बिजनेस स्टैंडर्ड - सरकार क्यों अपनाती हैं उथल-पुथल की राह?
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Monday, February 17, 2020 05:29 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

सरकार क्यों अपनाती हैं उथल-पुथल की राह?

टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  December 25, 2019

मई 2014 और नवंबर 2016 के बीच मोदी सरकार पुराने ढर्रे पर चल रही थी और हर कोई यही शिकायत कर रहा था कि सरकार पर्याप्त तेजी से काम नहीं कर रही है। परंतु उसके बाद उसने जो तेजी अख्तियार की है वह कई बार बहुत अधिक उथल-पुथल करने वाली साबित हुई है। 

बात चाहे नोटबंदी की हो या जीएसटी की या फिर तीन तलाक या अनुच्छेद 370 अथवा नागरिकता कानून में ताजा संशोधन की, सरकार ने चरणबद्घ तरीके से बदलाव करने के बजाय इन्हें अचानक और बड़े पैमाने पर लागू करने का प्रयास किया है। यहां तक कि जेएनयू की शुल्क वृद्घि भी इस लिहाज से बहुत ज्यादा थी कि उसे 10 रुपये प्रति माह से बढ़ाकर 2,400 रुपये प्रति माह किया गया।

 

इस व्यवहार को समझने के लिए शायद हमें वह समझना होगा जिसे जर्मन युगचेतना कहते हैं। इसके साथ ही उस कदम को भी देखना होगा जो सरकार को राजनीतिक लाभ पहुंचाने वाले उठाते हैं। इसे अच्छी तरह समझने के लिए हमें सन 1969 के दौर में जाना होगा। उस वर्ष जुलाई में इंदिरा गांधी ने कांग्रेस पार्टी में विभाजन किया और वह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सहायता से एक अल्पमत सरकार चला रही थीं। उसे प्रसन्न करने के लिए उन्होंने देश के 14 सबसे बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इसके बाद उन्होंने प्रिवी पर्स की व्यवस्था समाप्त कर दी। यह वह व्यवस्था थी जिसके तहत गैर ब्रिटिश भारत के शासकों को मासिक तौर पर कुछ धनराशि दी जाती थी। यह राशि इसलिए दी जाती थी क्योंकि वे भारतीय गणराज्य में शामिल हुए थे। उन्होंने कहा था कि वह विशेष अधिकार समाप्त कर रही हैं। सन 1971 से 1973 के बीच उन्होंने कोयला उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया। 

उनके कोयला मंत्री पी कुमार मंगलम थे जो पहले वामपंथी रह चुके थे। सन 1973 में उन्होंने अनाज के कारोबार का भी राष्ट्रीयकरण कर दिया था। अच्छी बात यह थी कि यह कुछ ही महीने चला। सन 1974 से 1976 के बीच विदेशी तेल कंपनियों का भी निजीकरण कर दिया गया था। यह सब बहुत बड़ी उथलपुथल थी। इससे पहले देश ने ऐसा कुछ नहीं देखा था। 

कारण

सरकार इतने बड़े पैमाने पर हंगामा क्यों खड़ा करती है इसे लेकर मेरे मन में दो व्याख्याएं हैं। इनमें से एक प्राथमिक है तो दूसरी नीतिगत। बाद वाली स्थिति के लिए सरकार को किसी ऐसे को प्रसन्न करना होता है जिसका समर्थन उसके अस्तित्व के लिए जरूरी हो। या फिर कोई ऐसा जो सत्ताधारी दल को वैचारिक संबल प्रदान कर सके। 

