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अधिशेष हस्तांतरण पर गतिरोध बरकरार

श्रीमी चौधरी / नई दिल्ली December 27, 2019

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के अधिशेष के सरकारी खजाने में हस्तांतरण को लेकर बोर्ड और सरकार के बीच चल रहे गतिरोध के जल्द खत्म होने के आसार नहीं दिख रहे हैं। आम बजट से पहले अपने राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए सरकार की नजर सेबी के अधिशेष पर है। हाल में सरकार ने इस बारे में सेबी से यथास्थिति रिपोर्ट मांगी थी। सरकार नए नियमों के हिसाब से अधिशेष का हस्तांतरण चाहती है। 

मामले की जानकारी रखने वाले एक सूत्र ने बताया कि वित्त मंत्रालय में संबंधित विभागों ने हाल में अधिशेष के बारे में सेबी से जानकारी मांगी थी ताकि सरकार अपनी आय और खर्च का हिसाबकिताब कर सके और उसके मुताबिक मौजूदा वित्त वर्ष के लिए राजस्व अनुमान और वित्त वर्ष 2020-21 के लिए बजट अनुमान लगाए जा सकें।

दूसरी ओर सेबी ने अब तक वित्त अधिनियम, 2019 के प्रावधान का पालन नहीं किया है जिसके मुताबिक उसे सालाना अधिशेष का आरक्षित कोष बनाना है और फिर अपने सामान्य कोष में से 75 फीसदी नकदी सरकारी खजाने में हस्तांतरित करनी है। सेबी को खुद से जुड़े कानून के तहत सारे खर्च निकालने के बाद शेष राशि सरकार को हस्तांतरित करनी है। सूत्रों के मुताबिक यह राशि इतनी अधिक नहीं होगी कि इससे सरकार अपने राजकोषीय घाटे को पाट सके लेकिन सेबी की स्वायत्तता के लिए यह बेहद अहम है। 

संशोधित कानून के मुताबिक सेबी अपने वार्षिक अधिशेष में से केवल 25 फीसदी राशि ही रख सकता है। यह राशि पिछले दो वर्षों के दौरान उसके कुल वार्षिक खर्च से अधिक नहीं होनी चाहिए। उसे शेष राशि समेकित निधि में हस्तांतरित करनी होगी। अधिकारियों के मुताबिक 31 मार्च, 2018 तक सेबी का अधिशेष 3,606 करोड़ रुपये था। यानी सेबी को इस वित्त वर्ष में सरकार को 2,800 करोड़ रुपये देने पड़ सकते हैं। वित्त विधेयक के संसद के दोनों सदनों में पारित होने से सेबी कानून में स्वत: बदलाव हो गया। इस संशोधन में समीक्षा और पुनर्विचार का प्रावधान था जिसका सेबी ने विरोध किया है। 

सूत्रों के मुताबिक इस फैसले के बाद सेबी ने आर्थिक मामलों के विभाग को कम से कम दो पत्र लिखे हैं। इनमें बाजार नियामक ने कहा कि यह प्रस्ताव सलाह मशविरे के बिना जल्दबाजी में किया गया है और इस तरह का कोई भी फैसला वित्तीय स्थिरता एवं विकास परिषद (एफएसडीसी) को लेना चाहिए। एफएसडीसी वित्तीय क्षेत्र का नियामक है। वित्त मंत्री इसका अध्यक्ष होता है और सेबी सहित वित्तीय क्षेत्र के सभी नियामक इसके सदस्य हैं। 

सेबी का मानना है कि निवेशकों के हितों के संरक्षण में उसके अधिशेष की काफी अहमियत है। सेबी एम्पलॉयीज एसोसिएशन, ब्रोकर्स फोरम और बाजार के कई भागीदारों ने भी सरकार के इस कदम का विरोध किया है। उनका कहना है कि यह एक तरह से सेबी की स्वायत्ता में हस्तक्षेप है। बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण और पेंशन फंड नियामक भी इस मामले में सेबी का समर्थन कर रहे हैं क्योंकि उन्हें आशंका है कि आगे उनके साथ भी ऐसा हो सकता है। इस बारे में सेबी को भेजे गए ईमेल का कोई जवाब नहीं आया। 

सेबी की एक दलील यह भी है कि नया प्रावधान अतिरिक्त कर की तरह है क्योंकि सेबी सेवाएं देने के लिए इंटरमीडियरी से फीस वसूलता है लेकिन अधिशेष हस्तांतरण बाजार के भागीदारों पर एक अतिरिक्त कर बन जाएगा।
Keyword: SEBI, Sales and Exchange Board of India, Regulator, Ajay Tyagi, Chairman, Government, Report, Fiscal Deficit,
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