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नोटबंदी, जीएसटी और अन्य चुनौतियों के बावजूद मूल्यांकन चढ़ा

विशाल छाबडिय़ा /  December 29, 2019

कुछ खास घटनाक्रम और नोटबंदी, जीएसटी क्रियान्वयन जैसे कुछ ढांचागत सुधारों, कुछ बड़े व्यावसायिक घरानों पर दबाव की वजह से पिछले दशक में भारतीय बाजारों में अनिश्चितता दर्ज की गई। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि बीएसई के सेंसेक्स और निफ्टी-50 में सालाना आधार पर 9 प्रतिशत की वृद्घि दर्ज की गई, जो दशक के पहले पांच वर्षों में ऊंची मुद्रास्फीति को देखते हुए औसत दर्जे का प्रतिफल है।

हालांकि मिड-कैप और स्मॉल-कैप सूचकांकों ने इस अवधि के दौरान 5 और 8 प्रतिशत के बीच प्रतिफल दिया।  बाजारों में मजबूती आई है और निवेशक सतर्क हो गए हैं, लेकिन कुछ खास जोखिमों को मौजूदा समय में नजरअंदाज किया जा रहा है। पिछले दशक से पहले वैश्विक वित्तीय संकट देखने को मिला था। वर्ष 2008 में अमेरिका स्थित लीमन ब्रदर्स के पतन के साथ इस वित्तीय संकट की शुरुआत हो गई थी। इसके बाद पैदा हुए नकदी दबाव से केंद्रीय बैंकों को अपने संबद्घ देशों में कंपनियों से बॉन्ड खरीदारी के लिए बड़ी पूंजी लगाने के लिए बाध्य होना पड़ा जिसे 'क्वांटीटेटिव ईजिंग' (क्यूई) करार दिया गया। यह एक निर्णायक घटनाक्रम था जिसमें ब्याज दरें घटकर शून्य के आसपास आ गई थीं और प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के लिए पैसा जुटाना सस्ता माध्यम हो गया था। बोफा सिक्योरिटीज में भारतीय इक्विटी रणनीतिकार संजय मुकीम का कहना है, 'कई तेजी के दौर के साथ पिछले 10 वर्ष वैश्विक इक्विटी के लिए असामान्य अवधि रही। सभी वैश्विक इक्विटी बाजारों में घटनाक्रम वृद्घि के रुझानों के बजाय केंद्रीय बैंकों की मौद्रिक नीतियों से ज्यादा संबद्घ रहे।'

हालांकि, वैश्विक रूप से अर्थव्यवस्थाएं चिंताओं से बाहर निकलती नहीं दिख रही हैं। इसका एक संकेतक  यह है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था को फेडरल रिजर्व द्वारा क्यूई वापस लिए जाने और ब्याज दरें बढ़ाने के बाद मंदी का सामना करना पड़ा। अर्थव्यवस्था में नकदी डाले जाने से भारतीय बाजारों को भी फायदा हुआ, हाालांकि आर्थिक और कॉरपोरेट आय वृद्घि की रफ्तार धीमी बनी रही। मुकीम का मानना है, 'भारतीय भारतीय मजबूत हो रहे हैं, भले ही अर्थव्यवस्था कमजोर है।' हालांकि प्रमुख घटनाक्रम और ढांचागत सुधारों ने बीच बीच में बड़ी तेजी में योगदान दिया है। जहां इन घटनाक्रम का समाज के बड़े वर्ग पर विपरीत प्रभाव पड़ा, वहीं शेयर बाजार से भी आय सीमित रही। पिछले पांच वर्षों में से तीन में सेंसेक्स की आय में कमी दर्ज की गई और पिछले पांच साल में 1 प्रतिशत से ज्यादा की औसत आय वृद्घि दर्ज की गई।

एडलवाइस फाइनैंशियल सर्विसेज के उप-मुख्य कार्याधिकारी (पूंजी बाजार परामर्श) शिव सैगल ने कहा, 'जीडीपी के प्रतिशत के तौर पर 2008-09 में शेयर बाजार से आय 5.6 प्रतिशत पर अपने चरम पर थी जो गिरकर 2.7 प्रतिशत के सर्वाधिक निचले स्तर पर आ गई। अमेरिका में यह 7.1 प्रतिशत से बढ़कर 13 प्रतिशत हो गई।'

आय में इस गिरावट की वजह से भारतीय बाजार अपने वैश्विक प्रतिस्पर्धियों से पिछड़ गए। नोटबंदी, जीएसटी और रियल एस्टेट में मंदी, नकदी संकट जैसे बड़े घटनाक्रम रोजगार सृजन और खपत में कमजोरी के लिए काफी हद तक जिम्मेदार रहे। कमजोर गुणवत्ता, कम वृद्घि या कर्ज से जुड़ी कंपनियां बाजार में उतार-चढ़ाव के लिए जिम्मेदार रहीं और इससे कुछ खास शेयरों का मूल्यांकन वर्ष के ऊंचे स्तरों पर पहुंच गया। निफ्टी-50 के 28 शेयर 20 गुना के पीई अनुपात से ऊपर कारोबार कर रहे हैं, जिनमें 14 शेयर 30-81 गुना के दायरे में हैं। मोतीलाल ओसवाल फाइनैंशियल सर्विसेज के शोध प्रमुख (इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज) गौतम दुग्गड का कहना है, 'निवेशक अब कॉरपोरेट प्रशासन, प्रबंधन, ऑडिटिंग और बैलेंस शीट की गुणवत्ता पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप, बाजार कुछ शेयरों के पक्ष में केंद्रित हो गए हैं।'बाजार अब ज्यादा तरल हो गए हैं क्योंकि इनमें निवेश के लिए ज्यादा शेयर/क्षेत्र मौजूद हैं। उदाहरण के लिए, वित्तीय क्षेत्र में, परिसंपत्ति प्रबंधक (एएमसी), जीवन और सामान्य बीमा कंपनियां, ब्रोकरेज और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां हैं। खपत सूची वाले क्षेत्रों में अब डिस्क्रेशनरी, क्विक सर्विस कंपनियां, मल्टीप्लेक्स, रिटेलर आदि शामिल हैं।

