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दलित उत्थान के लिए चंद्रशेखर आजाद से 'रावण' तक का सफर

आदिति फडणीस /  December 27, 2019

जिस समय दिल्ली में नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिक पंजी के खिलाफ आवाज उठ रही थी तो एक व्यक्ति पुलिस के साथ लुकाछिपी का खेल खेल रहा था। खुद को रावण नाम देने वाले चंद्रशेखर भी यह लड़ाई लड़ रहे हैं। उनका जन्म सहारनपुर के धड़कूलि गांव में एक चमार परिवार में हुआ था। चंद्रशेखर ने पास के ही छुटमलपुर गांव में ठाकुरों द्वारा चलाए जाने वाले स्कूल से पढ़ाई की। उन्होंने दलितों के खिलाफ होने वाले भेदभाव को महसूस किया और इससे लडऩे की ठानी। आंबेडकरवादी और कांशी राम से प्रभावित (लेकिन मायावती की तरह नहीं) चंद्रशेखर ने दलितों को संगठित करने के लिए कांशी राम के आदर्शों पर चलने का प्रयास किया।

उन्होंने शिक्षा, अफसरशाही और आत्मरक्षा के तरीके आजमाए। उन्होंने भीम आर्मी का गठन किया और जाति तथा महिला-पुरुष के भेदभाव से परे सभी को मुफ्त प्राथमिक शिक्षा देने के लिए सहारनपुर जिले में 400 भीम आर्मी स्कूल खोले। उन्होंने आत्मरक्षा की कक्षाएं चलाना शुरू किया और गांवों में घूम-घूम कर बाइक रैलियां कीं। इन गांवों में ऊंची जाति वाले ठाकुरों के गांव भी शामिल थे। वे इसे अपने मजबूत होते वजूद को दिखाने के सांकेतिक तरीके के तौर पर देखते थे। 

यह काफी जरूरी है। लोध जाति से ताल्लुक रखने वाली और बाद में केंद्रीय मंत्री बनीं साध्वी उमा भारती एक पुरानी घटना के बारे में बताती हैं कि उनके गांव टीकमपुर में उनकी जाति के दूसरे लोग ठाकुर परिवारों के घरों के आगे से साइकिल चलाकर नहीं जा सकते थे। उन्हें साइकिल से उतरकर पैदल चलना होता था क्योंकि ठाकुर इसे अपना अपमान मानते थे। यह 25 साल पहले की बात है। हालांकि आज भी कुछ नहीं बदला। भीम आर्मी ने 18 साल से अधिक उम्र के दलितों को संगठन से जुडऩे का आह्वान किया। इसके ज्यादातर सदस्य चमार समुदाय या इसकी उपजाति जाटव से संबंधित हैं। लेकिन भीम आर्मी ने मुसलमानों का भी समर्थन किया।

हालांकि संगठन का किसी तरह का औपचारिक ढांचा नहीं है और यह गैर-पंजीकृत संस्था है लेकिन दावा है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में इसके 20,000 से ज्यादा सदस्य हैं। संगठन का ज्यादातर ध्यान प्रत्यक्ष तरीके से मदद करके दलितों की गरिमा का संरक्षण और उसका बचाव करना है। हाल ही में दिए एक साक्षात्कार में आजाद ने कहा, 'भीम आर्मी की मदद से दलित युवाओं को पता चला कि वे अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए लड़ सकते हैं और वे अब उत्पीडऩ बर्दाश्त नहीं करेंगे। भीम आर्मी किसी को डराने के लिए नहीं बल्कि दलितों की सुरक्षा के लिए बनाई गई है।'

साल 2015 में उस समय रावण की परेशानी शुरू होने लगी जब उन्होंने अपने गांव के बाहर एक बोर्ड लगाया। इसमें लिखा था, 'धड़कूलि गांव के चमार आपका स्वागत करते हैं।' जिस गांव में ठाकुर रहते हों वे इसे कैसे बर्दाश्त कर सकते थे? ठाकुरों ने इस पर काली स्याही पोत दी। अब यह तनाव सीधी लड़ाई में तब्दील हो गया और उस दौरान शीर्ष पर पहुंच गया जब भाजपा ने बिना मंजूरी लिए सहारनपुर के सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील इलाके में 'शोभा यात्रा' निकाली। कुछ सप्ताह बाद राजपूत राजा महाराणा प्रताप की जयंती पर दलित-ठाकुर टकराव हो गया।

राज्य सरकार ने हिंसा भड़काने के लिए भीम आर्मी को जिम्मेदार ठहराया। रावण ने दावा किया कि सरकार इस आंदोलन को दबाने और ऊंची जाति के लोगों को संरक्षण देने के लिए उन्हें निशाना बना रही थी। राज्य प्रशासन ने रावण को गिरफ्तार कर लिया। मामला न्यायालय में पहुंचा और उच्च न्यायालय ने उन्हें बरी कर दिया। हालांकि कुछ घंटे बाद ही योगी आदित्यनाथ की सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत उनको दोबारा गिरफ्तार करने के आदेश दे दिए। नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वाले समूहों के भारी विरोध के बावजूद उन्हें गिरफ्तार किया गया था लेकिन इस दबाव के चलते उन्हें रिहा कर दिया गया। जब वह जेल (और अस्पताल) में थे तो प्रियंका गांधी ने टेलीफोन पर बात की थी। आजाद अघोषित तौर पर कांग्रेस के साथ मिलकर काम करने लगे।

सहारनपुर दलितों के लिए आवाज उठाने और मुसलमानों तथा दलितों के बीच एकता के लिए जाना जाता है। कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस पहल का समर्थन किया। लोकप्रिय लेखक और दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद के अनुसार, 'करीब 400 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में दलित और मुस्लिम कुल मतदाताओं के 30 प्रतिशत हैं। यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि 90-95 प्रतिशत दलित और मुसलमान घरों से बाहर निकलकर मतदान करते हैं।

इसलिए अगर वे साथ आते हैं तो चुनाव की दृष्टि से अहम हो जाएंगे। मेरा मानना है कि दलितों और मुसलमानों, खासकर युवाओं में एक साथ आने को लेकर काफी उत्सुकता है।' रावण इस एकता का चेहरा बनकर उभरे हैं हालांकि देश के दूसरे हिस्सों में अधिक लोग उन्हें नहीं जानते। जिस दौर में बसपा की चुनावी जमीन लगभग समाप्त हो गई हो और भाजपा दलितों को लामबंद करने में जुटी हो, ऐसे में भीम आर्मी दलित समुदाय में से प्रतिरोध का प्रतीक बनकर उभरी है। प्रख्यात दलित विद्वान आनंद तेलतुम्बडे लिखते हैं कि इसकी उत्पत्ति को वर्ष 1972 में महाराष्ट्र में दलित पैंथर्स से जोड़कर देखा जा सकता है जो भारत की तत्कालीन दिवालिया राजनीति का नतीजा था। 

इस बात में थोड़ा आश्चर्य हो सकता है कि मायावती और अन्य लोग उनके नाम का उल्लेख करने पर भौंह सिकोड़ लेते हैं। हालिया आंदोलन ने रावण की शख्सियत को मजबूत किया है।

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