बिजनेस स्टैंडर्ड - पुराने चावल से जैव ईंधन बनाने की तैयारी
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पुराने चावल से जैव ईंधन बनाने की तैयारी

संजीव मुखर्जी और शाइन जैकब / नई दिल्ली December 25, 2019

केंद्र सरकार खाद्यान्न आधारित जैव ईंधन इकाइयों के फीडस्टॉक के लिए भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) को लगभग 15 लाख टन टूटे हुए चावल के निपटान का आदेश दे सकता है। इस कदम से सूखे तथा भारी बारिश के चलते गन्ना उत्पादन में आई कमी की भरपाई हो सकेगी और यह देश की 'तेल के लिए खाद्य' नीति के लिए अहम पड़ाव साबित होगा। सूत्रों का कहना है कि इस कदम का दोहरा प्रभाव होगा। 

पहला, इस कदम से फीडस्टॉक की कमी के कारण 75 करोड़ लीटर अनाज आधारित डिस्टिलरी क्षमता की गिरावट में कमी आएगी। दूसरा, इससे एफसीआई के पास रखे अधिशेष चावल का उपयोग होगा। अनुमानों के मुताबिक, एफसीआई के पास दिसंबर 2019 में 2.12 करोड़ टन चावल है जो वर्तमान में जरूरत का तीन गुना है। 

देश में अनाज आधारित डिस्टिलरी की कुल क्षमता करीब 2 अरब लीटर है जिसके करीब 38 प्रतिशत (75 करोड़ लीटर) हिस्से का फीडस्टॉक की अनुप्लब्धता के चलते उपयोग नहीं हो पाता। अधिकारियों का कहना है कि निपटान की इस प्रक्रिया की निगरानी की जाएगी जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि केवल टूटे हुए चावल (वर्तमान रूप में मानव उपभोग के लिए पूरी तरह से अयोग्य) ही बायो डीजल के लिए उपयोग में लाए जाएं। 

यह ऐसी किसी भी गलतफहमी को दूर करेगा कि जब देश के लाखों बच्चे कुपोषित हैं तो खाद्य भंडार को ईंधन के लिए बरबाद क्यों किया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है बहुत जल्द इस संबंध में एक औपचारिक निविदा तथा संबंधित नीति की घोषणा होने की उम्मीद थी। जरूरत पडऩे पर इसके लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल से भी संपर्क किया जा सकता है। अधिकारियों का कहना है कि यह सुनिश्चित करने के लिए कि अनाज आधारित बायोडीजल इकाइयों को उचित कीमतों पर टूटे हुए चावल मिलें, 22-23 रुपये प्रति किलोग्राम की दर पर सहमति बनने की संभावना है। यह कीमत इस अनुपयुक्त चावल के भंडार में होने वाले अनुमानित खर्च (27 रुपये प्रति किलो) से कम है। 

तेल विपणन कंपनियां (ओएमसी) टूटे हुए चावल से बने एथनॉल को 59.48 रुपये लीटर पर खरीदने के लिए सहमत हुई हैं। यह मानव उपभोग से बेकार अनाज से बनाए जा रहे एथनॉल की निर्धारित वर्तमान दर से अधिक है ताकि अनाज आधारित डिस्टिलरी इकाइयों को निवेश पर कुछ लाभ मिल सके। वर्तमान में यह कीमत 47.63 रुपये प्रति लीटर है। नई कीमत पर चर्चा होनी शुरू हो गई है क्योंकि अनाज आधारित डिस्टिलरी इकाइयों का कहना है कि अगर चावल के दाम कम रहते हैं तो 47.63 रुपये की कीमत भी ठीक है। लेकिन अब जब खुले बाजार और एफसीआई द्वारा खुली निविदा प्रक्रिया के तहत बेचे जाने वाले चावलों की कीमतें बढ़ गई हैं तो वर्तमान कीमत लाभदायक नहीं रह गई हैं। 75 करोड़ लीटर क्षमता वाली अनाज आधारित डिस्टिलरी इकाइयों की क्षमता का पूरा उपयोग नहीं होने के पीछे यह एक बड़ा कारण है। 