विश्लेषकों का मानना है कि निवेशक और बाजार अब सतर्क हो रहे हैं। मुकीम कहते हैं, 'निवेशक (भारतीय और विदेशी) अधिक सक्षम हो गए हैं। शोधों और विश्लेषणों की गहनता बढ़ी है।' निवेशकों के समझदार होने का एक अन्य संकेत यह है कि एसआईपी (व्यवस्थित निवेश योजनाओं) का मासिक योगदान 5-6 साल पहले के लगभग 2,000 करोड़ रुपये से बढ़कर पिछले 18 महीनों में 8,000 करोड़ रुपये हो गया, भले ही जीडीपी वृद्घि घटकर 4.5 प्रतिशत रह गई।

उनका कहना है, 'पिछले 7-8 वर्षों में, संस्थागत पूंजी प्रवाह का रुझान घरेलू निवेशकों के पक्ष में रहा। वर्ष 2006 और सितंबर 2019 के बीच, कुल घरेलू संस्थागत पूंजी प्रवाह 55 अरब डॉलर का था। इसमें 45-46 अरब डॉलर वर्ष 2014 के बाद एसआईपी और एकमुश्त निवेश के जरिये आया। इसका मतलब है कि खुदरा निवेशक अपनी दिलचस्पी बढ़ा रहे हैं और बाजार में उतार-चढ़ाव से ज्यादा डरे हुए नहीं हैं।' वह कहते हैं, 'शुरू में, निवेशक तेजी के उत्साह में निवेश करते थे और अनिश्चितता के समय बिक्री करते थे। अब ऐसा देखने को नहीं मिल रहा है। यह बेहद सकारात्मक बदलाव है।' वैकल्पिक निवेश फंडों, रियल एस्टेट निवेश ट्रस्टों, इन्फ्रास्ट्रक्चर निवेश ट्रस्टों की बढ़ती लोकप्रियता, और पोर्टफोलियो प्रबंधन सेवाओं की परिसंपत्तियों में तेजी से जोखिमों और नई योजनाओं के लिए निवेशकों की बढ़ती दिलचस्पी का पता चलता है।

ज्यादा सॉवरिन वेल्थ फंडों, पारिवारिक कार्यालयों, जीवन एवं सामान्य बीमा कंपनियों, और पेंशन फंडों के साथ बाजार अब ज्यादा सक्षम हो गए हैं। आय में कमी स्पष्टï दिख रही है। मुकीम कहते हैं, 'हम वित्त वर्ष 2021 में भी आय अनुमानों में कटौती देखेंगे, क्योंकि उम्मीदें गैर-वास्तविक हैं। बाजार वैश्विक कारकों की वजह से चढ़े हैं। लेकिन क्या आय में कमी बाजारों में गिरावट का संकेत है? मैं इसे लेकर आश्वस्त नहीं हूं।'

अन्य जोखिम तब पैदा हो सकता है जब बाजार 'ग्रोथ' से 'वैल्यू' थीम पर केंद्रित हों। यदि निवेशक सतर्कता के साथ दांव नहीं लगाते हैं तो उन्हें नुकसान उठाना पड़ सकता है। वैश्विक व्यापारिक तनाव अन्य निर्णायक कारक हो सकता है। हालांकि अमेरिका-चीन व्यापारिक टकराव का पहला चरण समाप्त हो चुका है, जिससे लंबे 'वैश्वीकरण' थीम की वापसी का संकेत माना जा रहा है। 

अल्पावधि में, भारतीय बाजार अस्थिर बने रह सकते हैं, क्योंकि देश की जीडीपी और कॉरपोरेट आय में धीमी गति से सुधार आने का अनुमान है। दीर्घावधि में, जहां कुछ मौजूदा कंपनियां/क्षेत्र अग्रणी बने रहेगे, वहीं नए क्षेत्र और कंपनियां भी इस दौड़ में शामिल हो सकती हैं। विश्लेषकों को यह भी उम्मीद है कि वृद्घि काफी हद तक सभी बाजारों में दिखेगी। दुग्गड़ का कहना है, 'हमें अब तक जनसांख्यिकी का कोई लाभ नहीं मिला है। लेकिन जब हम 2.7 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था से 5 लाख करोड़ डॉलर से ज्यादा की अर्थव्यवस्था में तब्दील हुए हैं, तो बाजार में कुछ सेगमेंट (बचत का लाभ, अधिक खपत वाले क्षेत्रों का उभार आदि) पर इसका असर दिखेगा और शेयरधारकों को फायदा होगा।'

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