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भारतीय मनोरंजन उद्योग बन सकता है विकास का इंजन

वनिता कोहली-खांडेकर / नई दिल्ली December 27, 2019

वर्ष 2010- माई नेम इज खान के निर्देशक करण जौहर और मुख्य अभिनेता शाहरुख खान जब आधी फिल्म बना चुके थे तो उन्हें लगा कि उन्हें एक ऐसे स्टूडियो की जरूरत है जो उनकी फिल्म को भारतीय दर्शकों से परे ले जा सके। यह अधिकांश भारतीय फिल्मों के लिए एक मुश्किल काम था। उन्होंने फॉक्स स्टार से संपर्क किया जिसने फिल्म को अपने हाथ में लिया और इसके पीछे अपनी पूरी ताकत झोंक दी। माई नेम इज खान 68 देशों में 1,400 सिनेमाघरों में रिलीज की गई और 65 देशों में इसे टीवी स्क्रीनों पर दिखाया गया। यह किसी भी भारतीय फिल्म के लिए नई बात थी। इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस और टीवी अधिकारों से 10 करोड़ डॉलर से अधिक कमाई की और यह उस समय तक दुनिया में भारत की सबसे सफल फिल्म थी। क्या हमारी कहानियां देश की सीमाओं से बाहर निकल गई थीं?

वर्ष 2019- जुलाई 2018 में हिंदी शो सेक्रेड गेम्स की 190 देशों में नेटफ्लिक्स के 12.5 करोड़ ग्राहकों के लिए स्ट्रीमिंग शुरू हुई। द गार्डियन से लेकर द न्यूयॉर्क टाइम्स तक हर बड़े प्रकाशन समूह ने इसकी समीक्षा की। एक वर्ष बाद सितंबर 2019 में इसे लस्ट स्टोरीज (नेटफ्लिक्स) और द रीमिक्स इंडिया (एमेजॉन प्राइम वीडियो) के साथ इंटरनैशनल ऐमी अवाड्र्स के लिए नामांकित किया गया। उसी महीने द फैमिली मैन का लॉस एंजिलिस में प्रीमियर हुआ और फिर इसे एमेजॉन प्राइम वीडियो पर 200 देशों में 7.5 करोड़ घरों में दिखाया गया। एमेजॉन प्राइम वीडियो अभी 12 भारतीय शो दिखा रही है और आगे 30 और शो आने वाले हैं। कंपनी के उपाध्यक्ष जय मरीन कहते हैं कि ये शो देखने वाले तीन दर्शकों में से एक भारत से बाहर का है। इस बीच सेक्रेड गेम्स ने द न्यूयॉर्क टाइम्स की इस दशक की 30 सर्वश्रेष्ठï इंटरनैशनल सीरीज में जगह बनाई है।  

इसमें दूरसंचार, प्रौद्योगिकी और मीडिया कंपनियों के बीच दर्शकों को खींचने की होड़ मची है। गूगल, एमेजॉन, एटीऐंडटी, डिज्नी, कॉमकास्ट, ऐप्पल और नेटफ्लिक्स इसकी अगुआई कर रही हैं। ये कंपनियां अपना दायरा बढ़ाने के लिए दूसरी कंपनियों का अधिग्रहण कर रही हैं और पूरी दुनिया से कंटेंट बटोर रही हैं। चीन से इतर भारत में विदेशी फिल्मों को लेकर किसी तरह की बंदिश नहीं है। हालांकि मनोरंजन उद्योग में 90 फीसदी से अधिक सामग्रियां स्थानीय ही होती हैं। दुनिया भर में मनोरंजन उद्योग जहां हॉलीवुड से अभिभूत दिखता है, वहीं भारत का रचनात्त्मक उद्योग का अपना 100 साल का समृद्घ इतिहास रहा है। 

भारत उन गिने-चुने बाजारों में है जिसके पास स्थानीय स्तर पर मौलिक कहानियां हैं। पिछले एक दशक में दंगल, गली बॉय, गैंग्स ऑफ वासेपुर, विक्की डोनर, पीकू, मसान, अंधाधुन जैसी हिंदी फिल्में स्थानीय कहानी के आधार पर बनाई गई हैं। इसके साथ तमिल, मराठी, बांग्ला आदि भाषाओं में भी मौलिक कहानियों पर फिल्में बनी हैं।