डिस्टिलरी इकाइयां चाहती हैं कि एफसीआई गोदामों से आने वाले टूटे हुए चावल की कीमत 22-23 रुपये किलो हो जबकि ओएमसी इस अनाज से उत्पादित एथनॉल को वर्तमान मूल्य से अधिक दर पर खरीदती हैं। 

अधिकारियों का कहना है कि सरकार दोनों सुझावों पर गंभीरता से विचार कर रही है क्योंकि वह जल्द से जल्द 10 प्रतिशत एथनॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम को शुरू करना चाहती है, और इस लक्ष्य को केवल गन्ने की मदद से पूरा नहीं किया जा सकता। इस साल 5.11 अरब लीटर एथनॉल की आवश्यकता के मुकाबले चीनी मिलों तथा अनाज-आधारित डिस्टिलरी इकाइयों ने मिलकर 2019-20 (दिसंबर-नवंबर) में केवल 1.63 अरब लीटर एथनॉल के लिए बोलियां लगाईं। इसने वर्ष 2020 तक 10 प्रतिशत एथनॉल सम्मिश्रण योजना पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अधिकारियों का कहना है कि इस योजना में दूसरी समस्या ऐसे वेयरहाउसों का चुनाव करना है जहां एफसीआई के पास अधिशेष अनाज है और अनाज आधारित डिस्टिलरी इकाइयां भी आसपास ही स्थित हों, जिससे परिवहन लागत को कम रखा जा सके। 

इसके लिए केंद्र ने राज्यों के साथ मिलकर काम करना शुरू कर दिया है और अधिशेष उच्पादन करने वाले क्षेत्रों की पहचान कर पास स्थित डिस्टिलरी इकाइयों का पता लगा रही है। छत्तीसगढ़ ने इस प्रस्ताव पर काम करना भी शुरू कर दिया है। भूपेश बघेल सरकार ने अक्टूबर महीने में एक निविदा जारी की जिसमें अनुमान लगाया गया है कि राज्य की पीडीएस संबंधी जरूरतों के बाद छत्तीसगढ़ में करीब 38 लाख टन चावल अधिशेष मात्रा में है। इसका उपयोग अनाज आधारित एथनॉल उत्पादन में किया जा सकता है। यह निविदाराज्य में नई जैव-रिफाइनरियों की स्थापना के लिए है। 

बघेल ने नवंबर में पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से कहा था कि वे उन राज्यों को इसकी अनुमति दें जिनके पास जैवईंधन बनाने के लिए चावल अधिशेष है। अनाज आधारित एथनॉल संयंत्रों के लिए फीडस्टॉक में किसी भी भविष्य की कमी की आशंका पर अधिकारियों ने बताया कि उनके अनुमान के हिसाब से देश में उत्पादित लगभग 14 प्रतिशत अनाज (चावल तथा गेहूं) अधिशेष रह जाता है। दो वर्ष बाद यह अधिशेष बेकार हो जाएगा और उस समय की स्थिति में खाने योग्य नहीं बचेगा। इस बीच, पेट्रोलियम मंत्रालय ने इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन और भारत पेट्रोलियम से कहा है कि वे गन्ने के अलावा दूसरे उत्पादों पर आधारित दूसरी पीढ़ी की 12 एथनॉल विनिर्माण इकाइयां लगाएं। एक अधिकारी ने कहा, 'दिसंबर 2020 तक इस तरह के पांच अन्य प्लांट काम शुरू कर देंगे।'

दूसरी ओर, गन्ना आधारित मौजूदा एथनॉल विनिर्माण इकाइयों को तकनीकी उन्नयन तथा बहु-मॉडल संयंत्रों में बदलने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। ये उन्नत इकाइयां अनाज तथा गेहूं दोनों से एथनॉल बना सकती हैं। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि चीनी संयंत्रों को अपने मौजूदा गन्ना आधारित एथनॉल बनाने वाली इकाइयों को उन्नत करने के लिए 15-20 करोड़ रुपये के निवेश की आवश्यकता होगी। 

Keyword: food, food grain, rice, ethanol, FCI, Feedstock,
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