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देश के 10 प्रमुख कानून जिन्होंने बदले कारोबार के तरीके

बीएस संवाददाता /  December 22, 2019

ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता, 2016

शानदार परिणाम 

इस संहिता को दबाग्रस्त परिसंपत्तियों के दुष्प्रभाव से त्रस्त आर्थिक प्रणाली को दुरुस्त करने के लिए सरकार का सबसे सफल प्रयास माना गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि दिवालिया कानून की पिछले तीन साल की विकास यात्रा में 2019 को एक महत्त्वपूर्ण वर्ष है।

साइरिल अमरचंद मंगलदास के पार्टनर एल विश्वनाथन ने कहा, 'साल के आरंभ में सर्वोच्च न्यायालय ने स्विस रिबन्स मामले में आईबीसी की संवैधानिकता को बरकरार रखा। साल के दौरान कई ऐसे न्यायिक फैसले दिखे जिसमें लेनदारों के बीच वितरण की रूपरेखा तैयार करने के लिए विधायी दखल की जरूरत थी। अंतत: उस पर विचार किया गया और एस्सार स्टील मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया।' साथ ही सरकार ने कॉरपोरेट ऋणदाताओं के गारंटर के लिए व्यक्तिगत दिवालिया कानून लागू करने और वित्तीय सेवा प्रदाताओं के समाधान के लिए एक रूपरेखा तैयार की। फाइनैंस ऐक्ट के तहत आरबीआई के नेतृत्व में एनबीएफसी के पुरर्गठन की रूपरेखा तैयार की गई और आवास वित्त कंपनियों को केंद्रीय बैंक के नियामकीय ढांचे के दायरे में लाया गया।

विश्वनाथन ने कहा, 'दबावग्रस्त परिसंपत्तियों के समाधान में लेनदारों के प्रयासों को इन उपायों से काफी बल मिला। साल के दौरान बैंकों ने आईबीसी और आईबीसी के बाहर सफल समाधान के जरिये उल्लेखनीय परिणाम हासिल किए।'

आधार अधिनियम 2016

सवाल अब भी बरकरार

इस कानून ने डिजिटल पहचान का माहौल रातोंरात तैयार किया और आधार को एक घरेलू नाम बना दिया। कंपनियां भी अपने मौजूदा एवं नए ग्राहकों की पहचान के लिए आधार का इस्तेमाल करने लगीं। हालांकि देश में डेटा गोपनीयता कानून के अभाव में अदालतों में पहचान का प्रमाण और उपयोगकर्ता के लिए डेटा सुरक्षा की स्वीकार्यता पर सवाल उठाए गए। 

  एसएफएलसी डॉट इन की संस्थापक एवं प्रौद्योगिकी वकील मिशी चौधरी के अनुसार, आधार अपनी कुशलताओं- सार्वजनिक सेवाओं, भुगतान, उधारी एवं स्वास्थ्य सेवा में दमदार, तेज एवं बिना खर्च के पहचान सत्यापन- के कारण बेशक सबसे गरीब नागरिकों को सबसे अधिक फायदा देता है। हालांकि कुछ लोगों का कहना है कि आधार की मार्केटिंग एक घटिया प्रयास है।

केंद्रीय जीएसटी कानून, 2017

अभी छंटे नहीं धूल के बादल 

इस कानून के जरिये विनिर्माताओं और व्यापारियों के लिए केंद्र एवं राज्यस्तरीय विभिन्न करों को एकीकृत किया गया है। उत्पादों के लिए देश भर में कर की एक समान दरें होने से आपूर्ति शृंखलाओं की कुशलता बढ़ी है और मूल्य निर्धारण आसान हुआ है। डेलॉयट इंडिया के पार्टनर एमएस मणि ने कहा, 'जीएसटी को लागू करने से पहले उम्मीद की गई थी कि पूर्ववर्ती अप्रत्यक्ष करों के मुकाबले जीएसटी की दरें कम होने से महंगाई दर को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।' जीएसटी परिषद की कई बैठकों में सहकारी संघवाद के फायदे पर चर्चा हुई है। हालांकि बैंक, बीमा और सॉफ्टवेयर कंपनी जैसे सेवा प्रदाताओं के लिए अनुपालन में सख्ती की आलोचना हुई है। 

एनजीटी ऐक्ट, 2010

अब तक सबकुछ अच्छा

नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ऐक्ट, 2010 के तहत पर्यावरण से संबंधित प्रमुख मुद्दों के प्रभावी समाधान के लिए एक समर्पित ट्रिब्यूनल की स्थापना की गई है जिसमें विशेषज्ञ एवं न्यायिक दोनों तरह सदस्य शामिल हैं। इसके तहत पहली बार प्रदूषण फैलाने वालों पर भारी जुर्माना लगाया और प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों के निदेशकों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरू करने करने के लिए वैधानिक अधिकारियों से कहा गया ताकि पर्यावरण संबंधी मानदंडों का अनुपालन सुनिश्चित हो सके।

