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आर्थिक वृद्घि का पुन:प्रवर्तन

संपादकीय /  December 24, 2019

अगले वित्त वर्ष का आम बजट तैयार करने की प्रक्रिया में जुटा वित्त मंत्रालय अगर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के कुछ सुझावों पर विचार करे तो बेहतर होगा। ये सुझाव उसने भारत से संबंधित अपनी रिपोर्ट में दिए हैं। आईएमएफ ने ऐसे कई सुधारों का उल्लेख किया है जिनको अपनाकर भारत अपनी आर्थिक वृद्घि दर में इजाफा कर उसे 7.3 फीसदी तक ले जा सकता है। सबसे पहले बैंकों की बैलेंस शीट में गड़बडिय़ों को दूर किया जाना चाहिए और सरकारी बैंकों का संचालन बेहतर बनाया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की निगरानी बेहतर की जानी चाहिए।

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हालांकि सरकार ने सरकारी बैंकों में काफी पूंजी डाली है लेकिन संचालन सुधारों के मामले में सरकार ने सुदृढ़ीकरण के अलावा कोई कदम नहीं उठाया है। ऐसे सुधारों के अभाव में सरकारी बैंकों के वही पुरानी चूक दोहराने और ऋण का किफायती आवंटन न कर पाने की समस्या बनी रहेगी। इसका असर मध्यम अवधि में देश की समग्र आर्थिक वृद्घि पर पड़ेगा। इतना ही नहीं केंद्रीय बैंक को एनबीएफसी समेत व्यवस्था की बेहतर निगरानी के लिए नियामकीय क्षमता में भी सुधार करना होगा। 

दूसरा, मध्यम अवधि में राजकोषीय सुदृढ़ीकरण करते हुए राजकोषीय जवाबदेही एवं बजट प्रबंधन अधिनियम की समीक्षा समिति की अनुशंसाओं का ध्यान रखा जाना चाहिए। सरकार के कुल कर्ज को सकल घरेलू उत्पाद के 60 फीसदी के स्तर तक कम करना आवश्यक है। वर्ष 2018-19 में यह 69 प्रतिशत रहा। राजकोषीय सुदृढ़ीकरण के लिए सब्सिडी को तार्किक बनाने और कर दायरा बढ़ाकर राजस्व को समायोजित करके बचत करने की आवश्यकता होगी। इससे उच्च सरकारी उधारी की जरूरत के कारण कारोबार और निवेश में आ रही कमी को दूर करने में सहायता मिलेगी।

बहरहाल, सरकार द्वारा मौजूदा अगले वित्त वर्ष में वित्त प्रबंधन ही काफी हद तक यह निर्धारित करेगा मध्यम अवधि के राजकोषीय लक्ष्य हासिल हो सकेंगे अथवा नहीं। उदाहरण के लिए मौजूदा वर्ष में राजस्व संग्रह के लक्ष्य से काफी कम रहने का अनुमान है। 

ध्यान देने वाली बात यह है। आईएमएफ ने बजट से इतर फाइनैंसिंग को भी रेखांकित किया है जो घाटे के आंकड़ों को कम महत्त्वपूर्ण बनाती है। पारदर्शिता बढ़ाने की सख्त आवश्यकता है। सीमित राजकोषीय गुंजाइश को देखते हुए आईएमएफ ने सुझाव दिया है कि मौजूदा दौर में राजकोषीय प्रोत्साहन से बचने की जरूरत है। प्रत्यक्ष ही सरकारी उधारी का बढ़ा हुआ स्तर मुद्रा की लागत को बढ़ाएगा। वास्तव में भारतीय रिजर्व बैंक ने लंबी अवधि के बॉन्ड खरीदकर तथा अल्पावधि के बॉन्ड बेचकर प्रतिफल का प्रबंधन करना शुरू किया। इससे सरकार को कम दर पर उधारी लेने में भी मदद मिलेगी। बहरहाल, ऐसे उपायों की अपनी सीमा है और ये केंद्रीय बैंक के नीतिगत प्रबंधन को अनावश्यक रूप से जटिल बना सकते हैं। सरकार को इस मोड़ पर राजकोषीय विचलन के जोखिम से सावधान रहना होगा।

तीसरा, वृद्घि को बढ़ावा देने के लिए अन्य कारकों के अलावा सरकार को उत्पाद, श्रम और भूमि बाजारों में सुधार पर ध्यान केंद्रित करना होगा। चूंकि राजकोषीय मोर्चे पर नीतिगत गति लगभग अनुपस्थित है और मौजूदा वृहद आर्थिक परिस्थितियों में मौद्रिक नीति भी वृद्घि को एक सीमा तक ही मदद पहुंचा सकती है। ऐसे में सरकार को व्यापक सुधारों पर ध्यान देना चाहिए जो मध्यम अवधि में वृद्घि को बढ़ावा दे सकें। उदाहरण के लिए वस्तु एवं सेवा कर प्रणाली की दिक्कतों को व्यापक तौर पर हल करने से न केवल राजस्व में सुधार होगा बल्कि कारोबारी सुगमता में भी सुधार आएगा। वृद्घि और रोजगार बढ़ाने में व्यापारिक उदारीकरण की अहम भूमिका है। अर्थव्यवस्था को नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता है। इससे वृद्घि को स्थायी गति प्रदान करने में सहायता मिलेगी।

Keyword: Budget, Fudget, Profit, Company, Fudge, IMF, Fiscal Deficit,
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