बिजनेस स्टैंडर्ड - सलाखों से बाहर भी अधूरी रिहाई...
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Friday, April 03, 2020 09:07 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम खबर

सलाखों से बाहर भी अधूरी रिहाई...

वीरेश्वर तोमर /  12 25, 2019

कैदी जब जेल से रिहा होते हैं तो उनके सामने चुनौतियों की और भी ऊंची दीवारें खड़ी होती हैं - सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार की दीवारें  

पंजाब के जालंधर में रहने वाले विक्रम दो दिनों से एक ढाबे पर वेटर का काम कर रहे थे। आज उन्हें एक कार्यक्रम में शामियाना लगाने जाना है। विक्रम दिहाड़ी मजदूर हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि वह पढ़े-लिखे नहीं हैं। विक्रम के पास बीए की डिग्री के साथ ही मानवाधिकार तथा पर्यावरण जैसे क्षेत्रों में सर्टिफिकेट पाठ्यक्रम करने का अनुभव भी है। इतना ही नहीं, वह सिलाई के हुनर में भी माहिर हैं। लेकिन इतनी योग्यता के बाद भी उनके पास ढंग की नौकरी नहीं है क्योंकि 10 साल का वह अरसा उनके और नौकरी के बीच आड़े आ जाता है, जो उन्होंने गाजियाबाद की डासना जेल में बिताया था।

विक्रम को 2006 में गाजियाबाद पुलिस ने नशीले पदार्थों की तस्करी के आरोप में गिरफ्तार किया था। उस वक्त वह अपनी मां के साथ गाजियाबाद में रहते थे। विक्रम बताते हैं, 'मेरे पिता नशा करते थे और घर आकर मारपीट करते थे। कुछ समय बाद वह हमसे अलग रहने लगे, लेकिन उनके काम-धंधे के बारे में मुझे कुछ भी नहीं पता था। मुझे किसी भी तरह खुद को और मां को पालना था और उस वक्त मुझे वही रास्ता नजर आया।'

विक्रम को अदालत ने दोषी पाया और 10 साल के लिए जेल भेज दिया। विक्रम कहते हैं, 'जेल में पहली रात मुझे आज तक याद है। मैं एक मिनट भी नहीं सो पाया। मां का चेहरा याद आता था और चिंता हो रही थी कि उनके खाने-पीने का इंतजाम कौन करेगा। जेल में हर तरह के लोग आपके इर्द-गिर्द होते हैं, लेकिन मैंने पढ़ाई का रास्ता अपनाया।' विक्रम ने जेल में रहते हुए ही 10वीं, 12वीं और बीए की पढ़ाई पूरी की। वहां उन्होंने सिलाई और नृत्य सीखा तथा मानवाधिकार और पर्यावरण का सर्टिफिकेट कोर्स भी किया।

सजा काटकर विक्रम 5 अगस्त 2017 को बाहर आ गए, लेकिन समाज ने अब तक उन्हें स्वीकार नहीं किया है। पहले उन्होंने घर बदला फिर नौकरयां तलाशीं। पहले एटीएम में गार्ड की नौकरी की, उसके बाद पंजाब के एक नामी अस्पताल में वार्ड बॉय बन गए। लेकिन पढ़ाई के दस्तावेजों में लिखा जेल का पता एक बार फिर आड़े आ गया और दो दिन बाद ही उन्हें अस्पताल से निकाल दिया गया।

यह कहानी केवल विक्रम की नहीं है। जेल सुधार के लिए काम करने वाली संस्था इंडिया विजन फाउंडेशन की निदेशक मोनिका धवन बताती हैं कि हमारे चारों ओर ऐसे कई लोग हैं, जो किसी वजह से जेल जाने के बाद बेहतर बनकर लौटे, लेकिन समाज ने कभी उन्हें माफ नहीं किया। वह कहती हैं, 'समाज उन्हें स्वीकारने से कतराता है और उनसे दूरी बना लेता है। कई साल जेल में बिताने के बाद जब वे एकदम बदली हुई दुनिया में दाखिल होते हैं और उनके पास नौकरी के सीमित विकल्प होते हैं तो समाज उन्हें एक बार फिर उसी दुनिया में लौटने के लिए मजबूर क्यों करता है।'

आवाज में भारीपन और मायूसी के साथ विक्रम बताते हैं, 'मेरी मां ने मुझे आज तक माफ नहीं किया। मेरे जेल में रहते हुए एक बार उन्हें दिल का दौरा पड़ा और वे बीमार रहने लगीं। अब वह वृद्घाश्रम में हैं और मुझसे नाराज हैं।'

