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वित्तीय मजबूती की राह पर चीन निरंतर अग्रसर

श्याम सरन /  December 27, 2019

चीन जल्द ही दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। फिलहाल उसकी अर्थव्यवस्था का आकार 14 लाख करोड़ डॉलर है, जो विश्व के कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का करीब 18 प्रतिशत है। वर्ष 2013 से यह दुनिया का सबसे बड़ा कारोबारी देश रहा है और इसका मौजूदा आयात-निर्यात का कुल आंकड़ा 4.5 लाख करोड़ डॉलर से अधिक है। इतना ही नहीं, चीन में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शेयर एवं बॉन्ड बाजार भी है। इसका बॉन्ड बाजार 13 लाख डॉलर का है और दुनिया के बॉन्ड बाजार में इसकी हिस्सेदारी 14 प्रतिशत है। इसी तरह, इसका शेयर बाजार पूंजीकरण वैश्विक आंकड़े का करीब 12 प्रतिशत है। हालांकि वैश्विक अर्थव्यवस्था में चीन का रुतबा इसके वित्तीय आंकड़ों में नहीं झलकता है। 

वैश्विक स्तर पर लेनदेन के माध्यम के रूप में चीन की मुद्रा की हिस्सेदारी 2018 में कम होकर 15 प्रतिशत से कम रह गई है, जबकि 2013 में यह आंकड़ा 25 प्रतिशत तक हुआ करता था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुल भुगतान में केवल 2 प्रतिशत ही रेनमिनबी के जरिये होता है। 2016 में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के लाख करोड़ डॉलर मूल्य के स्पेशल ड्रॉइंग राइट (एसडीआर) में अमेरिकी डॉलर, यूरोपीय क्षेत्र की मुद्रा यूरो, जापानी मुद्रा येन और ब्रिटेन के पाउंड के साथ रेनमिनबी भी सुरक्षित मुद्रा के रूप में शामिल थी। रेनमिनबी का भारांश एसडीआर में 10.86 प्रतिशत दिया गया था। आईएमएफ के सदस्य देशों के विदेशी मुद्रा भंडार में रेनमिनबी की मात्रा अधिकतम 1 लाख डॉलर तक हो सकती है, लेकिन फिलहाल यह महज 194 अरब डॉलर ही है। चीन ने 30 देशों के साथ मुद्रा अदला-बदली (करेंसी स्वैप) का समझौता कर रखा है और इसका मूल्यांकन फिलहाल 500 अरब डॉलर है। हालांकि इसका इस्तेमाल मामूली स्तर तक ही हुआ है। रेनमिनबी दुनिया की दूसरी शीर्ष मुद्राओं की तरह विश्वसनीयता अर्जित करने में असफल रही है। पूंजी प्रवाह पर नियंत्रण समाप्त करने और मुद्रा में उतार-चढ़ाव झेलने से चीन के इनकार करने से आगे की प्रगति अब तक थमी है। 

युआन के अंतरराष्ट्रीयकरण का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए चीन ने अब एक अलग रणनीति तैयार की है। अपनी मुद्रा को अपेक्षित स्थान दिलाने के लिए चीन अपने बॉन्ड एवं शेयर बाजार के बड़े आकार का इस्तेमाल करते हुए इन्हें वैश्विक वित्तीय बाजारों से जोड़ रहा है। शुरू में चीन ने अपने शेयरों में कोटा आधारित कारोबार की अनुमति देने के लिए हॉन्ग कॉन्ग, शांघाई और हॉन्ग कॉन्ग शेनझेन स्टॉक कनेक्ट स्थापित किया और कोटा को उदार बनाया और फंडों के स्थानांतरण की प्रक्रिया सरल बना दी। इसने अपना बॉन्ड बाजार विकसित करने की प्रक्रिया शुरू की और पहले रेनमिनबी में जारी बॉन्ड हॉन्ग कॉन्ग और बाद में सिंगापुर, ताइवान और लंदन में उतारे। 

प्रमुख वैश्विक सूचकांकों में चीन के शेयर एवं बॉन्ड को शामिल किया जाना उत्साहजनक है। शांघाई एवं शेनझेन स्टॉक एक्सचेंजों पर कारोबार करने वाले चीन के ए-शेयर एमएससीआई इमर्जिंग मार्केट और एमएसएसीआई ऑल कंट्री वल्र्ड इंडेक्स में शामिल किए गए हैं। चाइनीज गवन्र्मेंट बॉन्ड (सीजीबी) अब ब्लूमबर्ग बार्कलेज ग्लोबल एग्रीगेट इंडेक्स में शामिल हैं और जल्द ही एफटीएसई का हिस्सा हो सकते हैं। निवेश कंपनी स्क्रोडर्स का दावा है कि आम तौर पर सूचकांकों से जुड़े फंडों में निवेश करने वाले अंतरराष्ट्रीय संस्थागत निवेशक से रकम का प्रवाह शुरू में सालाना 200 अरब डॉलर होगा, जो बाद में बढ़कर सालाना 400 अरब डॉलर तक हो जाएगा। 

चीन के शेयर एवं बॉन्ड बाजारों का तेजी से विस्तार हो रहा है और खुदरा निवेशकों ने भी इनमें बढ़-चढ़ कर निवेश शुरू कर दिया है, ऐसे में रकम का प्रवाह लाखों करोड़ों डॉलर में रह सकता है। यह ध्यान रहे कि केवल सीजीबी ही अब तक शामिल किए गए हैं। अब कॉर्पोरेट बॉन्ड के शामिल होने में भी अधिक देर नहीं है। स्टैंडर्ड ऐंड पुअर्स को चीन में रेटिंग एजेंसी के तौर पर काम करने की अनुमति मिल चुकी है। अंतरराष्ट्रीय सूचकांकों के लिहाज से कॉर्पोरेट बॉन्ड को रेटिंग मिलने से उनके लिए वैश्विक सूचकांकों में शामिल होना आसान हो जाएगा और इससे चीन के बॉन्ड बाजार में रकम का प्रवाह भी बढ़ेगा। शांघाई में युआन आधारित तेल वायदा एक्सचेंज की स्थापना से भी चीन की मुद्रा की हैसियत बढ़ रही है। शांघाई इस साल दुबई को पछाड़ते हुए दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल वायदा बाजार बन गया है। 

