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समझौता न करने की जिद ने सरयू राय को दिलाई जीत!

शिखा शालिनी /  December 23, 2019

सोमवार को जब झारखंड विधानसभा चुनाव की मतगणना का दौर शुरू हुआ तब दोपहर तक ऐसे रुझान आने लगे कि झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास एक स्वतंत्र उम्मीदवार सरयू राय से पिछड़ रहे हैं। इस रुझान के बीच भी दास टेलीविजन चैनलों पर यह कहते नजर आए कि राज्य में भाजपा की सरकार बनेगी। लेकिन उन्हें उस वक्त कोई गंभीरता से नहीं ले रहा था क्योंकि वह अपनी ही सीट बचाने की स्थिति में नजर नहीं आ रहे थे। झारखंड सरकार में पूर्व मंत्री रह चुके बागी सरयू राय ही उन्हें कांटे की टक्कर दी। राय सबके आकर्षण का केंद्र थे क्योंकि उन्होंने अपनी पार्टी से बगावत कर अपने ही मुख्यमंत्री के खिलाफ मोर्चा खोलकर उनके ही क्षेत्र में तगड़ी मात दी थी। 

खबर लिखे जाने तक निर्वाचन आयोग की वेबसाइट के मुताबिक भाजपा उम्मीदवार दास को 57, 607 वोट मिले जबकि राय को 42.57 फीसदी यानी 73,332 वोट मिले। झारखंड सरकार में शामिल रहने वाले राय तब सुर्खियों में आए जब उन्हें जमशेदपुर (पश्चिम) सीट से पार्टी ने टिकट नहीं दी जहां से उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार बन्ना गुप्ता को 10,517 वोटों से हराया था। हालांकि 2009 में वह इस सीट से 2.68 फीसदी मतों के अंतर से चुनाव हार गए थे। 

उन्हें अपने सिद्धांतों और शर्तों पर राजनीति करने वाला नेता माना जाता है जो अपने आत्मसम्मान के साथ कभी समझौता नहीं करते। राय ने अविभाजित बिहार और बाद में झारखंड के गठन के बाद कई घोटालों का पर्दाफाश किया। उनकी ही कोशिशों का नतीजा रहा कि दो पूर्व मुख्यमंत्रियों लालू प्रसाद और मधु कोड़ा को जेल के सलाखों के पीछे जाना पड़ा। वह जनसंघ के एक घटक युवा मोर्चा, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से भी जुड़े रहे हैं। इसके अलावा भाजपा से जुडऩे से पहले उन्होंने जनता पार्टी और जनता दल में भी अपनी राजनीतिक संभावनाएं तलाशने की कोशिश की। बेशक वह झारखंड में भाजपा सरकार के लिए मुश्किलों का सबब बन रहे थे। राय ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया कि उन्होंने झारखंड सरकार में अनियमितताओं के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से भी बात की थी और इन दोनों ने समस्या के समाधान का वादा भी किया था। लेकिन ऐसा कहा जाता है कि प्रधानमंत्री ने इस बागी नेता से दूरी बनाए रखा।  

विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा ने अपने उम्मीदवारों की सूची जारी की लेकिन उनमें राय का नाम नहीं था। राय कहते हैं कि अगर पार्टी उन्हें साफतौर पर टिकट देने से मना कर देती तो वह खुद ही इस बात की घोषणा कर देते कि उन्हें चुनाव नहीं लडऩा। लेकिन उनके मुताबिक पार्टी ने उन्हें नकारात्मक जवाब दिए बगैर ही उनका अपमान किया। राय ने एक साक्षात्कार में बताया कि वह अपमान बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं और इसीलिए उन्होंने उस व्यक्ति के खिलाफ चुनाव लडऩे का फैसला किया जो उनके मुताबिक इन परिस्थितियों के लिए जिम्मेदार था। उन्होंने मीडिया में कहा था कि रघुवर दास दरअसल रघुवर दाग हैं और मोदी डिटर्जेंट और अमित शाह की लाउंड्री भी उन्हें बचा नहीं पाएगी। राय कहते हैं कि उनका भाजपा में वापस जाने का कोई इरादा नहीं है और वह स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर गुण-दोष के आधार पर किसी अन्य पार्टी का समर्थन करते हुए गलत कामों की आलोचना करेंगे। उनका कहना है, 'राज्य के 30 सरकारी विभाग में से 16 विभाग मुख्यमंत्री ने अपने पास रखा था। सभी मलाईदार मंत्रालयों को मुख्यमंत्री ने अपने ही पास रखा। आखिर इसका क्या मकसद हो सकता है। यह बात हमारे प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय अध्यक्ष के संज्ञान में भी थी। इसके बावजूद भी उन्होंने मुख्यमंत्री को पसंद किया।' 

उनका कहना है कि सरकार के गलत कामों के खिलाफ वह आंतरिक स्तर पर आवाज उठा रहे हैं लेकिन उन्हें लोकसभा चुनाव तक कुछ न कहने का निर्देश दिया गया था। वह कहते हैं, 'मेरा जन्म इसलिए नहीं हुआ है कि मैं किसी को खुश रखूं। मैंने तो मुख्यमंत्री को यहां तक कहा कि आप जिस रास्ते पर जा रहे हैं वह मधु कोड़ा का रास्ता है और जो इस रास्ते पर जाता है वह वहीं पहुंचता है। मीडिया में तो इस बाबत महज 10 फीसदी ही बात आई है बाकी 90 फीसदी बात तो बाहर आई ही नहीं है। उन्हें इस बात की दिक्कत भी रही कि मैं मीडिया में क्यों चला जाता हूं।' बेशक अब उनके निशाने पर दास ही हैं।
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