विडंबना ही है कि बड़ी तादाद में ऐसे कैदी भी हैं, जिनका मामला विचाराधीन है यानी जिनका अपराध अभी सिद्घ नहीं हुआ है और जिनके मामलों की सुनवाई चल रही है। लेकिन अदालत में मुकदमों के अंबार के कारण कई बार सुनवाई महीनों या वर्षों तक चलती रहती है और वह अरसा उन्हें जेल में गुजारना पड़ता है। टाटा ट्रस्ट द्वारा नवंबर 2019 में जारी इंडिया जस्टिस रिपोर्ट के मुताबिक देश की जेलों में करीब 68 फीसदी कैदी विचाराधीन हैं।

दिक्कत यह है कि निर्दोष सिद्घ होने के बाद भी जेल से बाहर आने पर उन्हें आम कैदियों या अपराधियों की ही तरह समाज का तिरस्कार झेलना पड़ता है, जो उन्हें सामान्य जीवन बिताने से रोकता है। 

नई चुनौतियां

करीब साढ़े तीन साल जेल में रहने के बाद 2015 में गाजियाबाद जेल से बाहर आए प्रीतेश सिंह रघुवंशी का कहना है कि जेल जाने से उनका पूरा परिवार कई साल पीछे चला गया। वह कहते हैं, 'मेरे जेल जाने की खबर के बाद बहन की ससुराल वाले उसे परेशान करने लगे और कुछ समय बाद उसे घर से निकाल दिया। मां-पिता बीमार रहते थे मगर उनकी दवा के इंतजाम का कोई साधन मेरे पास नहीं था।'

प्रीतेश आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश) के पास बिनुपुर गांव के रहने वाले हैं। वह मारुति सुजुकी के मानेसर संयंत्र में क्वालिटी मैनेजमेंट इंचार्ज के पद पर काम करते थे। 2012 में उस संयंत्र में हुई बहुचर्चित हिंसा में उन्हें भी आरोपी बनाया गया था। पुलिस ने उसी साल 19 जुलाई को उन्हें पूछताछ के लिए बुलाया और गिरफ्तार कर लिया। उसी दिन से उनकी जिंदगी का स्याह पन्ना शुरू हो गया। अदालत ने आखिरकार प्रीतेश को बेकसूर करार दिया मगर बाहर नई चुनौतियां उनका इंतजार कर रही थीं। वह कहते हैं, 'जेल से बाहर आने पर आपके सामने दो रास्ते होते हैं। पहला, अपराध की दुनिया का और दूसरा, समाज में बेहतर तथा नई जिंदगी का। पहला तरीका आसान है क्योंकि आप जेल से आ रहे हैं, जहां आपको हर तरह के लोग मिले थे। दूसरे तरीके के लिए न तो समाज आपका साथ देता है और न ही नई शुरुआत के लिए आपके पास पैसा या जगह होती है।'

बिजनेस स्टैंडर्ड सलाखों से बाहर भी अधूरी रिहाई...

ह्यूमन राइट लॉ नेटवर्क से जुड़ीं जेल सुधार कार्यकर्ता सिस्टर सुमा कैदियों का दर्द बयां करती हैं, 'जेल से बाहर आने के बाद कोई उनसे मिलना नहीं चाहता, नौकरी नहीं देना चाहता। समाज बहुत जल्दी बदल रहा है और बाहर आने पर उन्हें एकदम नई दुनिया मिलती है। ज्यादातर कैदियों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होती और रिहाई के बाद उन्हें मानसिक तनाव, तिरस्कार तथा अपमान झेलना पड़ता है। ऐसे में वे नई शुरुआत कैसे करें?'

ऐसा भी नहीं है कि सजा काटने के बाद व्यक्ति पूरी तरह चौराहे पर खड़ा होता है। कुछ संस्थाएं और सरकार की नीतियां उसकी मदद करती हैं। मसलन दिल्ली में कैदियों को पुनर्वास नीति के तहत आर्थिक मदद दी जाती है। 6 महीने से 5 साल तक सजा काटने वाले को 30,000 रुपये, 5 से 10 साल की सजा वाले को 40,000 रुपये और 10 साल से अधिक सजा काटने वाले व्यक्ति को 50,000 रुपये बाहर निकलने पर दिए जाते हैं। मगर ज्यादातर राज्यों में ऐसी कोई नीति नहीं है और दिल्ली जैसे शहर में आजकल यह रकम बहुत मामूली होती है। इसलिए जेल से बाहर आते ही सामाजिक तिरस्कार से भी बड़ी चुनौती आर्थिक भरण-पोषण की होती है।

