बिजनेस स्टैंडर्ड - विरोध की वजह कानून या मंदी?
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Wednesday, October 21, 2020 01:56 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम जिरह खबर

विरोध की वजह कानून या मंदी?

आदिति फडणीस /  December 24, 2019

अप्रैल 2019 में ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के प्रति असंतुष्टि के संकेत मिलने लगे थे लेकिन इसकी आहट बड़ी धीमी थी। लखनऊ में कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (सीएआईटी) से संबद्ध कारोबारियों ने वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू करने के तरीके को लेकर खुले तौर पर सरकार की आलोचना की। लेकिन इसमें हैरानी जताने लायक कोई बात नहीं थी। इनमें कई ऐसे छोटे और मझोले कारोबारी भी शामिल थे जिनका पहले सरकार के साथ रिश्ता, उत्पाद कर विभाग में नियमित अंतराल पर मिठाइयों के डिब्बे भेजने से निभता रहा था। इसके बदले में राजस्व संग्रह वाली एजेंसी कुछ इनायत बरतती थी और सरकार को मिलने वाले 14 फीसदी कर को दर्ज ही नहीं किया जाता था। जाहिर है इसका फायदा कारोबारियों को मुनाफे के तौर पर मिलता था। 

जब अप्रैल 2019 में लखनऊ में बिज़नेस स्टैंडर्ड की इस संवाददाता ने उनसे मुलाकात की, तब सब कुछ बदला सा था। लोगों ने बताया कि सब कुछ ऑनलाइन हो चुका है ऐसे में कोई गड़बड़ी नहीं हो सकती है। उनका 14 फीसदी मुनाफा अब कर है जिसका भुगतान सरकार को करना है। लेकिन क्या रिश्वत की मांग खत्म हो गई है? वह कहते हैं, 'ऐसा नहीं है। आपको एक कॉल आएगा कि आपका 3.5 करोड़ रुपये का कुछ बेमेल हिसाब दिख रहा है। साहब बेहद गुस्से में हैं, कागजात लेकर ऑफिस आ जाइए।'  लेकिन क्या सारे कागजात ऑनलाइन नहीं हैं? तब जवाब आता है, 'हां, लेकिन फिर भी लेकर आइए।' लेकिन आपने भाजपा को फिर वोट क्यों दिया? कारोबारी संदेह में जवाब देते हैं, 'आप क्या सोचती हैं। हमें राहुल गांधी को वोट देना चाहिए?' इसके बाद हुए आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उम्मीदवार राजनाथ सिंह ने अपने प्रतिद्वंदी को करीब तीन लाख वोट के अंतर से हरा दिया। लेकिन इसके बावजूद सरकार के प्रति असंतोष बना रहा। 

उस वक्त तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली को इन शिकायतों की जानकारी मिली और उस वक्त ही अर्थव्यवस्था के संकट का पहला संकेत मिलने लगा था। उन्होंने कहा, 'कोई संकट नहीं है। अगर वास्तव में कहीं कोई आर्थिक मंदी होती तब हम एक के बाद एक चुनाव नहीं जीत रहे होते। लोग सड़कों पर उतर गए होते और विरोध-प्रदर्शन कर रहे होते।' उस वक्त भले ही ऐसा न हुआ हो लेकिन अब ऐसा होने लगा है।

अर्थव्यवस्था पर सवाल

विरोध प्रदर्शनों का तात्कालिक कारण धार्मिक और नस्ली भेदभाव है लेकिन इनकी आंतरिक वजहें कुछ और हैं जो बेशक नौकरी, आमदनी और जमीन के अधिकार की चिंताओं से जुड़ा है। ऐसे ही हालात असम में स्पष्ट दिखाई दे देते हैं जहां स्थानीय लोगों का मानना है कि अगर नागरिकता संशोधन कानून लागू होता है तब बांग्लादेश के हिंदू असम में आ जाएंगे और उनकी जमीन, रोजगार और कारोबार छिन जाएंगे। 

1950 और 1970 के दशक में पूर्वोत्तर भारत से गोरखा आए और उनकी तादाद सिक्किम में बढ़ गई जिससे भारत को पूर्व के सिक्किम के चोग्याल वंशजों को हटाने में मदद मिली और तब देश में इसका विलय संभव हुआ। लेकिन इसके बावजूद इस राज्य में नागरिकता से जुड़ा संकट बना रहा क्योंकि यहां देसी मिजो, सिक्किम के लेप्चा और दूसरी जनजाति असुरक्षित महसूस करते रहे। यह खतरा इतना बड़ा नहीं होता अगर भारत के पास सबके लिए नौकरी होती और देश की आर्थिक वृद्धि दर 8-10 फीसदी होती। 

