बिजनेस स्टैंडर्ड - उद्योग जगत और मोदी सरकार के रिश्तों का नया दौर
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उद्योग जगत और मोदी सरकार के रिश्तों का नया दौर

ए के भट्टाचार्य /  December 24, 2019

उद्योग जगत के साथ केंद्र सरकार के संपर्क को हमेशा ही दिलचस्पी से देखा जाता है। उद्योग एवं वाणिज्य के दो राष्ट्रीय संगठनों के वार्षिक समारोह पिछले हफ्ते दिल्ली में आयोजित हुए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल समेत कई वरिष्ठ नेता इन समारोहों में मौजूद रहे।

इस बार उद्योग जगत के दिग्गजों की तरफ से कोई ऐसा मुद्दा नहीं उठाया गया जैसा पिछले महीने मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम में देखने को मिला था। उस कार्यक्रम में वरिष्ठ उद्योगपति राहुल बजाज ने कुछ असुविधाजनक सवाल उठाते हुए कहा था कि आज के समय में उद्योगपतियों के बीच सरकार की खुलकर आलोचना करने का भरोसा नहीं रह गया है। शायद एक बड़ा फर्क इन कार्यक्रमों का आयोजन दिल्ली में होना था और सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था के कारोबार पर प्रतिकूल असर को देखते हुए कारोबारी दिग्गजों ने अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए सरकारी प्रतिनिधियों की तरफ से दिए गए सुझावों पर प्रतिक्रिया देने में संयम बरता।

नई दिल्ली के कार्यक्रमों में उद्योग क्षेत्र के दिग्गजों ने इस कदर संयम बरता कि प्रधानमंत्री को उन्हें सुधारों पर अपनी घोषणा का अधिक उत्साह से स्वागत करने के लिए एक से अधिक बार प्रेरित करना पड़ा। मोदी ने कंपनी अधिनियम में कुछ दंडात्मक प्रावधानों को खत्म करने और कॉर्पोरेट कर में कटौती जैसे कदमों का जिक्र किया। वहां जुटे कारोबारी दिग्गजों पर प्रधानमंत्री की नसीहत का असर भी पड़ा और उन्होंने तालियां बजाकर प्रधानमंत्री की बातों का समर्थन भी किया।

उस बैठक में प्रधानमंत्री ने पांच लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य हासिल करने के लिए उद्योग जगत से निवेश के मोर्चे पर साहसिक फैसले लेने का अनुरोध किया। आगामी बजट से उद्योग जगत की अपेक्षाओं की ओर इशारा करते हुए मोदी ने ढांचागत क्षेत्र में अधिक निवेश करने की सरकार की योजनाओं का जिक्र किया। उन्होंने आश्वस्त किया कि उनकी सरकार अर्थव्यवस्था को मौजूदा सुस्ती से उबारने के लिए कदम उठाएगी। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी इसके लिए उत्सुक दिखे कि उद्योग जगत अर्थव्यवस्था की हालत सुधारने और वृद्धि को लेकर उद्योगपतियों की चिंताएं दूर करने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता की तारीफ करे। इस तरह उन्होंने अपनी वह चाहत एकदम नहीं छिपाई कि सुधार लागू करने और वृद्धि में तेजी लाने की सरकार की मंशा को उद्योग जगत स्वीकार करे। उन्होंने उद्योग जगत से कहा कि वह सरकार की तरफ से अब तक उठाए जा चुके कदमों के बारे में खुलकर बोले और केवल आने वाले महीनों में उठाए जाने वाले कदमों पर ही ध्यान केंद्रित न रखे। 

वित्त मंत्री ने भी उद्योगपतियों के इस मंच को संबोधित करते हुए कुछ ऐसी बातें ही कीं। उन्होंने कारोबारी गतिविधियों में तेजी लाने की दिशा में सरकार की प्रतिबद्धता जताते हुए कहा, 'यह सरकार नहीं चाहती कि कारोबार बंद हों। हम कानून बनाकर एवं अन्य तरीकों से कारोबारी गतिविधियों को बहाल करने में मदद करना चाहते हैं। हम आप लोगों के साथ खड़े हैं। मैं चाहती हूं कि आप लोगों के मन से आत्मसंदेह की मनोदशा हमेशा के लिए दूर हो जाए।'