सजा काटकर निकलने वाले व्यक्ति को अगर सामाजिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर दिक्कतें आएं तो वह गलत राह भी चुन सकता है। दिल्ली में साकेत इलाके के गोविंद को चोरी, लूटपाट और हत्या के जुर्म में गिरफ्तार किया गया था। 2004 में उन्हें साथियों के साथ फरीदाबाद जेल भेज दिया गया। गोविंद 2006 में जमानत पर बाहर आए, लेकिन कुछ अरसा बाद उन्हें दोषी पाते हुए दोबारा जेल भेज दिया गया। सजा पूरी करने के बाद जनवरी 2016 में जेल से बाहर आए गोविंद के माता-पिता ने उन्हें कभी माफ नहीं किया। वह कहते हैं, 'उन्होंने अपना फर्ज जरूर निभाया। शुरू में वे मुझसे मिलने जेल आते थे। बाद में काफी अरसे तक कोई नहीं आया तो पता चला कि मां को लकवा मार गया और पिता 2015 में चल बसे।'

गोविंद की कहानी सुनकर लगता है कि जेल से बाहर आए व्यक्ति के लिए गलत राह चुनना सबसे आसान विकल्प होता है। वह बताते हैं, 'जेल में रहते हुए मैं कई गिरोहों के संपर्क में आया। वे हमारी काफी मदद करते थे और हम भी उनकी ओर झुकते चले गए। 2006 में जमानत पर बाहर निकलने के बाद कुछ दिन मैंने उनके लिए काम भी किया।' मगर 2016 में जब गोविंद बाहर आए तो दिल्ली बदल चुकी थी, उनका घर बदल चुका था। हफ्तों बाद उन्हें पता चल पाया कि छोटा भाई कहां रहता है।

जालंधर निवासी विक्रम से जब पूछा गया कि उनका अतीत पता चल जाए तो पड़ोसी क्या करेंगे तब उन्होंने कहा, 'सब बदल जाएंगे। अभी सब अपने घरों में आने देते हैं। खुलासा हो गया तो शक की निगाहों से देखने लगेंगे। कई राज हमें छिपाने ही पड़ते हैं।' 

महिलाओं की ज्यादा चुनौती

किसी भी सजायाफ्ता या जेल में रह चुके शख्स के लिए बाहर सामान्य जिंदगी जीना आसान नहीं होता। लेकिन अगर वह महिला हो तो चुनौतियां और भी बड़ी हो जाती हैं। जालसाजी और लूटपाट के आरोप में 2 साल तक जेल में रहीं रेखा (बदला हुआ नाम) को इसका अहसास अच्छी तरह हो रहा है। वह बताती हैं, 'मेरी 4 साल की बच्ची है। जब मेरे पति को मेरे जेल जाने की खबर मिली तो उसने मुझे हमेशा के लिए छोड़ दिया। साथ ही बेटी को भी उसने बेसहारा छोड़ दिया। मेरी बहन ने किसी तरह मेरी बच्ची को पाला। जेल से बाहर आते ही मैंने अपना ठिकाना बदल लिया है और अब दिहाड़ी मजदूरी कर मैं बसर कर रही हूं।'

रेखा को यह नहीं पता कि महिला कैदी के 6 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए जेल में विशेष पालन गृह (क्रेच) होते हैं। रेखा ही नहीं कई महिला कैदियों को क्रेच के बारे में नहीं पता होता और उन्हें अपने नन्हे बच्चे बाहर छोडऩे पड़ते हैं। हालांकि जेल में इसके लिए पर्याप्त व्यवस्था होती है।

तिहाड़ जेल ने सूचना के अधिकार के तहत पूछे एक सवाल के जवाब में बताया कि 22 नवंबर 2019 को केंद्रीय कारागार संख्या 16 (जो विशेष तौर पर महिला कैदियों के लिए बनाई गई है) में कुल 258 महिला कैदी थीं। यह भी बताया गया कि इन महिला कैदियों के साथ 6 वर्ष तक की उम्र के कुल 22 बच्चे वहां बने क्रेच में रह रहे थे। क्रेच में बच्चों की सभी सहूलियतों का खयाल रखा जाता है। उन्हें शिक्षा, भोजन, कपड़े और जरूरत का सामान मुहैया कराया जाता है।

