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अतीत की खतरनाक राह पर लौटता भारत

शेखर गुप्ता /  December 29, 2019

एक के बाद एक बिगड़ते आर्थिक सूचकांकों के बीच यह बात साफ नजर आती है कि आज बेरोजगारी 45 साल के सबसे भीषण स्तर पर है। बेरोजगारी का यह हाल हमें सीधे 1974 में ले जाता है। उस वक्त इंदिरा गांधी लोकप्रिय थीं, लेकिन धीरे-धीरे उनसे मोहभंग हो रहा था। फिर भी निराश मतदाताओं को यही लगता था कि दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है। सभी आर्थिक सूचकांक लुढ़क रहे थे, मुद्रास्फीति 35 फीसदी पर थी फिर भी राष्ट्रवाद चरम पर था।

यह सब जाना पहचाना लग रहा है न? मुद्रास्फीति यानी महंगाई को छोड़ दें तो आज बाकी सब कुछ 1974 जैसा ही लग रहा है। निष्ठावान अनुयायियों वाली पार्टी का जबरदस्त लोकप्रियता वाला नेता, बिखरा हुआ विपक्ष, राष्ट्रवादी उफान और ढहती अर्थव्यवस्था, बढ़ती बेरोजगारी। भारत विरोधाभासों की धरती भर नहीं है। यह तो एक ही पीढ़ी के भीतर दो एकदम विपरीत विचारधाओं के अंतर्गत एक ही जैसा बड़ा विरोधाभास पैदा करके भी दिखा सकता है।

थोड़ा और पीछे, 1971 में चलते हैं। इंदिरा गांधी ने उसी साल कांग्रेस के दोफाड़ किए और विपक्षी पार्टियों के एकजुट होने के बाद भी कांग्रेस के दूसरे खेमे के पुराने कद्दावरों को हराकर प्रसिद्घ चुनाव जीता। 1971 के आरंभ में उन्होंने 'गरीबी हटाओ' का जनवादी नारा दिया। साल बीतते-बीतते वह पाकिस्तान को हटाकर और दो टुकड़ों में बांटकर 'मां दुर्गा' का अवतार बन चुकी थीं। वह चमत्कारी बन चुकी थीं।

लेकिन समाजवाद और राष्ट्रवाद का यह दोहरा मुलम्मा भारत के विद्रूप यथार्थ को ढक रहा था। राष्ट्रीयकरण की उनकी सनक से अर्थव्यवस्था चरमरा रही थी, उद्यमी लाइसेंस कोटा राज तले कराह रहे थे, कराधान की बेहद ऊंची दर (97.5 फीसदी) ने काली यानी समांतर अर्थव्यवस्था तैयार कर दी थी, जिसे मात नहीं दी जा सकी थी। जंग पर हुए खर्च ने हालत और बुरी कर दी थी। लेकिन याद रखिए कि राजनीति आंकड़ों से नहीं चलती बल्कि जनता की मंशा या 'हवा' पर चलती है।

1971 ही वह साल था, जब कवि-गीतकार गुलजार ने अपनी पहली फिल्म 'मेरे अपने' बनाई थी। फिल्म मीना कुमारी के इर्द-गिर्द घूमती थी, जो शहर में गरीब और बेसहारा बूढ़ी के तौर पर आईं और युवाओं के एक झुंड ने उन्हें सहारा दिया। युवाओं के किरदार निभाने वाले कुछ नाम आगे जाकर बहुत बड़े हो गए। उनके पास डिग्रियां थीं, सपने थे, लेकिन नौकरी नहीं थी। इसलिए उनके पास नाउम्मीद रहने, शरारत करने या सड़कों पर लडऩे के अलावा कोई और काम ही नहीं था।

मगर वे युवक खुद पर हंस सकते थे और गुलजार ने उनके लिए हताशा भरे उन दिनों का गीत भी लिखा था: 'हाल चाल ठीक ठाक है...' इसे चलाइए, पंक्तियां सुनिए। हर पंक्ति पर आप रुकेंगे और सोचेंगे कि मैं उन दिनों की बात क्यों कर रहा हूं।

नमूना देखिए: 'बीए किया है, एमए किया, लगता है वह भी ऐवेंइ किया/काम नहीं है वरना यहां, आपकी दुआ से बाकी ठीक-ठाक है...' गुलजार 2019 में भी यही लिखते। लेकिन वह इसे फिर से पेश कर सकते हैं और कह सकते हैं कि अभी लिखा है। आपको पता नहीं चलेगा।

2014 की दुनिया जीत लेने वाले आशावाद से हम इस हालत तक कैसे पहुंच गए, इस पर बात करने से पहले देखना चाहिए कि 1971 में अर्श पर उड़ रहे भारत और इंदिरा गांधी का 1974 जैसा हश्र क्यों हुआ। मार्च 1971 की अभूतपूर्व जीत और विपक्ष की दुर्गति का ऐसा नशा चढ़ा कि इंदिरा और उनके विचारधारा (वामपंथी) में पगे सलाहकार समाजवाद के जहर में डूबते ही चले गए।

उसके बाद जब भारत की अर्थव्यवस्था सबसे नाजुक दौर में थी तब दोहरी चोट लगी। पहला योम किपर युद्घ (अक्टूबर 1973) के कारण लगा तेल का झटका था, जिसे वह काबू नहीं कर सकीं। दूसरा, गेहूं के थोक व्यापार का राष्ट्रीयकरण था, जो उन्होंने 'आ बैल मुझे मार' की तरह खुद किया। उनके कम्युनिस्ट सलाहकारों ने कहा कि अगर यह सोवियत संघ में कारगर रहा तो यहां भी होगा। लेकिन यह कारगर नहीं रहा।

