बिजनेस स्टैंडर्ड - वित्तीय क्षेत्र में रेटिंग सुधारने का तिलिस्म
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वित्तीय क्षेत्र में रेटिंग सुधारने का तिलिस्म

टी टी राम मोहन /  December 23, 2019

रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड ऐंड पुअर्स (एसऐंडपी) ने भारत के लिए चेतावनी जारी कर दी है: सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि की हालत सुधारें या रेटिंग में कटौती के लिए तैयार रहें। मूडीज ने पहले ही भारतीय अर्थव्यवस्था के परिदृश्य को 'स्थिर' से बदलकर 'नकारात्मक' कर दिया है। एसऐंडपी ने वित्त वर्ष 2019-20 में वृद्धि के 5.1 फीसदी रहने का अनुमान लगाया है। मूडीज ने आर्थिक वृद्धि दर के इस साल 4.9 फीसदी रहने की बात कही है। महज दो साल पहले किसने सोचा होगा कि भारत की जीडीपी वृद्धि छह फीसदी से भी नीचे आ जाएगी?

संभावित डाउनग्रेड की चेतावनी देने के लिए रेटिंग एजेंसियों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। खबरों का प्रवाह काफी डरावना है। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) अक्टूबर में 3.8 फीसदी ऋणात्मक रहा था। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई नवंबर में एक साल पहले की तुलना में 5.5 फीसदी बढ़ गई। वर्ष 2019-20 में राजकोषीय घाटे का जीडीपी के 3.3 फीसदी रहने के बजट लक्ष्य से पार जाना तय ही है। वित्तीय क्षेत्र में तनाव बरकरार है। कर्ज लेने की दर काफी गिर चुकी है।

एजेंसियों ने अच्छे वक्त में भी भारत को रेटिंग देने के मामले में गलती की है। आर्थिक समीक्षा 2016-17 में कहा गया था कि भारत एसऐंडपी से मिली बीबीबी रेटिंग से बेहतर का हकदार है क्योंकि उस समय अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन काफी अच्छा था। एक देश की रेटिंग सेवा ऋण के मामले में उसकी क्षमता एवं उत्सुकता से संबंधित होनी चाहिए। भारत ने बीते वर्षों में अपनी कर्ज देनदारियों में चूक नहीं की है। इसका कर्ज एवं जीडीपी के बीच करीब 65 फीसदी का अनुपात ऊंचा लग सकता है। लेकिन इसे जीडीपी में बाह्य ऋण के अनुपात और इसकी वृद्धि दर के तारतम्य में ही देखा जाना चाहिए। क्या विदेशी लेनदारों को यह लगता है कि आज भारत पर अपनी कर्ज देनदारी पूरा नहीं कर पाने का खतरा मंडरा रहा है क्योंकि हमारी वृद्धि दर फिसल चुकी है? यह सुझाव हंसी के लायक ही लगता है।

यह ठीक है कि रेटिंग एजेंसियां कहीं नहीं जाने वाली हैं और रेटिंग में गिरावट हमेशा ही एक सिरदर्द होता है। ऐसे में भारत के लिए चुनौती यह है कि बढ़ी हुई वृद्धि दर दोबारा हासिल की जाए। घाटे के मौजूदा स्तर के हिसाब से देखें तो राजकोषीय राहत देना असंभव नजर आता है। सार्वजनिक इकाइयों (पीएसयू) की परिसंपत्तियों की त्वरित बिक्री कर राजस्व जुटाने की चर्चा चल रही है। लेकिन ऐसा कर पाना आसान नहीं है। रणनीतिक बिक्री में मूल्य-निर्धारण एवं बोली लगाने की कठिन प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। और वे विवाद से उस समय भी परे नहीं हैं। एयर इंडिया की बिक्री की एक कोशिश 2018 में नाकाम हो गई थी लेकिन अब भी इस दिशा में प्रयास जारी हैं।

मौद्रिक नीति समिति ने दिसंबर की समीक्षा में नीतिगत दरों में कटौती रोक दी है जिससे मौद्रिक सुगमता भी नहीं रह गई है। फिलहाल यह कोई बड़ा मसला नहीं है। यह अधिक अहम है कि अब तक नीतिगत दरों में हुई 135 आधार अंकों की कटौती का कितना हिस्सा नीचे तक पहुंचा है? जमाओं में अचलता असल में पारेषण को प्रभावित करने वाला कारक है। दूसरे कारक भी हो सकते हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक उधारी देने में हिचक सकते हैं क्योंकि कई बैंक न्यूनतम पूंजी जरूरत के करीब काम कर सकते हैं। तेरह सार्वजनिक बैंक विलय के व्यापक दौर से गुजर रहे हैं। इससे भी कर्ज आवंटन में कुछ सुस्ती आई है।

