बिजनेस स्टैंडर्ड - ग्राहकों के लिए सुनहरा और दूरसंचार क्षेत्र के लिए बुरा दौर
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ग्राहकों के लिए सुनहरा और दूरसंचार क्षेत्र के लिए बुरा दौर

सुरजीत दास गुप्ता /  December 29, 2019

ग्राहकों के लिए यह सुनहरा दौर रहा है। इस दशक की शुरुआत में सक्रिय ग्राहक वॉयस कॉल के लिए औसतन 50 पैसे प्रति मिनट का भुगतान करते थे और उनका मासिक बिल औसतन 140 रुपये प्रति महीना था। दशक के अंत में वॉयस कॉल लगभग मुफ्त हैं और उनके मासिक बिल 20 फीसदी घटकर 113 रुपये पर आ गए हैं। उन्हें फिल्म, खेल और टीवी चैनल देखने के लिए बड़ी मात्रा में डेटा मिल रहा है।

दूरसंचार कंपनियों के लिए यह दौर बड़ी कंपनियों के छोटी कंपनियों का सफाया करने जैसा रहा है। सरकार के नए लाइसेंस जारी करने की वजह से 2010 में बड़ी विदेशी कंपनियों समेत करीब आधा दर्जन कंपनियां दूरसंचार बाजार में उतरी थीं। उन्होंने कीमतों को लेकर प्रतिस्पर्धा छेड़ी क्योंकि उन्हें बाजार में हिस्सेदारी हासिल करनी थी। उस समय यह माना जाता था कि भारतीय बाजार में मोबाइल  सेवाओं के लिए वृद्धि की भरपूर संभावनाएं हैं। 

कंपनियों को बाजार में कड़ी प्रतिस्पर्धा के कारण दशक की समाप्ति तक विलय और कारोबार बंद करने के लिए बाध्य होना पड़ा है। एक समय इस क्षेत्र में 15 कंपनियां थीं, जिनकी संख्या घटकर अब चार पर आ गई है। अब इस बात के साफ संकेत दिखाई दे रहे हैं कि वोडाफोन-आइडिया के प्रवर्तक अपने कारोबार में और पैसा नहीं झोंकना चाहते हैं। ऐसे में कंपनियों की संख्या चार से घटकर तीन पर  आ सकती है। हालांकि अब भारत में दूरसंचार ग्राहकों की तादाद 110 करोड़ हो गई है। 

वॉयस सेवाओं पर आधारित बाजार महज एक दशक में डेटा पर आधारित हो गया है। यह सब इस बाजार में रिलायंस जियो के प्रवेश के कारण हुआ है। कंपनी ने दूरसंचार क्षेत्र में नई इबारत लिखी है। कंपनी ने 2016 में ग्राहकों को 4जी नेटवर्क पर मामूली दरों पर डेटा मुहैया कराना शुरू किया। इसके नतीजतन देश में इंटरनेट का उपयोग 100 गुना बढ़ा है। 

कंपनी ने जो बुनियादी बदलाव शुरू किया है, वह कन्वर्जेन्स को बढ़ावा देना है। उपभोक्ताओं के लिए मोबाइल डिवाइस टीवी की जगह वीडियो, फिल्म, खेल और मनोरंजन का वैकल्पिक प्लेटफॉर्म बन गए हैं। अचानक बहुत से घरों में मोबाइल दूसरा व्यक्तिगत टेलीविजन बन गया है। अब 10 करोड़ से अधिक सक्रिय ग्राहक मनोरंजन और समाचारों के लिए ओटीटी प्लेटफॉर्मों का इस्तेमाल कर रहे हैं। 

ये सभी बदलाव ग्राहकों के लिए अच्छे रहे। लेकिन वोडाफोन, टेलीनॉर, मैक्सिस, सिस्तेमा और एतिसलात जैसी विदेशी कंपनियों ने भारत में निवेश किया था, लेकिन उन्हें नुकसान उठाना पड़ा। वे नियामकीय बदलावों, गला-काट प्रतिस्पर्धा, कर अधिकारियों या अदालतों में अपना पक्ष नहीं रख पाए। टेलीनॉर और एमटीएस (जिसने दूसरी बार वापसी की कोशिश की) जैसी कंपनियों को भारी घाटा उठाना पड़ा। उनमें से ज्यादातर ने अपना कारोबार औने-पौने दामों पर बेच दिया। इसके नतीजतन विदेशी दूरसंचार कंपनियों को 25 अरब डॉलर से अधिक का घाटा उठाना पड़ा। वोडाफोन ने कहा है कि उसे अपना कारोबार बंद करना पड़ सकता है। 