इसके बाद दुर्गति बढ़ती गई, गेहूं के दाम चढ़ते गए, किसानों में आक्रोश भरता गया और कारोबारी तथा निजी ग्रामीण बिचौलिये बेरोजगार हो गए। उनकी यह हरकत चीन की गौरैया के खिलाफ माओ की जंग सरीखी थी। इंदिरा ने यह फैसला वापस तो ले लिया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। 1974 की आखिरी तिमाही आते-आते भारत की मुद्रास्फीति दर 34.7 फीसदी तक चढ़ गई और इंदिरा की लोकप्रियता बहुत घट गई। देश भर में विरोध, नवनिर्माण आंदोलन फूट पड़ा, जिसमें बेरोजगार युवक और गुस्साए छात्र शामिल थे। यह भी आजकल की ही बात लग रही है न?

कोई रास्ता नहीं बचा तो इंदिरा ने 'राष्ट्रवाद' का अपना पुराना पत्ता फेंका। पहले पोकरण-1 परमाणु परीक्षण (मई 1974) हुआ। उसका खुमार कुछ हफ्ते ही रहा क्योंकि लोगों की मुश्किलें बहुत बढ़ चुकी थीं। उन्होंने आखिरी पासा मई 1975 में फेंका, जब सिक्किम का विलय किया गया। लेकिन नाराज जनता पीछे हटने का तैयार नहीं थी। एक महीने बाद आपातकाल लग गया।

मैं यह नहीं कह रहा कि इस बार भी हम उसी हालत में पहुंच जाएंगे। मैं केवल इतना कह रहा हूं: यदि लोगों को लंबे समय तक बेरोजगारी और आर्थिक ठहराव झेलना पड़ता है तो राष्ट्रवाद से उनका गुस्सा शांत नहीं होता।

इसी बात पर एक बार फिर फिल्मों का रुख करते हैं क्योंकि हमें पता है कि फिल्मकार किसी भी विश्लेषक से पहले ही अपने बाजार यानी जनता की नब्ज पकड़ लेते हैं। 'मेरे अपने' के बाद 'शोर', 'रोटी कपड़ा और मकान' और गरीबी, शोषण, महंगाई (बाकी कुछ बचा तो महंगाई मार गई बड़ा हिट हुआ था) के इर्द-गिर्द बुनी गई तथा बेरोजगार नायकों वाली फिल्मों का दौर आ गया। यही आगे चलकर 'एंग्री यंग मैन' के दौर में बदल गया। लेकिन फिलहाल मैं उसकी बात नहीं कर रहा हूं।

आपको क्या लगता है? इतिहास ने खुद को दोहराना कब से शुरू किया? आपमें से कुछ को हालिया आम चुनाव से इसकी शुरुआत लग सकती है, जिसमें मिली जीत ने डगमगाती अर्थव्यवस्था के बाद भी मोदी सरकार को घमंडी बना दिया। अगर लोग अर्थव्यवस्था की इतनी बुरी गति के बाद भी हमें वोट देते हैं तो इसका मतलब है कि आपको सामाजिक-राष्टï्रवादी खुमार बनाए रखना है। आप इसमें धर्म का तड़का भी लगा सकते हैं। इसलिए अर्थव्यवस्था सुधारने में जुटने के बजाय अनुच्छेद 370 ले आओ, मंदिर की बात करो, नागरिकता संशोधन कानून ले आओ। आर्थिक आंकड़े हर तिमाही बद से बदतर होते भी जाएं तो फिक्र कैसी।

आप नरेंद्र मोदी के पहले कार्यकाल के शुरुआती दिनों को याद करें, जब 'सूट-बूट की सरकार' के साथ ही भूमि अधिग्रहण कानून पर सरकार को मुंह की खानी पड़ी थी। यह देखते ही मोदी ज्यादा राष्ट्रवाद और सामाजिक जनवाद का रास्ता पकड़कर भ्रष्टïाचार से लडऩे वाले बन गए थे। नोटबंदी के जरिये उन्होंने अपने पांव पर पहली कुल्हाड़ी मारी। सीएए-एनआरसी-एनपीआर का झमेला दूसरी कुल्हाड़ी लग रहा है क्योंकि सबसे पहले तो यह देश को इस तरह बांट रहा है, जैसा दशकों में नहीं हुआ। दूसरा, इस पर दुनिया भर में सीधी आलोचना बेशक नहीं हुई हो, लेकिन निराशा तो जताई ही गई है, जिसे आप नजरअंदाज नहीं कर सकते। हम वैश्विक दुनिया में रह रहे हैं, जहां भारत के हित 1974 से काफी अलग हैं। तीसरा, इंदिरा के अच्छे दिनों के उलट अब भारत संघशासित है। आप मुख्यमंत्रियों को हुक्म नहीं दे सकते और न ही अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल कर उन्हें बर्खास्त कर सकते हैं।

1974 वाले इस अहसास से हम कहां जाएंगे? हमें पता है कि 1975 की गर्मियों तक इंदिरा हमें कहां ले गई थीं। फैसला मोदी के हाथ है। बेशक वह उस वक्त की इंदिरा से ज्यादा लोकप्रिय और ताकतवर हैं, लेकिन भारत आज 1975 से बहुत अलग है।

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