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शहरी सहकारी बैंक दूर करें अपनी कमियां : आरबीआई

अभिजीत लेले / मुंबई December 24, 2019

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने कहा है कि शहरी सरकारी बैंकों को कम पूंजी आधार, कमजोर कंपनी परिचालन, धोखाधड़ी रोकने में अक्षमता और नियंत्रण एवं संतुलन की अपर्याप्त प्रणाली जैसी  अपनी कमियों को दूर करने की जरूरत है। हाल में एक शहरी सरकारी बैंक (पंजाब ऐंड महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंक) में अनियमितताओं के खुलासे के दौरान पूंजी पर्याप्तता, प्रशासन और नई तकनीकों को अपनाने की धीमी रफ्तार जैसे मसले सामने आए थे। आरबीआई के मुताबिक सर्वोच्च प्राथमिकता एकसमान नियामकीय एवं निगरानी ढांचा स्थापित करने और इस ढांचे के सर्वोच्च संगठन को दिए जाने की जरूरत है। यह संगठन शहरी सरकारी बैंकों को नकदी और पूंजी सहायता मुहैया कराएगा। 

आगे सहकारी क्षेत्र के सामने दो चुनौतियां हैं। पहली, वे न केवल अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों बल्कि लघु वित्त बैंकों एवं भुगतान बैंकों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ा रहे हैं। दूसरा उन पर आंतरिक कमियों के कारण जोखिम है, जिसमें उनका घोटालों को रोकने में असमर्थ होना भी शामिल है। 

आरबीआई के मुताबिक सहकारी बैंकों का बैंकिंग क्षेत्र में महज 10.6 फीसदी हिस्सा है, लेकिन इसे वित्तीय स्थायित्व के नजरिये से मजबूत करने की जरूरत है। यह क्षेत्र मुख्य रूप से घरेलू बैंकिंग क्षेत्र पर केंद्रित है, जिसमें वित्तीय समावेशन एक अहम पहलू है। इसकी देश भर में मौजूदगी है, विशेष रूप से छोटे शहरों और गांवों में। सहकारी बैंकों की इस अहमियत को देखते हुए उनमें सुधार की दरकार है। इसके लिए सरकारी बैंकों के प्रशासन और वित्तीय स्थिति को सुधारने की जरूरत है। 

शहरी सहकारी बैंकों की बैलेंस शीट में वर्ष 2018-19 में मजबूती आई है। उनकी आस्ति गुणवत्ता औरर प्रावधान अनुपात में सुधार हुआ है। यह सुधार सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक के कई उपायों की बदौलत हुआ है। वर्ष 2014-15 तक शहरी सरकारी बैंकों के फंसे कर्ज (एनपीए) का अनुपात अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों से अधिक था।

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