इस प्रतिस्पर्धा में खुद को बचाने में सफल रहने वाली कंपनियों का कर्ज बढ़कर बहुत ऊंचे स्तर पर पहुंच गया। उन्हें महंगी कीमत पर स्पेक्ट्रम खरीदना पड़ा, जिसकी आधार कीमत कृत्रिम रूप से ऊंची रखी गई थी ताकि सरकार मोटी कमाई कर सके। यही वजह है कि उद्योग का कर्ज पिछले एक दशक में सात गुना बढ़कर सात लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया है, जो वर्ष 2010 में महज 1.2 लाख करोड़ रुपये था। इस वजह से रिलायंस कम्यूनिकेशंस और एयरसेल को ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) से गुजरना पड़ा क्योंकि वे अपने ऋणों को चुकाने की स्थिति में नहीं थीं। 

इस समस्या की गंभीरता का आकलन इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि एबिटा के प्रतिशत के रूप में उद्योग का ब्याज का बोझ दोगुना हो गया है। यह वित्त वर्ष 2018 की तीसरी तिमाही में 41 फीसदी था, जो 2019 की चौथी तिमाही में 80 फीसदी हो गया। हालांकि यह सही है कि ग्राहकों की तरह सरकार को भी फायदा मिला है। हालांकि उद्योग का सरकारी खजाने में योगदान 2019 की चौथी तिमाही में घटकर 31 अरब रुपये पर आ गया, जो 2017 की पहली तिमाही में 51 अरब रुपये था। इसकी वजह यह है कि कंपनियों का राजस्व घटा है, उन पर ब्याज का बोझ बढ़ा और लाभ में गिरावट आई है। संचार मंत्री ए राजा के दो फैसलो से उठापटक वाले दशक की शुरुआत हुई। वर्ष 2009 के अंत में पहली बड़ी नीलामी में महज 5 मेगाहट्र्ज 3जी स्पेक्ट्रम की नीलामी की गई। इस तरह ए राजा ने कड़ी प्रतिस्पर्धा की नींव रख दी थी। दूरसंचार कंपनियों ने 67,000 करोड़ रुपये खर्च किए।

इसके बावजूद एयरटेल जैसी कंपनियों को देश भर में स्पेक्ट्रम नहीं मिल पाए। इस फैसले ने तीन काम किए। इससे दूरसंचार कंपनियों को स्पेक्ट्रम खरीदने के लिए ज्यादा कर्ज लेना, जिससे कर्ज का चक्र शुरू हुआ और यह कभी खत्म ही नहीं हुआ। इससे 3जी सेवाओं की दरें ऊंची बनी रहीं, जिससे डेटा का उपयोग आकर्षक नहीं रह गया। इससे मोबाइल सेवाओं की शुरुआत धीमी पड़ गई। राजा के दूसरे फैसले का विनाशकारी असर पड़ा। उन्होंने नए ऑपरेटरों को लाइसेंस देने के लिए नियम बदल दिए। उन्होंने पहले आओ, पहले पाओ का नियम लागू किया।

माना जाता है उन्होंने यह कदम कथित रूप से अपने दोस्तों की मदद के लिए उठाया। इस क्षेत्र में चार-पांच नई कंपनियों के आने से प्रतिस्पर्धा बढ़ी। जब 15 कंपनियां दरें घटाकर बाजार हिस्सेदारी हासिल करने की कोशिश कर रही थीं, उस समय जून 2010 में दूरसंचार कंपनियों का औसत एआरपीयू गिरकर 100 रुपये से नीचे आ गया। लेकिन सबसे बुरा दौर उस समय आया, जब सीएजी की रिपोर्ट का संज्ञान लेकर उच्चतम न्यायालय ने 122 लाइसेंस रद्द करने का फैसला किया। इन लाइसेंस में टेलीनॉर, सिस्तेमा और एतिसलात के लाइसेंस भी शामिल थे। राजा को जेल जाना पड़ा। सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि लाइसेंस और स्पेक्ट्रम मुफ्त में देने से सरकारी खजाने को 1,76,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। 