बेरोजगारी 45 साल के उच्चतम स्तर पर है। इस वित्तीय वर्ष की दूसरी तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि कम रहने के संकेत मिल चुके हैं और ऐसी स्थिति में सरकार की भूमिका अहम होगी कि वृद्धि की रफ्तार बढ़ाने के लिए कैसे खर्च किया जाए। नोमुरा की सोनल वर्मा कहती हैं कि दूसरी तिमाही में ज्यादा सरकारी खर्च ने 4.5 फीसदी जीडीपी वृद्धि में 1.9 फीसदी अंक का योगदान दिया और निजी निवेश में तेज गिरावट दिखी। दिसंबर में अपनी मौद्रिक समीक्षा में आरबीआई द्वारा दरों में कटौती न करने जैसे कदम से साफतौर पर भविष्य में मंदी का संकेत मिलता है। 

सामान्य लोगों के लिए इसके क्या मायने हैं? खुदरा बाजार में प्याज की बिक्री 120 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से हो रही है। दिल्ली में दूध की कीमत पिछले हफ्ते 2 रुपये प्रति किलोग्राम बढ़ गई। आम चुनावों के तुरंत बाद भी कीमत बढ़ाई गई थी। इसके अलावा डर यह भी है कि आपके दरवाजे पर कभी भी दस्तक सुनाई दे सकती है और कागजों की मांग हो सकती है। अगर आपके पास यह सब कुछ नहीं होगा तब आपके लिए बंदीगृह (जिसे निचले वर्ग के लोग आश्रम भी कहते हैं) तैयार है।

 हाल में नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) पर जोरशोर से चर्चा जारी है। एक मुस्लिम घरेलू सहायिका ने मुझसे पूछा, 'हम 20 साल पहले बांग्लादेश से आए हैं। मेरे परिवार के पास आधार कार्ड, वोटर कार्ड है और हमने 2019 के चुनाव में वोट भी दिया है। ऐसी चर्चा है कि पुलिस आएगी और हमें ले जाएगी। हमें एक आश्रम में भेजा जाएगा। क्या आप जानती हैं कि बच्चे भी उस आश्रम में जा सकते हैं? 

मानवीय पहलू

कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद कहते हैं, 'हम बातचीत के लिए तैयार हैं और हम उन्हें फिर से आश्वासन देते हैं कि एनआरसी अभी अधिसूचित नहीं हुआ है। हम सबसे बातचीत करेंगे। लेकिन हम टुकड़े-टुकड़े गैंग और न शहरी नक्सली से बात करेंगे।' अब तक सरकार ने एकमात्र यही उदार संकेत दिया है। 

तमिलों के पूर्वजों को ब्रितानी हुकूमत के अधिकारियों ने श्रीलंका के चाय बगानों के लिए बंधुआ मजदूर बनाया था। लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टïे) और श्रीलंका की सेना के बीच हुए1983 के युद्ध के दौरान ये तमिल भागकर भारत आ गए। उस वक्त ये शरणार्थी थे। एक एनजीओ ऑर्गनाइजेशन फॉर इलम रिफ्यूजी रिहैबिलिटेशन के प्रमुख एस सी चंद्रहसन कहते हैं कि ये तमिल आज न तो भारतीय हैं और न ही श्रीलंका के नागरिक हालांकि कई लोगों ने तमिलनाडु के तमिलों के साथ शादी कर ली लेकिन वे स्वभाविक तौर पर भारतीय नहीं हैं। यह एनजीओ तमिलनाडु में करीब एक लाख श्रीलंकाई शरणार्थियों के साथ काम करता है जिनमें से करीब 60,000 कैंप में रहते हैं। वे भले ही शरणार्थी हों लेकिन उन्हें एतराज है कि उन्हें 'दीमक' कहा गया। गृह मंत्री अमित शाह ने अवैध प्रवासियों के लिए इस शब्द का इस्तेमाल किया था। उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं कि एक बार जब एनआरसी की प्रक्रिया शुरू होगी तब उनका और उनके परिवार का क्या होगा। अभी यह अंदाजा लगाना भी मुश्किल है कि एनआरसी और नागरिकता संशोधन कानून की प्रक्रिया कैसे शुरू होगी। लेकिन इतना जरूर स्पष्ट है कि अगर कोई चीज मनुष्य के अस्तित्व को इस तरह से खतरे में डालती है तो वह संभवत: अच्छी राजनीति नहीं है।  

Keyword: Citizen Amendment bill, NRC, CAB, National Citizen Register, Kasmir, Bengal, Assam, Citizen, Muslim, Hindu, BJP, RSS, Congress, Trinmool, Economy, Growth rate, GDP, Slowdown, CAIT, GST, Industry, Business,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या एचयूएल के नतीजे उपभोक्ता मांग में सुधार के संकेत हैं?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.