सुधार और कैदियों के भविष्य पर ध्यान देने की जरूरत

आम मान्यता यही है कि अपराधियों या भटके हुए लोगों को सही राह पर लाने या उनका सुधार करने के लिए उन्हें जेल में भेजा जाता है। लेकिन हकीकत में जेलों के भीतर कैदियों को सुधारने की ठोस व्यवस्था है ही नहीं। इससे भी बड़ी समस्या यह है कि जेल से बाहर आने के बाद कैदियों के पुनर्वास यानी उन्हें मुख्यधारा में शामिल करने की फिक्र सरकारों के भीतर नहीं दिखती। चुनिंदा गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) या इक्का-दुक्का राज्यों में जेल प्रशासन इसकी चिंता कर लेता है, लेकिन सामान्य तौर पर इसे नजरअंदाज ही किया जाता है, जिसका खमियाजा सजा काटकर बाहर आने वालों को भुगतना पड़ता है।

दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और महाराष्ट्र की विभिन्न जेलों में पिछले 25 वर्षों से जेल सुधार पर काम कर रही इंडिया विजन फाउंडेशन की निदेशक मोनिका धवन बताती हैं कि कैदियों के पुनर्वास के लिए सरकारी नीतियां दिखती ही नहीं हैं। वह कहती हैं कि जेल राज्य का विषय है, लेकिन कुछेक राज्यों के अलावा कहीं भी कैदियों के पुनर्वास के नियम ही नहीं हैं। इस बारे में सूचना के अधिकार के तहत मिले जवाब में पता चला कि दिल्ली में कैदियों के पुनर्वास की नीति है, जिसके अंतर्गत सजा काटकर बाहर  निकले कैदियों को आर्थिक सहायता दी जाती है।

इसमें 6 महीने से 5 साल तक सजा काटने वाले व्यक्ति को 30,000 रुपये, 5 से 10 साल की सजा वाले व्यक्ति को 40,000 रुपये और 10 साल से अधिक की सजा काटकर बाहर आए व्यक्ति को 50,000 रुपये बतौर आर्थिक सहायता प्रदान किए जाते हैं। लेकिन अक्सर कैदियों को इसकी जानकारी ही नहीं होती क्योंकि उन्हें जेल से बाहर आने की जल्दी होती है।

गृह मंत्रालय के अधीन पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2017 में विभिन्न राज्यों में कुल 722 एनजीओ जेल सुधार से जुड़े थे। इनमें सबसे ज्यादा 143 उत्तर प्रदेश में थे। मगर रिपोर्ट पर बारीक नजर डालने से पता चलता है कि इनमें केवल 23 एनजीओ कैदियों के पुनर्वास में मदद कर रहे थे। बाकी सब जेल के भीतर आध्यात्मिक चिंतन, योग, प्राणायाम और कौशल विकास में मदद कर रहे थे। 

इंडिया विजन फाउंडेशन द्वारा जारी 2019 की सालाना रिपोर्ट में बताया कि संस्थान ने इस वर्ष कुल 13,926 कैदियों को कौशल विकास एवं पुनर्वास में मदद की है और इनमें से 429 जेल से बाहर आने के बाद भी उनसे संपर्क में हैं। मगर हकीकत में इससे कर्ई गुना प्रयास की जरूरत है क्योंकि कैदियों की बड़ी तादाद इससे अछूती रह जाती है। 

टाटा ट्रस्ट की इंडिया जस्टिस रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय जेलों में क्षमता से 14 फीसदी अधिक कैदी हैं, जिनमें करीब 68 फीसदी विचाराधीन कैदी हैं। रिपोर्ट के अनुसार देश की अदालतों में करीब 2.8 करोड़ मामले विचाराधीन हैं और उनमें से 28 फीसदी 5 साल से भी ज्यादा अरसे से लटके हुए हैं। अगर इन्हें समुचित कौशल देकर पुनर्वास के लायक नहीं बनाया जाता है तो मुख्यधारा में जुडऩे के बजाय ये गलत राह पर जा सकते हैं। 

जेल सुधार कार्यकर्ता सिस्टर सुमा कहती हैं कि कैदियों को शिक्षित करके उन्हें सही राह पर लाया जा सकता है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2015 में जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों में से 28.2 प्रतिशत अशिक्षित और 42.2 प्रतिशत कक्षा 10 से कम (कुल 70.08 प्रतिशत) पढ़े लिखे थे। यदि इन्हें पढ़ाने के साथ ही सिलाई, कंप्यूटर, नृत्य, पेंटिंग और छोटे-मोटे हुनर का प्रशिक्षण दिया जाता है तो उन्हें नया जीवन शुरू करने में काफी मदद मिलेगी।

Keyword: prisoner, imprisonment, jail, crime, criminal, female prisoner, rehabilitation, jail reform, Crime record bureau,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या सरकार की पहल से दाल मिलों की घटेगी मुश्किल?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.