जो कंपनियां वजूद बचा पाईं, उन्हें इस बात से राहत मिली कि लाइसेंस रद्द होने के बाद दूरसंचार कंपनियों की संख्या में कमी आई है। वे अब ग्राहक गंवाए बिना शुल्क बढ़ा सकेंगी और अपनी आमदनी सुधार सकेंगी। लेकिन अब यह साफ हो गया था कि सभी स्पेक्ट्रम का आवंटन सरकार करेगी। यूएएसएल लाइसेंस शुरू करने से स्पेक्ट्रम को सेवाओं से हटाया जाएगा ताकि दूरसंचार कंपनियां किसी भी सेवा के लिए कोई भी स्पेक्ट्रम-2जी, 3जी या 4जी इस्तेमाल कर सकेंगी। 

इसके बाद 2015 में 900 मेगाहट्र्ज बैंड की नीलामी में कड़ी प्रतिस्पर्धा देखने को मिली, जिसमें कीमतें तीन से पांच गुना बढ़ गईं। मौजूदा कंपनियों के लिए इस बैंड का लाइसेंस खत्म हो रहा था, लेकिन यह 4जी के लिए लोकप्रिय बैंड था। सभी दूरसंचार कंपनियों ने महज दो वर्षों 2015-2016 में स्पेक्ट्रम पर 1,75,000 करोड़ रुपये खर्च किए, जबकि उन्होंने दूरसंचार सेवाएं शुरू करने से लेकर अब तक 1,50,000 करोड़ रुपये ही खर्च किए थे। इस वजह से उन पर कर्ज बढ़ा। 

दूसरी चुनौती जियो की शुरुआत से पैदा हुई। इसने वॉयस मुफ्त और डेटा 95 फीसदी सस्ती दरों पर मुहैया कराया। महज एक साल में डेटा का इस्तेमाल आठ गुना बढ़ गया। नियामक ने भी जियो को छह  महीनों तक मुफ्त सेवाएं मुहैया कराने की मंजू्री दे दी, जिसका पहले से मौजूद ऑपरेटरों पर बुरा असर पड़ा। मौजूदा कंपनियों के पास शुल्क दरें घटाकर जियो के बराबर स्तर पर लाने और 4जी सेवाओं के लिए निवेश बढ़ाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था। भारती एयरटेल नुकसान उठाकर भी अपनी राजस्व हिस्सेदारी बनाए रखने में कामयाब रही। वोडाफोन आइडिया ने विलय किया और उसे ग्राहक और राजस्व हिस्सेदारी के मोर्चे पर नुकसान उठाना पड़ रहा है। कंपनी कर्ज में भी डूबती जा रही है। 

रही-सही कसर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने पूरी कर दी। अदालत ने दूरसंचार कंपनियों को एजीआर बकाये के रूप में 1,44,000 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि चुकाने का निर्देश दिया है। वोडाफोन आइडिया ने साफ कर दिया है कि अगर सरकार ने भुगतान में कोई राहत नहीं मुहैया कराई तो वह परिचालन बंद कर देगी। भारती एयरटेल बेहतर स्थिति में है। वह यह बकाया चुकाने के लिए डेट और इक्विटी के रूप में तीन अरब डॉलर जुटा रही है। दोनों कंपनियां अदालतों में अपनी पुनर्विचार याचिका सुने जाने का इंतजार कर रही हैं। हालांकि दूरसंचार कंपनियों ने शुल्क 15 से 40 फीसदी तक बढ़ाए हैं। लेकिन यह उच्चतम न्यायालय की चोट को भरने में पर्याप्त नहीं है। इस बाजार का भविष्य दो चीजों पर निर्भर करता है। अगर वोडाफोन आइडिया बंद हो जाती है तो रिलायंस जियो और भारती एटरटेल उसके 30 करोड़ से अधिक ग्राहक हासिल कर सकती हैं। यह इस चीज पर निर्भर करता है कि उच्चतम न्यायालय पुनर्विचार याचिका पर अनुकूल फैसला देता है या नहीं और सरकार एजीआर बकाये को कई किस्तों में चुकाने की सुविधा देती है या नहीं।

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