इस तरह का बयान उस सरकार की चिंताएं दर्शाता है जो अतीत के उलट खुद को उद्योग जगत के प्रति अधिक दोस्ताना दिखाना चाहती है। सरकार को भी यह अहसास हो गया है कि निवेश में तेजी लाने और वृद्धि के लिहाज से उद्योग जगत का सहयोग अहम है। लेकिन इससे यह सवाल भी उठता है कि क्या एक सरकार को ऐसी प्रतिबद्धता दिखानी चाहिए कि कारोबार समेटने नहीं दिया जाएगा। क्या यह आश्वासन आर्थिक सुधारों की भावना का उल्लंघन नहीं करता है जहां आर्थिक गतिविधि का हिस्सा बनना और उससे अलग होना बाजार अनुशासन का विषय होना चाहिए?

उद्योग एवं वाणिज्य मंत्री गोयल ने भी भारतीय निर्यात के लिए गैर-शुल्क अवरोध खड़े करने वाले देशों एवं बाजारों की पहचान में उद्योग जगत से सहयोग मांगा। इस कवायद का मकसद भारतीय निर्यात की राह में रोड़े खड़े करने वाले देशों के खिलाफ प्रतिकारी कदम उठाने में सरकार की मदद करने का है। गोयल ने कहा, 'हमारी सरकार आपके साथ खड़ी होना चाहती है और प्रतिकारी कदम उठाने की इच्छा रखती है।' हालांकि यह साफ नहीं था कि क्या इसका मतलब भारत की व्यापार नीतियों में नए तरह के संरक्षणवाद से है? इससे भी महत्त्वपूर्ण यह है कि गोयल ने कारोबारी दिग्गजों को भरोसा दिलाया कि वह और उनका दफ्तर हमेशा ही उद्योग जगत की चिंताओं को दूर करने के उपलब्ध होगा। बकौल गोयल, एक 'जिम्मेदार एवं सुनने वाली' सरकार कारोबारों पर सकारात्मक असर डाल सकती है।

इन बैठकों में यह बात गौर करने लायक है कि मंत्रियों एवं उद्योग के बीच के समीकरण में एक गूढ़ एवं गुणवत्तापरक परिवर्तन आया है। सरकार संपर्क करने के लिहाज से खुद को अधिक लचीला दिखाने के लिए आतुर दिखी ताकि उद्योग जगत भी उसे ठीक से समझे। वह सम्मेलन में जुटे कारोबारी दिग्गजों को प्रभावित करती दिखी कि उसे उनकी समस्याओं की फिक्र है, उनकी शिकायतों को दूर करेगी और कानूनी एवं प्रशासकीय कदमों से आर्थिक वृद्धि बहाल करेगी। शायद भारतीय उद्योग के साथ मोदी सरकार के रिश्तों में यह एक नया दौर है। संभव है कि यह एक अस्थायी दौर और चालू आर्थिक सुस्ती की उपज है। यह नया नागरिकता कानून आने और राष्ट्रीय नागरिक पंजी तैयार करने की योजना के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में उठे कानून-व्यवस्था के सवालों का नतीजा भी हो सकता है। उद्योग जगत यह उम्मीद करेगा कि सरकार एवं उसके बीच उभरे नए समीकरण से अधिक टिकाऊ उद्योग-अनुकूल नीतियां बनने, ढांचागत क्षेत्र में निवेश बढऩे और मांग बहाल करने वाले कदम उठाए जाएंगे। ऐसा होने पर आर्थिक वृद्धि तेज हो सकती है। 

Keyword: Industry, Government, Narendra Modi, Finance Minister, Nirmala Sitaraman, Mumbai,
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