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आईपीओ में जुटाई गई सिर्फ 18 फीसदी नई पूंजी

सचिन मामबटा और ऐश्ली कुटिन्हो / मुंबई December 26, 2019

साल 2019 में बाजार से पहली बार रकम जुटाने वाली कंपनियों ने अपने कारोबारी जरूरतों के लिए पूंजी हासिल करने के बजाय मोटे तौर पर शेयरधारकों को निकासी का रास्ता मुहैया कराने पर जोर दिया। साल 2019 में ऐसे आरंभिक सार्वजनिक निर्गम के जरिए जुटाई गई रकम 11,156.6 करोड़ रुपये का महज 17.7 फीसदी हिस्सा ही कंपनी की कामकाजी जरूरतें पूरी करने के लिए नई पूंजी के तौर पर आया। यह जानकारी प्राइम डेटाबेस की तरफ से किए गए विश्लेषण से मिली।

कुल मिलाकर आईपीओ के जरिए रकम जुटाने की प्रक्रिया में यह नई पूंजी के सबसे कम आंकड़ों में से एक है। 1989 से अब तक के आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ साल 2017 में नई पूंजी की हिस्सेदारी काफी कम (17.4 फीसदी) रही थी। शुरुआती वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि ज्यादातर आईपीओ की रकम शेयरधारकों की तरफ से ओएफएस के जरिए हिस्सेदारी बिक्री के बजाय कंपनी के खजाने में गई। साल 1989, 1990 और 1991 में कंपनी के लिए जुटाई गई 100 फीसदी रकम नई पूंजी के तौर पर थी।

जुटाई गई कुल रकम के अनुपात के तौर पर सबसे ज्यादा नई पूंजी का हालिया उच्चस्तर साल 2011 में देखा गया था। 37 आईपीओ के जरिए 5,966.3 करोड़ रुपये जुटाए गए, जिसमें से सिर्फ 1.9 फीसदी ही ऑफर फॉर सेल के रूप में थे। जो कंपनी नई पूंजी के तौर पर रकम जुटाती है, उसका इस्तेमाल वह कई काम में कर सकती है। वह इस रकम का इस्तेमाल कर्ज चुकाने, अधिग्रहण करने या नई फैक्टरी लगाकर कारोबार का विस्तार करने में कर सकती है।

कंपनी की मौजूदा क्षमता में बढ़ोतरी पर नया निवेश सामान्य तौर पर तब होता है जब कंपनी मांग में बढ़ोतरी का अनुमान लगाती है या फिर जब मौजूदा क्षमता कम पडऩा शुरू हो जाती है। भारतीय रिजर्व बैंक के हालिया आंकड़ों से पता चलता है कि विभिन्न वर्षों में क्षमता इस्तेमाल सबसे कम रहा है। 19 दिसंबर को जारी मौद्रिक नीति समिति के मिनट्स में कहा गया है, विनिर्माण में नरमी क्षमता इस्तेमाल में गिरावट में प्रतिबिंबित हुई, जो वित्त वर्ष 2020 की दूसरी तिमाही में 68.9 फीसदी रह गई, जो पहली तिमाही में 73.6 फीसदी रही थी। इसका मतलब यह हुआ कि कंपनियों की काफी क्षमता बेकार पड़ी हुई है, जो अतिरिक्त क्षमता जोडऩे के लिहाज से कंपनियोंं को प्रोत्साहित नहीं कर पा रही।

आईआईएफएल सिक्योरिटीज के शोध प्रमुक अभिमन्यु सोफत ने कहा, मौजूदा आर्थिक हालात में कंपनियां शायद ही नई क्षमता में जल्द निवेश करेंगी। उन्होंने कहा, क्षमता विस्तार का मामला कम से कम दो तिमाही और टलेगा। प्राइम डेटाबेस के प्रबंध निदेशक प्रणव हल्दिया ने कहा, आईपीओ में नई पूंजी का हिस्सा भले ही बहुत उत्साहजनक न हों, लेकिन यह बाजार की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करता है।

कंपनियां काफी ज्यादा परिपक्व होने के बाद शेयर बाजार में दस्तक दे रही हैं। शुरुआती पूंजी के लिए ये कंपनियां प्राइवेट इक्विटी व वेंचर कैपिटल फर्मों पर निर्भर हैं, जबकि पहले के दशकोंं में सार्वजनिक बाजारों से बढ़त के लिए पूंजी आती थी। यह विकसित देशों के ट्रेंड जैसा ही है। उनके मुताबिक, ये चीजें बेहतर कंपनी प्रशासन का मामला भी हो सकती है क्योंकि ऐसे फंड मोटे तौर पर काफी ज्यादा जांच-परख (ड्यू डिलिजेंस) के बाद ही आते हैं। 

उन्होंने कहा, पिछले कुछ वर्षों के दौरान आईपीओ बाजार में बैंकिंग, वित्तीय सेवा व बीमा (बीएफएसआई) का वर्चस्व रहा है और हमने ज्यादा पूंजी की जरूरत वाली बहुत ज्यादा कंपनियों को बाजार में उतरते नहीं देखा है।
Keyword: IPO, BFSI, Banking, Finance, Service, Insurance, Company, Shareholder,
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