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धन बचाने के लिए खाद्य व कृषि सब्सिडी को बनाएं तार्किक

संजीव मुखर्जी / नई दिल्ली December 24, 2019

सरकार सुधारात्मक कदम उठाकर विभिन्न तरह की खाद्य, उर्वरक और कृषि सब्सिडी पर होने वाला सालाना खर्च आसानी से 10,000 से 15,000 करोड़ रुपये सालाना बचा सकती है। एक उच्च स्तरीय समिति ने यह सिफारिश की है। समिति के मुताबिक यह धन बचाकर देश के ग्रामीण इलाकों में नौकरियों के सृजन और गरीबों की आजीविका पर खर्च किया जा सकता है। समिति ने ग्रामीण और कृषि क्षेत्र के लिए अगले 5 साल का खाका तैयार किया है और इन कदमों की वकालत की है। अधिकारियों ने कहा कि इसमें कृषि ऋण को ज्यादा साक्ष्य आधारित करने और खाद्य अधिनियम के तहत सस्ते अनाज का कवरेज शहरों में सीमित करने का सुझाव दिया गया है। 

इसमें अनुमान लगाया गया है कि सरकार हर साल विभिन्न खाद्य और कृषि सब्सिडी पर करीब 4 से 5 लाख करोड़ रुपये खर्च करती है। इनमें से कुछ को आसानी से तार्किक बनाया जा सकता है और धन बचाकर उसे ग्रामीण इलाके में आजीविका सृजन में लगाया जा सकता है। अधिकारियों ने कहा कि इस धन को कृषि उत्पादक संगठनों (एफपीओ), ज्वाइंट लाइबिलिटी ग्रुप्स (जेएलजी) और छोटे व सीमांत किसानोंं को विविधीकृत उत्पादक बनाने पर खर्च कर अवसर पैदा किए जा सकते हैं। इसमें यह भी सुझाव दिया गया है कि एफपीओ और इस तरह के अन्य संगठनों के माध्यम से बेहतर माहौल बनाने के साथ विविधीकरण किया जा सकता है। 

कृषि ऋण के मामले में माना जा रहा है कि समिति ने ज्यादा साक्ष्य और कृषि जलवायु स्थितियों के आधार पर धन मुहैया करने की सिफारिश की है। इससे कृषि ऋ ण सही व्यक्ति तक पहुंचाने में मदद मिलेगी और बड़े भूस्वामियों के बजाय छोटे व सीमांत किसानों को लाभ मिलेगा। सरकार कम अवधि का कृषि ऋण मुहैया कराने में सालाना 15,000 से 18,000 करोड़ रुपये खर्च करती है। 2018-19 में केंद्र सरकार ने कृषि क्षेत्र को 11 लाख करोड़ रुपये कर्ज देने का लक्ष्य रखा था। डिप्टी गवर्नर एमके जैन की अध्यक्षता में बनी भारतीय रिजर्व बैंक की एक आंतरिक कार्यसमूह (आईडब्ल्यूजी) की हाल की रिपोर्ट में भी पाया गया कि सोना गिरवी रखकर लिया जाने वाला कृषि ऋण चिंता का विषय है।

रिपोर्ट में कहा गया है, 'अगर फसल ऋण वित्त की मात्रा पर आधारित नहीं होगा तो इस बात की ज्यादा संभावना है कि जारी किए गए कर्ज की मात्रा कर्ज की वास्तविक जरूरत से ज्यादा हो। इसकी वजह से धन दूसरी जगह लगाए जाने के मामले बढ़ते हैं और इसके साथ ही किसानों के कर्ज में डूबने की संभावना बढ़ती है। इसके अलावा कम अवधि का कृषि ऋ ण ब्याज छूट योजना में आता है, जिससे किसानों को इस तरह का कृषि ऋण लेने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके और ऐसी गतिविधियों से सरकार की सब्सिडी का दुरुपयोग होता है।' साफ है कि समिति चाहती है कि सरकार इस क्षेत्र में काम करे। 

उर्वरक सब्सिडी को तार्किक बनाए जाने के मामले में समिति ने सुझाव दिया है कि पीएम किसान के माध्यम से उपलब्ध किसानों के आंकड़ों का इस्तेमाल किया जा सकता है और इसे भूमि रिकॉर्ड के आंकड़ों से जोड़ा जा सकता है। इससे खामियों व दुरुपयोग को रोका जा सकता है। समिति ने उर्वरकों के मौजूदा डीबीटी प्रारूप को प्रभावी बनाने की वकालत की है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) पर अधिकारियों ने कहा कि समिति की राय है कि शहरी इलाकों में यह ओपन एंडेड प्रकृति की होनी चाहिए और बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों की समीक्षा की जा सकती है।

सभी राज्यों के सभी शहरी इलाकों की 75 प्रतिशत आबादी इस समय एनएफएसए के तहत आती है, भले ही उसे जरूरत हो या नहीं हो। समिति के  क्रांतिकारी सुझावों के बावजूद ज्यादातर विशेषज्ञों का कहना है कि कड़े राजनीतिक प्रतिरोध के कारण इनमें से कुछ सिफारिशों को लागू करना कठिन हो सकता है।

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