यूट्यूब से लेकर नेटफ्लिक्स तक भारतीय दर्शकों और सामग्री निर्माताओं ने दुनिया को चकित किया है। यूट्यूब 1.8 अरब उपयोगकर्ताओं के साथ दुनिया का सबसे बड़ा स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म है। यह खुला और ऑनलाइन ऑडिटोरियम की तरह है जहां कोई भी आकर अपनी प्रतिभा दिखा सकता है, जानकारियां साझा कर सकता है और वीडियो पोस्ट कर सकता है।

भारतीय संगीत फर्म टी-सीरीज दुनिया भर में सबसे अधिक देखा जाने वाला यूट्यूब चैनल है।  

दूसरी ओर नेटफ्लिक्स है, जिस पर उच्च गुणवत्ता वाली मनोरंजक सामग्रियों का सबस्क्रिप्शन आधारित प्लेटफॉर्म है। इसके पास 18 भारतीय शो हैं जो निर्माण के विभिन्न चरणों में हैं, वहीं 8 स्ट्रीमिंग के लिए उपलब्ध हैं। इसके उपयोगकर्ताओं की संख्या 16 करोड़ है। मुख्य कंटेंट अधिकारी टेड सैरेनडॉस ने पिछले साल कहा था, 'सामग्री के लिहाज से भाारत हमारा सबसे बड़ा बाजार है।' 

पिछले महीने नेटफ्लिक्स के मुख्य कार्याधिकारी रीड हेस्टिंग्स ने घोषणा की थी कि नेटफ्लिक्स 2019 और 2020 में भारत में कंटेंंट पर 3,000 करोड़ रुपये खर्च करेगी। मीडिया पार्टनर्स एशिया का अनुमान है कि 2024 तक ऑनलाइन वीडियो इकाइयों द्वारा भारत में करीब 1.4 अरब डॉलर का निवेश किया जा सकता है।आप तर्क दे सकते हैं कि 74,000 करोड़ रुपये का भारतीय टेलीविजन उद्योग जो हर रात 3 से 6 घंटे तक नई सामग्रियां प्रस्तुत करता है, वह इससे कहीं ज्यादा निवेश करता है। यह सही है, लेकिन इसमें पेच है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा टीवी बाजार है। 24 अरब डॉलर के मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग में टीवी और फिल्मों की हिस्सेदारी 56 फीसदी है। मनोरंजन पसंद करने वाले देश में यह आंकड़ा काफी छोटा है। आकार के लिहाज से डिज्ऩी पूरे भारतीय मीडिया उद्योग से तीन गुना बड़ा है।ऐसे में भारतीय कहानियों की वैश्विक मांग से उद्योग को बेहतर मुद्रीकरण करने में मदद मिलेगा। समय भी अनुकूल है। पिछले दशक में इस दिशा में परिस्थितियां अनुकूल हुई हैं - डेटा के दाम घटे हैं, उपकरणों की संख्या बढ़ी है, वैश्विक फिल्मों और शो का चलन बढ़ा है।  कुल मिलाकर देखा जाए तो भारतीय कथाकार पहले से कहीं बेहतर तरीके से तैयार हैं।

मीडिया पार्टनर्स एशिया का अनुमान है कि शीर्ष दस ओटीटी पर मौलिक, फिल्म सामग्रियों की मांग 2018 में 400 घंटे थी, जो 2019 में बढ़कर 1,000 घंटे हो गई है। यह 500 अतिरिक्त फिल्में बनाने के बराबर है जबकि पहले से ही देश में 1,600 फिल्में बनाई जा रही हैं। इसका मतलब है कि प्रतिभा, प्रसंस्करण, लेखन तथा अन्य सभी क्षेत्रों में अवसर बढ़ रहे हैं। अगर भारतीय कहानीकार इस क्षमता का इस्तेमाल करने में सक्षम होते हैं तो भारतीय मनोरंजन उद्योग अर्थव्यवस्था के विकास का इंजन बन सकता है और सकल घरेलू उत्पाद में एक फीसदी से ज्यादा का योगदान दे सकता है। ईवाई का अनुमान है कि भारतीय मीडिया और मनोरंजन उद्योग 2021 तक 33 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।
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