बिजनेस स्टैंडर्ड - जनवादी लोकतंत्र के संरक्षण के जरूरी कदम
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Monday, January 20, 2020 02:36 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

जनवादी लोकतंत्र के संरक्षण के जरूरी कदम

नितिन देसाई /  December 24, 2019

पिछले हफ्ते एनआरसी एवं सीएए के खिलाफ लोगों का प्रदर्शन तेजी से फैलता नजर आया। तात्कालिक वजहों से इतर, ये प्रदर्शन उस भावना को भी रेखांकित करते हैं कि 37 फीसदी मत पाने वाली सत्ताधारी पार्टी विपक्ष और राज्य सरकारों के साथ सलाह-मशविरा किए बगैर या उसका समर्थन नहीं करने वाले 63 फीसदी लोगों की राय को कोई तवज्जो दिए बगैर अपना एजेंडा पूरे जोरशोर से लागू कर रही है। ऐसा भय है कि हम एक ऐसे दौर की तरफ बढ़ते जा रहे हैं जहां कार्यपालिका की लगातार बढ़ती भूमिका के खिलाफ नाममात्र की सुरक्षा रह जाएगी क्योंकि प्रमुख संवैधानिक पद और स्वायत्त संस्थाएं अब राजनीतिक दखल से संरचनात्मक रूप से उतनी अलग नहीं रह गई हैं। जन-संप्रभुता सत्ताधारी दल की कार्यकारी ताकत के आगे जमीन गंवाती नजर आ रही है।

करीब पांच सौ साल पहले संप्रभुता के सिद्धांतों की तस्वीर खींचने वाली सशक्त एवं अग्रगामी पंक्तियां लिखी गई थीं। आम लोगों की सहमति पर आधारित इस अवधारणा को पेश करने वाली पंक्तियों को 'विंडिसिए कांट्रा टिरेनोस' (अंग्रेजी में 'ए डिफेंस ऑफ लिबर्टी अगेंस्ट टाइरैंट्स') शीर्षक से पेश किया गया था। इस पुरानी किताब में बहुत कुछ है जो आज भी न केवल भारत बल्कि दूसरे लोकतंत्रों में भी प्रासंगिक है।

शासकों के आदेश का पालन करने के दायित्व के बारे में यह किताब में कहा गया है, 'शासकों को यह जानने की जरूरत है कि उन्हें अपनी प्रजा पर किस हद तक प्राधिकार दर्शाने की अनुमति है और उनकी जनता को यह जानने की जरूरत है कि वे किस तरह अनुपालन कर सकते हैं? शासक को क्षेत्राधिकार में अतिक्रमण नहीं करना चाहिए और दूसरों को उसका आदेश मानना चाहिए।'

मौजूदा नजरिये से यह बात बेहद प्रासंगिक है कि यह सिद्धांत शासक के अधीन तैनात लोक अधिकारियों और खुद को जनता के सेवक समझने वाले लोगों के बीच विभेद भी करता है। लेख में कहा गया है: 'राजा के आदमी का दायित्व है कि वह समुचित तारतम्य में हो, कॉमनवेल्थ को क्षति से बचाने का काम करे। राजा के सेवक का दायित्व है कि वह किसी घरेलू सेवक की तरह राजा की सेवा करे एवं उसकी मदद करे। वहीं जनता के सेवक का दायित्व है कि वह जनता के अधिकारों को संरक्षित रखने का काम करे और शासक को ऐसे काम करने से रोके जो राज्य के लिए हितकारी कार्यों की राह में बाधा बनते हों और जनता को क्षति पहुंचाने वाला काम करे।'

सार्वजनिक अधिकारियों के इन दो वर्गों के बीच विभेद कर पाना मुमकिन नहीं है अगर उनकी नियुक्ति के लिए तय प्रक्रिया अलग न हो। यह प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए कि संविधान एवं लोगों के अधिकारों के संरक्षण के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के चयन में कार्यपालिका की निर्णायक भूमिका न हो। यह चुनाव प्रक्रिया की पवित्रता, चुनाव-पश्चात नई सरकार के गठन में निष्पक्षता एवं वस्तुनिष्ठता और न्यायपालिका एवं पुलिस को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखने के लिए बेहद जरूरी है।

जन अधिकारों के संरक्षण के नजरिये से पहला एवं सबसे अहम पद राज्यपाल का है। फिलहाल उनकी नियुक्ति केंद्र सरकार राजनीतिक निष्ठा को ही प्रमुख आधार बनाते हुए करती है। मौजूदा समय में तीन को छोड़कर बाकी सभी राज्यपाल सत्तारूढ़ दल के प्रति निष्ठावान हैं। सरकारिया आयोग ने राज्यपालों की नियुक्ति के संदर्भ में कई अहम सुझाव दिए थे। मसलन, राज्यपाल उस राज्य के बाहर का कोई ख्यातिनाम शख्स हो, नियुक्ति के कुछ समय पहले तक सक्रिय राजनीति का हिस्सा न रहा हो और राज्य की स्थानीय राजनीति से उसका करीबी संबंध न हो। सरकारिया आयोग ने राज्यपाल की नियुक्ति के पहले उप राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष और राज्य के मुख्यमंत्री से चर्चा को भी जरूरी बताया था। लेकिन उच्चतम न्यायालय के कहने के बावजूद राज्यपाल के बाहरी व्यक्ति होने के अलावा बाकी सभी सुझावों को केंद्र की किसी भी सरकार ने लागू नहीं किया है। अगर संघवाद को सुरक्षित रखना है और चुनाव के बाद नई सरकार के गठन में थोड़ा औचित्य लाना है तो इस सूरत को बदलना होगा।