चीन के यूनियनपे क्रेडिट कार्ड का अंतरराष्ट्रीय वित्त बाजार में रुतबा बढ़ा रहा है। दुनिया में जारी कुल क्रेडिट कार्ड में यूनियनपे की हिस्सेदारी 58 प्रतिशत है और इस समय करीब 7.6 अरब यूनियनपे क्रेडिट कार्ड धारक हैं। यह क्रेडिट कार्ड 174 देशों में स्वीकार होता है। हरेक साल चीन के लोग 15 करोड़ विदेशी यात्राएं करते हैं और पर्यटन पर हरेक साल होने वाले कुल खर्च में इनका हिस्सा 20 प्रतिशत है। इस वजह से दुनिया के कारोबारी प्रतिष्ठान यूनियनपे क्रेडिट कार्ड से भुगतान ले रहे हैं। 

चीन ने 2015 में क्रॉस-बॉर्डर इंटरबैंक पेमेंट सिस्टम (सीआईपीएस) शुरू किया था, जो ब्रसल्स स्थित स्विफ्ट की तर्ज तैयार किया गया है। इस समय सीआईपीएस स्विफ्ट के साथ सहयोग कर रहा है, लेकिन चीन का वास्तविक लक्ष्य एक वैकल्पिक वैश्विक भुगतान एवं निपटान प्रणाली के तौर पर इसे (सीआईपीएस) स्थापित करना है। सीआईपीएस में 12 अंतरराष्ट्रीय बैंकों के साथ 31 साझेदार हैं, इसके साथ ही 745 परोक्ष रूप से इसमें भागीदार निभाते हैं। 2018 में सीआईपीएस ने चीन से बाहर युआन में 755 अरब डॉलर के लेनदेन का निपटान किया। हालांकि स्विफ्ट के मुकाबले यह न के बराबर है, लेकिन इसके जरिये निपटान तेजी से बढ़ रहा है। स्विफ्ट प्रतिदिन 6 लाख करोड़ डॉलर का निपटान करता है। सीआईपीएस के इस्तेमाल को अमेरिका के कदमों से भी बढ़ावा मिला रहा है, जो रूस और ईरान जैसे देशों को बाहर रखने के लिए स्विफ्ट का इस्तेमाल करता है। रूस ने अपना सिस्टम फॉर ट्रांसफर ऑफ फाइनैंशियल मेसेजेज स्थापित किया है, जो यूरेशियन इकनॉमिक यूनियन देशों में काम करती है और चीन के बैंक इसमें शिरकत करते हैं। ऐसी खबर आ रही है कि अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने के लिए भारत, चीन और रूस त्रिपक्षीय भुगतान प्रणाली विकसित करने पर विचार कर रहे हैं, जो स्विफ्ट से स्वतंत्र होकर काम करेगी। 

चीन ब्लॉकचेन तकनीक आधारित संप्रभु डिजिटल करेंसी लाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। हालांकि इस बारे में अभी विस्तार से कोई सूचना नहीं है। चीन में इस समय होने वाले कुल लेनदेन में 70 प्रतिशत से अधिक डिजिटल माध्यम से होते हैं, इसलिए सॉवरिन डिजिटल करेंसी की दिशा में काम करना कोई हैरत की बात नहीं। एक 'एशियाई युआन' बनाने के लिए इसे एक दूसरी समानांतर योजना से जोड़ा जा रहा है। चीन के अर्थशास्त्री सन मिन्गकी इस रणनीति का खुलासा कुछ इस तरह करते हैं, 'हॉन्ग कॉन्ग डॉलर और न्यू ताइवान डॉलर को आंतरिक स्तर पर जोड़कर 'ग्रेटर चाइना रेनमिनिबी तैयार करना लघु अवधि का लक्ष्य है। मध्यम अवधि में जापान की येन, रिपब्लिक ऑफ कोरिया के वोन और दूसरी एशियाई देशों की मुद्रा के सहयोग से 'एशियाई युआन' प्रणाली अस्तित्व में लाने का लक्ष्य है। इससे अमेरिकी डॉलर, यूरो और एशियाई युआन वैश्विक मुद्रा प्रणाली के तहत त्रिकोणीय व्यवस्था के रूप में काम करेगी।'

कुल मिलाकर अंतिम लक्ष्य प्रत्येक देश की आर्थिक ताकत एवं उसके कारोबार मूल्यांकन के  आधार पर एक आदर्श, डिजिटल एवं विकेंद्रीकृत या गैर-सॉवरिन वैश्विक मुद्रा प्रणाली स्थापित करना है। अब सवाल उठता है कि अगर चीन ने डिजिटल करेंसी के साथ कदम आगे बढ़ा दिए हैं तो यह लक्ष्य प्राप्त होने के बाद भविष्य किसके नाम होगा? इन घटनाक्रम के बीच भारत कहां खड़ा होता है, जो इस समय अपनी कुछ परेशानियों से जूझ रहा है?

(लेखक पूर्व विदेश सचिव और सीपीआर में सीनियर फेलो हैं।)
Keyword: China, Economy, GDP, Bond Market, World economy, capitalization,
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