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एनआरसी पर स्पष्टीकरण

संपादकीय /  December 23, 2019

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सप्ताहांत पर राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) को लेकर जो बातें कहीं उनसे देश की जनता में भ्रामक संदेश गया है। इस विषय पर तत्काल स्पष्टीकरण की आवश्यकता है। एनआरसी और हाल ही में पारित नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) को लेकर हो रहे देशव्यापी प्रदर्शन से परेशान मोदी ने दिल्ली में एक चुनावी सभा में तीन बातें कहीं। पहला, उन्होंने दावा किया कि असम को छोड़कर देश के अन्य हिस्सों में यानी देशव्यापी स्तर पर एनआरसी लागू करने को लेकर कैबिनेट में कभी चर्चा नहीं हुई। बीते पांच वर्ष में ऐसा कभी नहीं हुआ। 

दूसरी बात, उन्होंने कहा कि एनआरसी के लिए न तो कोई नियम जारी किए गए हैं और न उन पर संसद में चर्चा हुई है।तीसरा, प्रधानमंत्री ने कहा कि इसे अमल में लाने के लिए कोई डिटेंशन कैंप (नजरबंदी शिविर) नहीं बनाए गए हैं। परंतु इन तीनों मोर्चों पर मोदी की बात सच नहीं है। संसद का 20 नवंबर का रिकॉर्ड बताता है कि गृहमंत्री अमित शाह ने उच्च सदन में असम में समाप्त विवादास्पद एनआरसी प्रक्रिया के तर्ज पर देश भर में एनआरसी लागू करने का सरकार का इरादा जाहिर किया था। 

शाह दरअसल 1 मई के अपने ट्वीट को ही दोहरा रहे थे कि पहले सीएए और उसके बाद एनआरसी आएगा। उन्होंने कहा था कि देश से हर घुसपैठिये को बाहर निकाला जाएगा। मई में हुए लोकसभा चुनाव से पहले भी पार्टी के घोषणापत्र में एनआरसी का प्रमुखता से उल्लेख किया गया था। इसके अलावा यदि ऐसी कोई पहल नहीं की गई होती तो क्या भाजपा के अन्य बड़े नेताओं से जवाब तलब नहीं किया गया होता? रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 1 दिसंबर को इस संबंध में वक्तव्य दिया था। कर्नाटक जिसने अक्टूबर में कहा था कि वह एनआरसी लागू नहीं करेगा, उसके बारे में जानकारी है कि वहां मार्च 2020 से यह कवायद शुरू करने की चर्चा हुई है। मोदी का यह कहना भी भ्रामक है कि मामला न तो संसद में आया है और न ही नियम बने हैं। 

एनआरसी को संसद में लाने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि संबंधित कानून 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में पारित हो गया था और विभिन्न राज्यों में राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर में नामांकन के रूप में प्रक्रिया शुरू भी हो गई थी। जहां तक डिटेंशन सेंटर की बात है तो गुवाहाटी, नवी मुंबई, बेंगलूरु और पश्चिम बंगाल में दो स्थानों पर इसके निर्माण के लिए जगह चिह्नित कर ली गई है।

सच्चाई और वक्तव्य में इतनी विसंगति से आम जनता की चिंता दूर होने वाली नहीं है। यह संभव है कि मोदी ने भाजपा के सहयोगियों समेत व्यापक विरोध से निकले संदेश को समझ लिया हो और उन्हें लगा हो कि जनता का मिजाज ठीक से समझ नहीं पाए। भारी बहुमत पाने के बाद अक्सर नेताओं से ऐसी चूक हो जाती है। चूंकि वह सार्वजनिक रूप से गलती स्वीकार नहीं करेंगे इसलिए संभव है रैली में उनका वक्तव्य इस बात का संकेत हो कि फिलहाल के लिए एनआरसी को टाल दिया गया हो। यदि ऐसा है तो लाखों नागरिकों को अनिश्चितता में धकेलने के बजाय इस विषय में स्पष्ट वक्तव्य जारी किया जाना चाहिए। यकीनन पांच वर्ष तक बहुसंख्यकवादी बातों को दोहराने के बाद प्रधानमंत्री के मुंह से यह सुनना वाकई अच्छा लगा कि अनेकता में एकता भारत की विशेषता है। यदि वह देश के इस बुनियादी मूल्य पर अमल करने का निर्णय करें तो और भी बेहतर होगा।
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