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निकाय अफसरों और पार्षदों पर कितना चलेगा अदालत का डंडा

एम जे एंटनी /  December 26, 2019

देश में शायद ही कोई ऐसा शहर हो जहां पानी की आपूर्ति या सीवरेज प्रवाह की संतोषजनक व्यवस्था हो। नगरपालिकाओं के अधिकारी आमतौर पर आम नागरिकों की शिकायतों के प्रति असंवेदनशील होते हैं और कभी कोई आवश्यक कदम उठाने में शीघ्रता नहीं दिखाते। यहां तक कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी अपनी जिम्मेदारी से बचते हैं और पर्यावरण संबंधी कानून इसलिए नहीं लागू किए जाते हैं क्योंकि ऐसे मामलों में कहीं न कहीं स्थानीय बाहुबली शामिल होते हैं और कानूनी प्रक्रिया का क्या नतीजा निकलेगा, यह तय नहीं होता। परंतु अब सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि नगरपालिका पार्षदों और नगर निगमों के प्रमुख अधिकारियों पर फौजदारी मुकदमा चलाया जा सकता है।

यह निर्णय कर्नाटक प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और बेंगलूरु तथा अन्य नगरपालिकाओं के सात आयुक्तों (जो अलग-अलग समय पर पद स्थापित रहे) के बीच 14 वर्ष से चली आ रही कानूनी लड़ाई में दिया गया। यह मामला था कर्नाटक प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और बी हीरा नाइक के बीच का। 

यह निर्णय भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसमें कंपनी शब्द की व्याख्या की गई है और इसके दायरे का विस्तार करते हुए वैधानिक संस्थाओं को इसमें शामिल किया गया है। अदालत ने जोर देकर कहा कि नगर निगम के सरकारी विभाग होने की दलील दी जाती है लेकिन ऐसा नहीं है। बल्कि यह एक कॉर्पोरेट संस्थान है। चूंकि धारा 47 के तहत सभी निगम संस्थान कंपनी की परिभाषा के अधीन आते हैं इसलिए नगर परिषद भी इस दायरे में शामिल हैं।

ऐसे में हर उस व्यक्ति का उत्तरदायित्व बनता है जो अपराध घटित होते वक्त प्रभारी रहा हो और कंपनी के कारोबारी आचरण के लिए जिम्मेदार रहा हो। सजा से बचने के लिए उस व्यक्ति को यह साबित करना होगा कि अपराध बिना उसकी जानकारी के हुआ या उसने अपनी तरफ से उचित सतर्कता बरती थी। जाहिर है जो पद पर रहे हों उनके लिए इसे साबित करने का बड़ा बोझ था। नगर पार्षदों की बात करें तो अब उनकी जवाबदेही कंपनी अधिनियम तथा नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स ऐक्ट के तहत निदेशकों की जवाबदेही से अधिक है। 

उच्च न्यायालय ने इन अधिकारियों पर अभियोग समाप्त करते हुए कहा कि वे विभागों के प्रमुख थे, न कि किसी कंपनी के कार्याधिकारी। ऐसे में अभियोजन को सरकार की मंजूरी भी आवश्यक थी। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि उच्च न्यायालय गलत था और इन पर कार्रवाई के लिए सरकार की मंजूरी की आवश्यकता नहीं। बोर्ड ने आरोपित आयुक्तों को उपचारित सीवेज छोडऩे की मंजूरी प्रदान की थी जबकि यह 2006 में समाप्त हो चुका था और जिसका नवीनीकरण नहीं किया गया था। वे निरंतर इस अनुपचारित सीवेज अवशिष्टï को तालाबों, झीलों और अन्य प्राकृतिक जल स्रोतों में मिलने दे रहे थे। इस निर्णय के बाद प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को यह अधिकार मिला है कि वे जल एवं वायु संरक्षण के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ अभियोग चला सकें। कानून में अपराधों की सूची का ब्योरा भी पेश किया गया है। संक्षेप में कहें तो किसी व्यक्ति को जानते-बूझते कोई विषाक्त या प्रदूषक तत्त्व किसी जल धारा, कुएं, सीवर या जमीन में नहीं मिलने देना चाहिए। जो भी इन प्रावधानों का उल्लंघन करेगा, उसे अधिकतम छह वर्ष तक के कारावास और जुर्माने से दंडित किया जा सकेगा। 

हाल के दिनों में अदालत पर्यावरण कानूनों के उल्लंघन के मामलों में कड़े आदेश सुनाती रही है। दो सप्ताह पहले दिए एक आदेश में उसने दिल्ली के निकट नोएडा के प्राधिकारियों को आदेश दिया कि एक गांव की जल धाराओं का पुनरुद्धार करें, उनका रखरखाव करें और उन्हें संरक्षण प्रदान करें। जितेंद्र सिंह बनाम पर्यावरण मंत्रालय के इस मामले में परंपरागत जल स्रोतों को औद्योगिक इकाइयों के फायदे के लिए पाटा जा रहा था। 

इससे पर्यावरण नियमों का उल्लंघन हो रहा था। आम लोगों ने पहले भी जनहित याचिकाएं लगाई हैं। इनमें सबसे पहला है सन 1980 का रतलाम नगर निगम मामले का फैसला। सर्वोच्च न्यायालय ने मध्य प्रदेश के रतलाम नगर निगम को एक स्थान की साफ-सफाई कराने का आदेश देते हुए कहा था कि बजट की बाधा किसी नगर निगम द्वारा सफाई जैसे बुनियादी काम की अनदेखी करने का बहाना नहीं हो सकती। उक्त फैसला पढऩे में तो अच्छा है लेकिन रतलाम की यात्रा करने पर पता चल जाता है कि उस फैसले का जमीनी अमल न के बराबर हो रहा है। उसके बाद आया एम सी मेहता का मामला जिसमें अदालत अभी भी आदेश जारी कर रही है। सन 1996 में एमआईटी से स्नातक करने वाली पहली महिला इंजीनियर अल्मित्रा पटेल ठोस कचरे को लेकर अदालत गईं। साल दर साल आए अदालती आदेशों के बावजूद हालात और खराब ही हुए हैं। हाल में सरकार ने इस विषय पर 850 पृष्ठों का एक शपथ-पत्र दिया है। न्यायाधीशों ने कहा कि कागजों का यह बंडल अपने आप में ठोस कचरा है।

अब तक प्रदूषण फैलाने वालों के खिलाफ सबसे प्रमुख कारक सामाजिक कदम और क्षतिपूर्ति के होते थे। कर्नाटक का फैसला प्रदूषण बोर्डों को यह अधिकार देता है कि वे नगर निकायों के अधिकारियों के खिलाफ कदम उठा सकें। जनहित याचिकाओं में दिए जाने वाले निर्णयों की तुलना में आपराधिक प्रक्रिया अधिक प्रभावी साबित होगी। बहरहाल, बड़ा सवाल यह है कि क्या नियामकों में इतना साहस होगा कि वे शहरों के नामियों-गिरामियों और संस्थाओं के खिलाफ अभियोग चला सकें।

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