ट्रमंडल खेलों में बड़े घोटाले के उजागर होने के साथ हुई। इसमें सामने आया कि सरकार घोटाले के बारे में जानती थी, लेकिन इसे रोकने में असहाय थी। सरकार पर 2जी स्पेक्ट्रम की नीलामी में घूस के भी आरोप लगे। वहीं सांठगांठ का स्तर चौंकाने वाला था। इसका पता सीबीआई की उस रिकॉर्डिंग से चलता है, जिसमें जनसंपर्क एजेंसी की मालिक नीरा राडिया की  राजनेताओं, अफसरों और पत्रकारों से बातचीत सुनाई दे रही है। 

अनुभव और प्रशासनिक ज्ञान की बदौलत संप्रग के दूसरे कार्यकाल में व्यापक प्रशासनिक सुधार और पुनर्गठन की संभावनाएं थीं। इस बात की उम्मीद थी कि सरकार जनांकिक लाभ का ज्यादा से ज्यादा उठाने के लिए तरीके खोजेगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। इसके बजाय एक युवती के साथ दरिंदगी और सरकार की बेबसी के कारण दिल्ली में लोगों का विरोध शुरू हो गया। ऐसे में नरेंद्र मोदी के भाजपा के पुराने नेतृत्व को किनारे करने पर कोई अचंभा नहीं होना चाहिए। वह 2014 में उस पार्टी की ताकत से सत्ता में आए, जिसे अपनी महत्त्वाकांक्षाएं पूरी करने के तरीके से बनाया गया था।

उन्होंने इस बात को लेकर तुरंत फैसला ले लिया था कि वे पिछली सरकार जैसा कोई घोटाला नहीं होने देंगे। अपने दायरे से बाहर जाने वाले किसी गठबंधन साझेदार को नहीं रखा जाएगा और किसी भी को सरकार को प्रभावित नहीं करने दिया जाएगा। 

शिव सेना भाजपा से 2014 से ही नाखुश है। उस समय सेना ने मंत्रिमंडल में मंत्री पद के लिए नामित अनिल देसाई को मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में न जाने और वापस घर लौटने को कहा था क्योंकि सेना का मानना था कि उसे अपना वाजिब हिस्सा नहीं मिला। दोनों दलों के बीच इन दरारों को भरा गया, लेकिन ये बनी रहीं। मंत्रियों ने पाया कि नरेंद्र मोदी के कार्यालय-पीएमओ की मंत्रालयों पर नजर और दखल अधिक है। ऐसे बहुत से मंत्री जो खुद को अनुभवी प्रशासक मानते हैं, उन्हें भी यह तकलीफदेह लगता था कि पीएमओ उनके मंत्रालयों की छोटी-छोटी चीजों का प्रबंधन करता है। पीएमओ प्रस्तावों पर उनसे सवाल करता था और उनके मंत्रालय के लिए अधिकारियों की पसंद को नकार देता था। 

लेकिन मोदी ने अरुण जेटली जैसी सहयोगियों की सलाह पर कार्य किया, जो यह जानते थे कि दिल्ली के सत्ता के गलियारों से गुजरना शॉर्क से भरे समुद्र में तैरने के समान है। ऐसे सलाहकारों की सलाह से ही मोदी ने भारत के पुनर्गठन का काम किया। हालांकि पहला कदम नाकाम रहा। भूमि अधिग्रहण कानून को संशोधित करने की कोशिश की गई ताकि उद्योग के लिए भूमि अधिग्रहण आसान बने।

भाजपा सरकार ने अपने कार्यकाल का शुरुआती डेढ़ साल इस कानून को बदलने की कोशिश में ही व्यर्थ कर दिया। हालांकि उन्हें पहले से ही यह बात पता थी कि यह कानून राज्य सभा में पारित नहीं होगा, जहां उसका बहुमत नहीं है। आखिरकार सरकार वहीं आ गई, जहां से उसने शुरुआत की थी। उसने भूमि अधिग्रहण और निवेश के लिए उद्योग को आमंत्रित करने का मसला राज्य सरकारों पर छोड़ दिया। 

इससे सबक लेते हुए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने ऐसे लोकप्रिय कार्यक्रमों की शुरुआत की, जिन पर कोई राजनीतिक बहस या विवाद नहीं हो सकता था। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने यह बात स्वीकार की थी कि उज्ज्वला और स्वच्छ भारत अभियान जैसे कार्यक्रमों को जनता ने पसंद किया है और विपक्ष का इनकी आलोचना करना राजनीतिक रूप से गलत है। मोदी की हिम्मत को यह तथ्य बयां करता है कि बहुत कम लोगों को यह याद होगा कि कैसे असल में स्वच्छ भारत अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई वाली राजग सरकार और फिर संप्रग सरकार के निर्मल भारत अभियानों की रीपैकेजिंग थी। 

मोदी इतने उत्साह के साथ स्वच्छता की मुहिम छेडऩे वाले पहले प्रधानमंत्री बन गए। उन्होंने ऐसे मसले को जन आंदोलन बनाने का प्रयास किया, जो न केवल लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है बल्कि अछूतता और मैला ढोने की प्रथा पर प्रहार था। जन धन योजना और सेवाओं की डिजिटल डिलिवरी ने सरकार को लोगों के बीच पहुंचाने में अपनी भूमिका निभाई। 

इनका सरकार को फायदा मिला। जब उनकी सरकार ने ऐसे फैसले लिए जो सही और सुविचारित नहीं थे, तब भी जनता नरेंद्र मोदी के पक्ष में मजबूती से खड़ी रही। वर्ष 2016 की नोटबंदी और उसके बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव हमेशा भारतीय राजनीति के इतिहास में पहेली बने रहेंगे। नोटबंदी से लोगों की जीविका छिन गई, लेकिन फिर भी उन्होंने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में तन मन से मोदी के पक्ष में मत दिया। मोदी ने नीति-निर्माताओं और राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ जांच एजेंसियों का इस्तेमाल कर लोगों को दिखा दिया कि उन्होंने उनमें भरोसा दिखाकर सही काम किया है। जब 2019 के आम चुनाव नजदीक आए तो भाजपा की नोटबंदी के देरी से दिखने वाले असर को लेकर चिंता बढऩे लगी।

राष्ट्रीय सुरक्षा की दो मिसाइलों- पुलवामा में आतंकी हमले और और उसके जवाब में बालाकोट में आतंकवादियों पर बम गिराने की कार्रवाई ने मई 2019 में और प्रचंड जीत सुनिश्चित कर दी। इसे एक राजनीतिक विमर्श से रेखांकित किया गया। नए हिंदू भारत की कहानी गढ़ी और इसे तर्कसंगत ठहराया, जिसमें अल्पसंख्यकों को अपनी जगह दिखाने की जरूरत है। आज हम जो देख रहे हैं, वह उस विमर्श की ही तर्कसंगत परिणति है। 

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