बिजनेस स्टैंडर्ड - बीते दशक में विमानन क्षेत्र की धीमी उड़ान
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बीते दशक में विमानन क्षेत्र की धीमी उड़ान

अंजलि भार्गव /  December 25, 2019

एक सदी में घटनाक्रम प्रधान होते हैं। वहीं एक दशक में हस्तियों की प्रधानता होती है। ऐसा लगता है कि जॉर्ज फ्रायडमैन की यह उक्ति अन्य कहीं इतनी सटीक नहीं बैठती है, जितनी भारत के विमानन क्षेत्र में। बीते दशक में शख्सियतों का दबदबा रहा है और उनके कारनामों से ही विमानन क्षेत्र में उतार-चढ़ाव आए हैं। ऐसी शख्सियतों में विजय माल्या से लेकर टोनी फर्नांडिस तक शामिल हैं। 

इन लोगों के जुनून और नियति की कहानी के अलावा इस क्षेत्र का आकार तिगुना हो गया है। इस क्षेत्र के कुल यात्रियों की संख्या 2010 में 5.2 करोड़ थी, जबकि इस साल 17 करोड़ यात्रियों के उड़ान भरने का अनुमान है। आकाश में दबदबा रखने वाले लोग भी बदल गए हैं। इस दशक की शुरुआत में हवाई यात्रा को किफायती बनाकर इस क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाली विमानन कंपनी एयर डेक्कन (2003-2008) पहले ही इतिहास बन चुकी है और उसकी खरीदार किंगफिशर एयरलाइंस के पतन की शुरुआत पहले ही शुरू हो चुकी है। 

वर्ष 2011 तक किंगफिशर का सुहाना सफर खत्म हो चुका था और वह मुश्किलों में फंस गई थी। कंपनी का परिचालन अक्टूबर 2012 में थम गया। विमानन कंपनी का लाइसेंस स्थगित कर दिया गया, सभी को कंपनी के बकाये का पता चल गया और कर्मचारी बेरोजगार हो गए। किंगफिशर के दिवालिया होने का पूरे क्षेत्र पर असर पड़ा। लीज प्रदाता और ऋणदाता भारतीय विमानन कंपनियों के साथ कारोबार करने में ज्यादा सतर्क हो गए। हालांकि एक व्यक्ति को नुकसान से दूसरे को फायदा हुआ। किफायती विमानन कंपनी इंडिगो 2006 से अपनी मौजूदगी मजबूत कर रही थी। उसने दशक की शुरुआत में 180 ए320एस विमानों का 15 अरब डॉलर का ऑर्डर दिया। इसके पांच साल बाद कंपनी ने अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के क्षेत्र में कदम बढ़ाना शुरू किया। हालांकि इसने पड़ोसी देशों तक ही उड़ानें शुरू कीं। इंडिगो से पहले शुरू होने वाली गो एयर ने जून 2011 में 72 ए320नियो  विमानो का बड़ा ऑर्डर दिया। हालांकि इन वर्षों में कंपनी की प्रगति धीमी रही है। कंपनी अपने वरिष्ठ प्रबंधन को अलविदा कर रही है और इस बात का एक उदाहरण पेश कर रही है कि कैसे बहुत थोड़े शीर्ष नेतृत्व से प्रबंधन किया जा सकता है। 

इसके बाद जून  2010 में इस क्षेत्र में एक नए व्यक्ति का प्रवेश हुआ। चेन्नई के कारोबारी और मीडिया दिग्गज कलानिधि मारन ने स्पाइसजेट में नियंत्रण लायक हिस्सेदारी खरीदी। हालांकि मारन का विमानन क्षेत्र से प्रेम महज मोह था। उन्होंने 2015 में बंद होने के कगार पर पहुंच चुकी विमानन कंपनी अजय सिंह को सौंप दी, जो पहले प्रमोद महाजन के सहयोगी थे। टोनी फर्नांडिस ने टाटा के साथ संयुक्त उद्यम में एयर एशिया इंडिया की 2014 में स्थापना की। टाटा ने उस समय कई लोगों को असमंजस में डाल दिया, जब उसने दो समानांतर उद्यमों- एयर एशिया बरहाद के साथ एयर एशिया इंडिया और सिंगापुर एयरलाइंस के साथ विस्तारा की स्थापना की घोषणा की। कई लोगों ने आश्चर्य जताया कि क्या यह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना है? उद्योग से जुड़े लोगों के लिए ऐसी बातें मायने नहीं रखती हैं, लेकिन इससे मुश्किल दौर से गुजरते क्षेत्र में रोजगार बढ़े। लेकिन दोनों कंपनियों को घाटा हुआ, जो शुरुआती दिनों में लाजिमी भी है। लेकिन चिंताजनक बात यह है कि गुजरते समय के साथ सुधार के कोई संकेत नजर नहीं आ रहे हैं। इन सब घटनाक्रमों के बीच जेट एयरवेज लडख़ड़ाने लगी। यह विमानन कंपनी तब से अपनी जमीन खो रही है, जब से किफायती विमानन कंपनियां इस क्षेत्र में उतरी हैं। यह खुद को पटरी पर नहीं ला सकी और पूरे दशक में बढ़ते घाटे की समस्या से जूझती रही। 

