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अर्थव्यवस्था में तेजी से सुधरेगी एनपीए की स्थिति

अनूप रॉय /  December 24, 2019

भारतीय बैंक फंसे कर्ज की स्थिति से धीरे-धीरे उबर रहे हैं और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) के एक साल तक संकट से जूझने के बाद अब उनमें सुधार की उम्मीद है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) का कहना है कि फंसे कर्ज में आगे और कमी तथा उधारी में तेजी अर्थव्यवस्था के नरमी से उबरने पर निर्भर करेगी। 2018-19 में बैंकिंग क्षेत्र के रुझानों और प्रगति पर आरबीआई की रिपोर्ट में चेताया गया है कि अर्थव्यवस्था में नरमी की वजह से बैंकों और एनबीएफसी द्वारा वाणिज्यिक क्षेत्रों को दी जाने वाली उधारी काफी कम हो गई है, वहीं अनिश्चितता के दौर में खुदरा ऋणों के चूक करने का भी जोखिम हो सकता है। 

रिपोर्ट के अनुसार वाणिज्यिक क्षेत्रों को दिया गया कर्ज अप्रैल-सितंबर में घटकर 52,971 करोड़ रुपये रह गया, जो पिछले साल की समान अवधि में 3.66 लाख करोड़ रुपये बढ़ा था। खुदरा ऋण खंड भी जोखिम मुक्त प्रतीत नहीं हो रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बैंक अपेक्षाकृत कम दबाव वाले खुदरा ऋण पर जोर दे रहे हैं, लेकिन निजी उपभोग में कमी ने विकास की इस रणनीति को सीमित कर दिया है और खुदरा क्षेत्र में भी चूक की आशंका है।' रिपोर्ट के मुताबिक वृद्घि में नरमी और कर्ज उठाव कम होने के साथ ही छिटपुट चूक के मामले और धोखाधड़ी की घटनाओं से ऋणदाता कर्ज देने से हिचक रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है, 'वृहद आर्थिक हालात और खास तौर पर घरेलू आर्थिक गतिविधियों में नरमी ने जोखिम वहन करने की क्षमता को प्रभावित किया है और उधारी की मांग भी कम हुई है जबकि कंपनियां अपने बहीखातों को दुरुस्त करने में लगी हैं।' इसमें कहा गया है कि परिसंपत्ति की गुणवत्ता में सुधार और बैंकिंग क्षेत्र का मुनाफा शुरुआती अवस्था में है और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का पूंजी अनुपात सरकार द्वारा पुनर्पूंजीकरण से बढ़ा है। 

इस माहौल में, प्रभावी दिवालिया संहिता होने के बावजूद गैर-निष्पादित संपत्तियों (एनपीए) की समस्या बनी हुई है और बैंकिंग क्षेत्र में आगे सुधार वृहद आर्थिक हालात में सुधार पर निर्भर करता है। बैंकिंग क्षेत्र का सकल एनपीए अनुपात मार्च 2018 के 11.2 फीसदी से घटकर मार्च 2019 में 9.1 फीसदी रह गया। इतना ही नहीं बैंकिंग क्षेत्र 2018-19 की पहली छमाही में कम प्रावधान की जरूरत के कारण मुनाफे में आ गया। इस दौरान नई पूंजी डालने से भी बैंकों को पूंजी अनुपात में सुधार लाने में मदद मिली। ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता की वजह से इस साल फंसे कर्ज की वसूली में भी सुधार आई है। लेकिन अन्य समाधान प्रणालियों से वसूली दर घटी है, खास तौर पर सरफेसी व्यवस्था के अंतर्गत। 

वर्ष 2018-19 में राष्ट्रीय कंपनी लॉ पंचाट (एनसीएलटी) में 1,135 मामले दर्ज किए गए, जिनमें 1.67 लाख करोड़ रुपये का कर्ज शामिल हैं। लेकिन अब तक महज 70,819 करोड़ रुपये या दावे की राशि का 42.5 फीसदी की ही वसूली हो पाई है। आरबीआई ने सार्वजनिक क्ष्क्षेत्र के बैंकों के विलय के फैसले की सराहना की और कहा कि इससे बैंकिंग क्षेत्र की तस्वीर बदलेगी। आरबीआई ने कहा, 'अत्याधुनिक तकनीक और उन्नत भुगतान प्रणाली से लैस सुदृढ़ पूंजी वाले बैंकों के उभरने से भारतीय बैंकों में वैश्विक बैंकिंग क्षेत्र का अगुआ बनने की क्षमता है।' 

सरकार और आरबीआई बैंकों और एनबीएफसी में सुधार लाने के लिए सक्रिय भूमिका अदा कर रहे हैं, वहीं वाइब्रेंट और सुरक्षित बैंकिंग प्रणाली विकसित करने और प्रतिस्पद्र्घी और उन्नत एनबीएफसी क्षेत्र का विकास करना समय की जरूरत है। बैंकों को न केवल नियामकीय मानदंडों को पूरा करने के लिए, बल्कि बैलेंस शीट को दुरुस्त करने के लिए भी पूंजी की जरूरत है। जोखिम नहीं उठाने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से खाली हुई जगह को निजी क्षेत्र के बैंकों ने भरा है लेकिन निजी बैंकिंग उद्योग में कारोबारी संचालन को लेकर खामियां भी दिख रही हैं। यह ऐसे समय में हो रहा है जब सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की बैलेंस शीट अब तक दुरुस्त नहीं हुई है।बैंकों की ओर से एनबीएफसी क्षेत्र को दिया जाने वाला कर्ज मजबूत बना हुआ है लेकिन बैंकों को अत्यधिक जोखिम से बचने के लिए इस दिशा में ध्यान दिए जाने की जरूरत है।
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