जनवादी लोकतंत्र में चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता को बनाए रखना राजनीतिक स्थायित्व के लिए अनिवार्य है। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति सत्ताधारी व्यक्ति किसी से सलाह लिए बगैर करता है। हम खुशकिस्मत हैं कि कुछ असाधारण चुनाव आयुक्त चुनौती पर खरे उतरे हैं और एक भरोसेमंद संस्थान के गठन में मदद की है। लेकिन परवर्ती काल में उनकी निष्पक्षता को लेकर चिंताएं जताई जाती रही हैं और अब उनकी नियुक्ति में अधिक परामर्शकारी एवं पारदर्शी प्रक्रिया अपनाने का वक्त आ गया है। जून 2012 में लालकृष्ण आडवाणी ने सुझाव दिया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति एक कॉलेजियम करे जिसमें प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश, कानून मंत्री और लोकसभा एवं राज्यसभा में विपक्ष के नेता शामिल हों। लेकिन उनके सुझाव को नहीं माना गया और मौजूदा सरकार भी इस पर गौर नहीं करेगी। हालांकि विचारधारा को लेकर छिड़े भारी टकराव के बीच चुनाव प्रक्रिया में भरोसा बनाए रखने की जरूरत और अधिक है।

जन अधिकारों के संरक्षण एवं संवैधानिक औचित्य सुनिश्चित करने के लिए शीर्ष न्यायपालिका की स्वतंत्रता अहम है। 1993 के फैसले के बाद उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार कार्यपालिका से हटकर कॉलेजियम के पास चला गया। नियुक्ति प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता की मांग के प्रति शीर्ष न्यायपालिका का रुख अनुकूल रहा है। लेकिन इस स्वतंत्रता की असली गारंटी एक न्यायिक संस्कृति से आएगी जो संवैधानिक औचित्य और लोगों के अधिकारों के संरक्षण में न्यायाधीशों की भूमिका पर जोर देता हो।

पुलिस राज्य की कार्यपालिका का एक अहम हिस्सा है। लेकिन पुलिस को कार्यपालिका के दबाव से मुक्त रखने के लिए विधि के शासन और लोक अधिकारों के संरक्षण पर बल देने की जरूरत है। वर्ष 2006 में उच्चतम न्यायालय ने पुलिस व्यवस्था में सुधार को लेकर एक बड़ा फैसला दिया था जिसमें राज्य सुरक्षा आयोग बनाने का भी जिक्र था। इस आयोग में पुलिस विभाग के जिम्मेदार मंत्री, विपक्ष के नेता, अन्य निर्वाचित प्रतिनिधि, विशेषज्ञ और नागरिक समाज के विश्वसनीय सदस्य शामिल होंगे। उच्च स्तर पर पुलिस नियुक्तियों में योग्यता एवं पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग, पुलिस प्रतिष्ठान बोर्ड और पुलिस शिकायत प्राधिकरण बनाने का प्रस्ताव भी था। खेद की बात है कि इन सुधारों पर अमल की असली रफ्तार काफी धीमी रही है।

अभी तक सभी सरकारों ने राज्यपालों, चुनाव आयुक्तों एवं उच्च पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव से परहेज किया है। अब भी कुछ अलग नहीं होने वाला है और राजनीतिक दलों के बीच तीखे वैचारिक विभाजन के चलते यह काम अब और भी मुश्किल लगता है। इकलौती आस उच्चतम न्यायालय से ही है कि वह अनुच्छेद 142 के तहत हासिल विशेष शक्तियों का प्रयोग कर इन अधिकारियों की नियुक्ति की प्रक्रिया तय कर दे। इससे चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता, तटस्थता, वस्तुनिष्ठता एवं निष्पक्षता का अनुपालन हो सकेगा। तब तक इन पदों पर बैठे लोगों से केवल यही याद रखने की अपेक्षा की जा सकती है कि वे संवैधानिक औचित्य एवं जन अधिकारों के संरक्षण के लिए अपने नियोक्ता के प्रति नहीं बल्कि इस देश की जनता के प्रति जवाबदेह हैं। 

विंडिसिया के एक आखिरी उपदेश के साथ मैं अपनी बात खत्म करता हूं: 'अत्याचारी पर काबू पाने के लिए साम्राज्य के अधिकारियों को एक साथ या बड़ी संख्या में खड़े होने की छूट है और उनके लिए ऐसा करना न केवल कानूनी दायरे में है बल्कि उनके दायित्व निर्वहन के लिए भी यह जरूरी है। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो वे अपनी नीचता के लिए कोई बहाना नहीं बना सकते हैं।'
Keyword: Citizenship Amendment bill, NRC, CAB, National Citizen Register, Kasmir, Bengal, Assam, Citizen, Muslim, Hindu, BJP, RSS, Congress, Trinmool, Mamta Banergee, Pakistan, India, Bangladesh, Democracy, Public right,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या संपत्तियों की बिक्री से पूरा होगा विनिवेश का लक्ष्य?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.