परंतु इसे सफल बनाने के लिए यह आवश्यक है कि पहली स्थिति बन चुकी हो। यानी युग चेतना आ चुकी हो। एक अच्छा राजनेता समझ जाता है कि यह कब हो रहा है और वह इसका फायदा उठाता है। इंदिरा गांधी ने सन 1960 के दशक के आखिर तक विकसित हुई संपत्ति के पुनर्वितरण की ललक को पहचान लिया था और उन्होंने इसका पूरा लाभ लिया। उस नजरिये से देखें तो यह समझना महत्त्वपूर्ण है कि व्यापक उथलपुथल की समस्या अकेले सरकार की खड़ी की हुई नहीं होती बल्कि इसके लिए देश का मिजाज भी वजह होता है जो बदलता है। ऐसे में वास्तविक प्रश्न यह होना चाहिए कि आखिर नया मिजाज क्यों आता है और राजनेता नया मिजाज बनाते हैं या वह मिजाज नेता बनाता है? उदाहरण के लिए सन 1960 के दशक के अंत तक न तो समाजवाद और न ही मौजूदा स्वरूप वाली धर्मनिरपेक्षता राजनीतिक मंचों पर नजर आती थी। इन बातों के बारे में कोई भी ज्यादा बात नहीं करता था। बल्कि इन विचारों को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किए जाने को नापसंद किया जाता था और लोग इसे खारिज कर देते थे।

जन संघ जैसे जिन दलों ने इस पर जोर दिया उनकी अनदेखी करनी उचित समझी गई। सन 1989 तक जन संघ का चुनावी प्रदर्शन इसका गवाह है। सवाल यह है कि बदला क्या? जैसा कि मैंने पहले भी कहा था सन 1960 के दशक में कांग्रेस पार्टी की वामपंथ पर निर्भरता एक महत्त्वपूर्ण कारक थी। इसके चलते पुनर्वितरण का इस हद तक इस्तेमाल हुआ कि देश कुछ ज्यादा ही समाजवादी बन गया। सन 1976 में इंदिरा गांधी ने समाजवादी शब्द को देश के संविधान में भी जोड़ दिया। धर्मनिरपेक्ष शब्द को भी उन्होंने ही इसका हिस्सा बनाया। 

कारक

मुझे लगता है कि जिस तरह समाजवाद को लेकर मिजाज में बदलाव आया, वही स्थिति इन दिनों धर्मनिरपेक्षता के साथ बन चुकी है। इसके पीछे चाहे जो भी तात्कालिक या दीर्घकालिक कारण हों लेकिन सच यह है कि देश के लोग अब बहुत बड़ी तादाद में धर्मनिरपेक्षता से मुंह मोड़ चुके हैं। परंतु राजनीतिक लेनदेन की स्थिति हमेशा एकतरफा नहीं रहती। सन 1974 तक एक बड़े आर्थिक संकट और संसद और राज्य विधानसभाओं में भारी बहुमत के बल पर इंदिरा गांधी वामपंथ से दूरी बनाने में कामयाब रहीं क्योंकि उन्हें उनकी आवश्यकता नहीं थी। उसके बाद वह एक समाजवादी स्वरूप में ही सही लेकिन अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने और मजबूत बनाने में कामयाब रहीं। 

इसकी तुलना वर्तमान से करते हैं। मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल को बमुश्किल सात महीने हुए हैं और इसने हर वह काम किया है जो पार्टी और उसका वैचारिक साझेदार चाहता है- तीन तलाक, अनुच्छेद 370 का खात्मा और नया नागरिकता अधिनियम। परंतु अब जबकि बड़े राजनीतिक काम हो चुके हैं, समय आ गया है कि वह अर्थव्यवस्था पर ध्यान दे जो असली समस्या बना हुआ है। संभाव्यता के सिद्धांत में इसे ऐसा बदलाव कहा जाता है जिसमें आप चर को इस प्रकार परिवर्तित कर सकते हैं कि चीजें आपके पक्ष में घटित हों। इंदिरा गांधी ने इसका सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया। अब मोदी भी ऐसा कर रहे हैं। हकीकत में उन्हें करना ही चाहिए। इंदिरा गांधी ने राष्ट्रीयकरण किया था, मोदी को इसे समाप्त करना चाहिए।

Keyword: Citizenship Amendment bill, NRC, CAB, National Citizen Register, demonetization, nationalization, banking, policy, government,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या आयात से जुड़ीं औपचारिकताओं में छूट से आपूर्ति में होगा सुधार?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.