इस तरह अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने के लिए दो बड़े वृहद-आर्थिक उपकरण- राजकोषीय एवं मौद्रिक प्रोत्साहन कुंद हो चुके हैं। लिहाजा सरकार क्षेत्रवार स्तर पर मुद्दों का समाधान करने पर ध्यान देने के मामले में सही है। वित्तीय क्षेत्र में तनाव को दूर करना प्राथमिकता होनी चाहिए। बैंकिंग क्षेत्र में दो तरह की अच्छी खबरें हैं। पहली, एस्सार मित्तल का आर्सेलरमित्तल द्वारा अधिग्रहण हो रहा है और इससे बैंकों को 42,000 करोड़ रुपये मिलने वाले हैं। एस्सार स्टील को कर्ज देने वाले बैंक अपना बकाया मिलने पर किए गए ऋण प्रावधान को हटा सकते हैं। दूसरी, बैंकों को टाटा समूह, आईसीआईसीआई बैंक और वैश्विक निवेशकों के स्वामित्व वाली इकाई के हाथों प्रयागराज पावर जेनरेशन कंपनी की बिक्री से 6,000 करोड़ रुपये मिले हैं। एकमुश्त समाधान में ऋणदाताओं को इस सौदे में 52 फीसदी नुकसान झेलना था। यह विचित्र है कि इस सौदे का वित्तपोषण भारतीय स्टेट बैंक ने किया है जो खुद नुकसान उठाने वाले बैंकों में शामिल है। अगर बैंकर दिवालिया प्रक्रिया के बाहर बड़ी कर्जदार संपत्तियों के समाधान की कोशिश के लिए आखिर  साहस जुटा रहे हैं तो यह एक बड़ी खबर है। प्रधानमंत्री ने सही संकेत दे दिया है। उन्होंने कहा है कि बैंकरों के वैध कारोबारी निर्णयों पर सवाल नहीं उठाए जाएंगे।

किफायती एवं मध्यम आय वाली आवासीय परियोजनाओं को पूरा करने के लिए वैकल्पिक निवेश कोष (एआईएफ) सक्रिय हो चुका है। इस कोष के लिए करीब 10,000 करोड़ रुपये जुटाए गए हैं। एनबीएफसी की परिसंपत्तियां खरीदने के लिए बैंकों को आंशिक ऋण गारंटी देने की योजना भी शुरू हो चुकी है। सरकार ने करीब एक लाख करोड़ रुपये के बजट वाली इस योजना के मद में सरकार ने 7,657 करोड़ रुपये के प्रस्ताव स्वीकृत किए हैं। इस योजना के तहत उपलब्ध आंशिक ऋण गारंटी का दायरा बीबीबी रेटिंग वाले एनबीएफसी तक बढ़ा दिया है। पहले यह सुविधा केवल एए या उससे अधिक रेटिंग वाले एनबीएफसी के लिए ही उपलब्ध थी।

दोनों योजनाओं से राहत मिलनी चाहिए लेकिन एक स्तर तक ही ऐसा होगा। एआईएफ के लिए आवंटित राशि काफी कम है और इस योजना को लागू कर पाना भी आसान नहीं है। आंशिक ऋण गारंटी भी बैंकों को बाहर निकलकर एनबीएफसी की परिसंपत्तियां लेने के लिए नहीं उत्साहित करेगी। बैंक इस कर्ज के बड़े हिस्से को लेकर आशंकित होंगे क्योंकि वह असुरक्षित उपभोक्ता कर्ज हैं। रियल एस्टेट कर्जों में आवासीय परियोजनाओं के कर्ज, पट्टïा किराया छूट, वाणिज्यिक परिसर और डेवलपर वित्त का जोड़ है। बैंक पहले दो समूहों के प्रति रुचि दिखाएंगे लेकिन इन दोनों उत्पादों के लिए खासी मांग पहले से ही है। ऐसे में बैंकों को एनबीएफसी से ऋणग्रस्त परिसंपत्तियां खरीदने की जरूरत नहीं महसूस हो सकती है। आर्थिक वृद्धि की फिसलन मूलत: इस वजह से आई है कि एक बैंकिंग संकट के बाद एनबीएफसी संकट भी आ गया है। एनबीएफसी क्षेत्र को दोबारा अपने पैरों पर खड़ा करना एक लंबी कवायद होने जा रही है। इस सुस्ती को दूर करने के लिए ध्यान बैंकों पर होना चाहिए। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में समुचित पूंजी डालना, शीर्ष स्थानों पर त्वरित नियुक्तियां सुनिश्चित करना और दबावग्रस्त परिसंपत्तियों के समाधान के लिए प्रबंधन को सशक्त करना स्थिति को तेजी से ठीक करने के लिए बेहद जरूरी हैं।

(लेखक भारतीय प्रबंध संस्थान अहमदाबाद में प्रोफेसर हैं) 
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