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शिशु की देखभाल में फैमिली फ्लोटर हेल्थ प्लान फायदेमंद

संजय कुमार सिंह /  December 29, 2019

स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च तेजी से बढ़ रहा है और यह केवल बड़े-बुजुर्गों तक ही सीमित नहीं रह गया है। इन दिनों अस्पताल माता-पिता पर बच्चों (छोटे शिशु से लेकर स्कूल जा रहे बच्चों की) की सालाना स्वास्थ्य की जांच कराने के लिए जोर दे रहे हैं। अस्पतालों ने ऐसी जांच के लिए अलग-अलग पैकेज भी तय कर रखे हैैं। जिन शादी-शुदा जोड़ों के नवजात शिशु होते हैं उनके खर्च में अचानक तेजी आ जाती है। 

शिशु के जन्म से पहले ही स्वास्थ्य संबंधी खर्च शुरू हो जाते हैं। सामान्य जांच के अलावा किसी नामचीन अस्पताल में सामान्य प्रसव पर 50,000 से 70,000 रुपये खर्च आ सकता है, जबकि किसी महानगर में सी-सेक्शन (शल्य चिकित्सा के जरिये प्रसव कराने का विभाग) में 1.0 से 1.5 लाख रुपये का बिल आ सकता है।  पॉलिसीबाजार डॉट कॉम में बिजनेस हेड (हेल्थ इंश्योरेंस) अमित छाबड़ा कहते हैं,'ज्यादातर स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियां प्रसव को बीमा लाभ के दायरे में नहीं रखती हैं। इस तरह, इसका भुगतान अपनी जेब से ही करना होगा। कुछ पॉलिसियों की जद में यह खर्च आता है, लेकिन इसे लिए एक से चार वर्ष तक इंतजार करना पड़ता है।'

नियोक्ता द्वारा दिए गए स्वास्थ्य बीमा में मातृत्व खर्च शामिल हो सकता है, लेकिन यह प्राय: 25,000 से 50,000 रुपये तक सीमित होता है। ज्यादातर मामलों में यह अर्याप्त साबित होता है। छाबड़ा का कहना है कि अगर आप स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी खरीदना चाहते हैं, जिसमें मातृत्व सुरक्षा भी शामिल है तो विवाह उपरांत तत्काल इस दिशा में पहल करें ताकि शिशु के आने से पहले ही प्रतीक्षा अवधि निकल जाए। 

शिशु के जन्म के बाद महीने में कम से कम एक बार शिशु रोग विशेषज्ञ के पास जाना पड़ सकता है। महानगरों में शुरुआती कुछ वर्षों में माता-पिता केवल सामान्य जांच और टीकाकरण पर सालाना 10,000 से 30,000 रुपये खर्च कर देते हैं। इन दिनों माता-पिता दर्द रहित टीकाकरण (पेनलेस वैक्सीनेशन) का विकल्प चुनते हैं, जिससे बच्चों को कम से कम तकलीफ होती है और टीकाकरण के बाद बुखार भी नहीं लगता है। हालांकि ऐसे टीकों की कीमत 3 से 4 गुना अधिक हो सकती है। 

किसी वयस्क के मुकाबले बच्चों में संक्रमण का खतरा अधिक रहता है। किसी संक्रमण के कारण अस्पताल में भर्ती होने पर 1.5 से 5.0 लाख रुपये या इससे अधिक बिल आ सकता है। शिशु के 90 दिन के होने के साथ ही उसे फैमिली हेल्थ फ्लोटर कवर में शामिल कर लेना चाहिए। कुछ बीमा कंपनियां वर्ष में कभी भी ऐसा करने की अनुमति देती हैं और कुछ पॉलिसी के नवीकरण के समय यह सुविधा देती हैं। बाद के मामले में शिशु को बिना किसी बीमा सुरक्षा के कई महीनों तक रहना पड़ सकता है। 

पॉलिसी में व्यक्तियों की संख्या बढऩे के साथ ही बीमित राशि भी बढऩी चाहिए। ऐसा प्रीमियम भुगतान के समय किया जा सकता है। मणिपालसिग्ना हेल्थ इंश्योरेंस में उपाध्यक्ष एवं प्रमुख (उत्पाद विभाग) आशिष यादव कहते हैं,'शिशु के पॉलिसी में जुडऩे के बाद बीमित राशि कम से कम 30 से 50 प्रतिशत बढ़ाई जानी चाहिए।'

किसी परिवार की बीमित रकम की जरूरत उसके बजट सहित कई बातों पर निर्र्भर करती है। बजाज आलियांज जनरल इंश्योरेंस में हेड (रिटेल अंडरराइटिंग) गुरदीप सिंह बत्रा कहते हैं, 'जिस तरह स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ रहा है उस स्थिति में 10 लाख रुपये की बीमित रकम लेने की सलाह दी जाती है। किसी परिवार को कम से कम 5 लाख रुपये बीमित रकम होनी चाहिए।'

पति-पत्नी को संतानोत्पत्ति की योजना बनाने के साथ ही संबंधित खर्चों के लिए कोष तैयार करना शुरू कर देना चाहिए। हालांकि इस कोष का आकार परिवार की माली स्थिति पर निर्भर करता है, लेकिन फिनस्कोलार्ज वेल्थ मैनेजनर में सह-संस्थापक एवं मुख्य सलाहकार रेणु माहेश्वरी एक मोटा अनुमान आंकड़ा बताती हैं। वह कहती हैं, 'सबसे पहले पति-पत्नी को तीन से छह महीने की आय का एक आपात कोष तैयार करना चाहिए। इसके अलावा अगर पत्नी कामकाजी है तो उसे कम से कम दो वर्षों के बराबर व्यक्तिगत खर्च के लिए रकम जमा करनी चाहिए।'

रेणु के अनुसार युवा महिलाएं यह अक्सर मान कर चलती हैं कि छह महीने का मातृत्व लाभ अवकाश समाप्त होने के बाद वे काम पर दोबारा लौट जाएंगी। वह कहती हैं, 'अगर उपलब्ध समय तीन साल से अधिक है तो यह कोष तैयार करने के लिए इक्विटी फंड का इस्तेमाल करना चाहिए और समय अवधि इससे कम है तो बैलेंस्ड फंड का इस्तेमाल किया जा सकता है। शिशु के जन्म का समय नजदीक पहुंचने पर यह कोष लिक्विड फडों में डाला जा सकती है।'
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