कंपनी ने 2013 में एक बड़ा हिस्सा एतिहाद को बेचा और अपने परिचालन को पुनर्गठन किया, लेकिन उसकी किस्मत नहीं बदली। कंपनी के लिए अवरोध 2018 के मध्य में पैदा हुआ, लेकिन यह किसी तरह अप्रैल 2019 तक चलती रही। मगर उसके बाद इसका परिचालन बंद हो गया। एयर इंडिया पूरे दशक के दौरान संकटग्रस्त बनी रही। यह विमानन कंपनी इस चीज की बानगी है कि कैसे कुप्रबंधन और निहित हित मिलकर इसे असफल बना रहे हैं। विमानन कंपनी में लगातार झोंका जा रहा पैसा बरबाद जा रहा है। कर्मचारियों में असंतोष बढ़ा है, हैंगर में खड़े विमानों की संख्या बढ़ी है और इसकी स्थिति में सुधार की संभावनाएं कमजोर बनी हुई हैं। 

क्या इसका समाधान बिक्री है? जब से गृह मंत्री अमित शाह ने जिम्मा संभाला है, तब से इसे तय माना जा रहा है। अगर शाह इसे नहीं अंजाम दे सकते तो ऐसा और कोई नहीं कर सकता। नहीं बिकने का मतलब होगा कि कंपनी बंद होगी। इस विकल्प को चुनना सरकार के लिए आसान नहीं होगा, जिसे लेकर पहले ही विवाद हो चुका है। 

संभवतया उद्योग के लिए इस दशक में बड़ी तकलीफ की बात यह भी रही है कि नवी मुंबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की सुस्त प्रगति रही है। इस हवाई अड्डे का निर्माण कार्य 1997 से अब तक पूरा नहीं हुआ है। यह भी उस स्थिति में जब मुंबई शहर स्लॉट की भारी कमी से जूझ रहा है क्योंकि मौजूदा हवाई अड्डे की क्षमता पूरे उपयोग के स्तर पर पहुंच चुकी है। असल में जब से जेट के स्लॉट खाली हुए हैं, तब से अन्य विमानन कंपनियां उन्हें हासिल करने के लिए भूखे गिद्ध की तरह टूट पड़ी हैं। 

वर्ष 2012 में शुरू होने वाला रियल एस्टेट और बुनियादी ढांचे का संकट भी हवाई अड्डा क्षेत्र के लिए नुकसानदेह रहा है। इससे हवाई अड्डा क्षेत्र की दो प्रमुख ऑपरेटरों-जीवीके और जीएमआर की बैलेंस शीट कमजोर हुई है। हालांकि दोनों कंपनियों ने कर्ज चुकाने के लिए परिसंपत्तियां बेची हैं, लेकिन भारत के अन्य हवाई अड्डों के नवीनीकरण की प्रगति थमी हुई है। यह कहना सही होगा कि पिछले एक दशक के दौरान हवाई अड्डों के बुनियादी ढांचे में कोई अहम सुधार नहीं हुआ है। इस बीच इस क्षेत्र में नया खिलाड़ी अदाणी समूह उतरा है, जिसने देेश के छह हवाई अड्डों के आधुनिकीकरण और परिचालन की बोली हासिल की है। 

सुरक्षा के लिहाज से देखें तो वर्ष 2010 की शुरुआत मई में एक दुर्घटना के साथ हुई। उस समय एयर इंडिया एक्सप्रेस की उड़ान मंगलूरु में क्रैश हो गई, जिसमें विमान में सवार 150 लोगों की मौत हुई। ए320 नियो में प्रैट और व्हीटनी के इंजनों में समस्या की वजह से सुरक्षा की चिंताएं बढ़ीं। हाल में ऐसी चिंताओं की वजह से ही बी737मैक्स का इस्तेमाल बंद किया गया है। हवाई यात्रा को किफायती बनाकर इसे आम आदमी की पहुंच में लाने की सरकार की योजना 'उड़ान' हकीकत में उड़ान भरने में नाकाम रही है। हालांकि यह आने वाले दशकों में भारतीय यात्रियों की तस्वीर बदलने की क्षमता रखती है।

उद्योग को उम्मीद है कि नए दशक में ईंधन की घरेलू कीमतों और हवाई बुनियादी ढांचे में सुधार के मोर्चे पर कुछ राहत मिलेगी। लेकिन ऐसा लगता कि सरकार ऐसे बहुत से मुद्दों पर ध्यान नहीं दे रही है, जो उसे न जरूरी नहीं लगते हैं। ऐसे में हर कोई यही अनुमान लगा रहा है कि क्या 2020 वर्ष 2019 की तुलना में बहुत अधिक बेहतर होगा। वर्ष 2019 को विमानन क्षेत्र के इतिहास में ऐसे वर्ष के रूप में याद किया जाएगा, जिसमें एक दशक में पहली बार उद्योग की वृद्धि एक अंक में रही।

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