खेतान ऐंड कंपनी के पार्टनर नवनीत विभव ने कहा, 'हालांकि एनजीटी कानून का उल्लंघन करने वालों के बीच डर पैदा करने में सफल रहा है लेकिन कुछ अवसरों पर यह लडख़ड़ा गया। इस प्रकार इसने उल्लंघन की प्रकृति और पर्यावरण को हुए वास्तविक नुकसान के मुकाबले अधिक जुर्माना लगाकर कारोबारियों के बीच असंतोष पैदा कर दिया।' विशेषज्ञों का कहना है कि लगभग एक दशक के दौरान एनजीटी को नाकामी के मुकाबले कहीं अधिक सफलता मिली है। 

सेबी टेकओवर रेग्यूलेशंस, 2011

विश्वस्तरीय कानून

विशेषज्ञों का मानना है कि सेबी अधिग्रहण संहिता अपने मौजूदा स्वरूप में सार्वजनिक विलय एवं अधिग्रहण को प्रशासित करने वाली किसी भी विदेशी संहिता के अनुरूप है। कानून फर्म एमवी किनी की पार्टनर (कॉरपोरेट एवं पूंजी बाजार) विदिशा कृष्णन ने कहा, 'यह संहिता काफी स्पष्टï और तकनीकी कानून है जो समय-सीमा और प्रक्रियाओं में छेड़छाड़ की अनुमति नहीं देता है। सुस्त अधिग्रहण और खुली पेशकश के लिए नुकसान में वृद्धि के अलावा इसमें नुकसान एवं उल्लंघन के आकलन के तरीके में अधिक उथल-पुथल नहीं दिखा है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इसमें मुख्य तौर पर व्याख्या के उस क्षेत्र को नियंत्रित करने की जरूरत है जहां कुछ बहस हो रही है। कृष्णन ने कहा, 'सकारात्मक वोटिंग अधिकार, वीटो, सुरक्षात्मक अधिकार और खुली पेशकश को नजरअंदाज करने जैसे मामलों में हम अभी भी बोर्ड के ढांचे और व्यवस्था से बंधे हैं।'

कंपनी कानून, 2013

प्रशासन को दम

कंपनी कानून 2013 के कारण उद्योग जगत के प्रशासन मानदंडों और खुलासा प्रावधानों में सुधार हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कानून सुनिश्चित करता है कि लघु, सार्वजनिक एवं निजी भागीदारी वाली कंपनियों के कामकाज अनावश्यक अनुपालन बोझ से प्रभावित नहीं होंगे। मुंबई के एक कंपनी सचिव नागेश रुद्रकंठवार ने कहा, 'इसमें कई प्रावधानों में शेयरधारकों की मंजूरियों के साथ नियामकीय मंजूरियों को बदलते हुए स्व-प्रशासन के महत्व पर जोर दिया गया है।'

इस कानून के मूल अवतार में कई अपराधों और अनुपालन में चूक को अपराध की श्रेणी में रखा गया था। लेकिन तमाम संशोधन के जरिये धीरे-धीरे उसमें सुधार किया। विशेषज्ञों ने कहा कि कंपनी कानून 2013 के तहत अभी भी कई ऐसे प्रावधान हैं जिनमें संशोधन की जरूरत है। इन प्रावधानों में महत्त्वपूर्ण लाभकारी स्वामित्व, सीएसआर और प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों के शेयरों को डीमैट फॉर्म में अनिवार्य तौर पर लाना आदि। 

भूमि अधिग्रहण कानून, 2013

राह नहीं आसान

विशेषज्ञों का कहना है कि भूमि अधिग्रहण कानून ने भूस्वामी की सहमति और सामाजिक प्रभाव आकलन जैसे विभिन्न प्रावधानों के जरिये अधिग्रहण अधिकारियों और प्रभावित लोगों के बीच लंबे समय से चली आ रही विषमताओं को दूर किया। इसने भूमि अधिग्रहण में पारदर्शिता, निष्पक्षता और सीमित जवाबदेही सुनिश्चित की है। ट्राईलीगल के पार्टनर राहुल अरोड़ा ने कहा, 'हालांकि भारत में भूमि अधिग्रहण हमेशा से एक विवादित मुद्दा रहा है क्योंकि इसमें विभिन्न हितधारक शामिल होते हैं। इस कानून के लागू होने के छह साल बाद भी तमाम मुद्दे अब भी बरकरार हैं।'

विशेषज्ञों का कहना है कि इस कानून में न केवल कार्यान्वयन संबंधी खामियां हैं बल्कि अधिग्रहण के विभिन्न चरणों, मुआवजे का भुगतान और राहत एवं पुनर्वास से संबंधित विभिन्न संस्थानों का उद्देश्य भी गलत दिखता है। अरोड़ा ने कहा, 'कुछ सफल मामलों को छोड़कर भारत के भूमि अधिग्रहण परिदृश्य में कुछ खास बदलाव नहीं हुआ है।' 

वाणिज्यिक अदालत अधिनियम, 2015

आधी-अधूरी सफलता

विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी के सीनियर रेजिडेंट फेलो आलोक प्रसन्न कुमार ने कहा कि वाणिज्यिक अदालत अधिनियम 2015 का सबसे अधिक सकारात्मक प्रभाव यह रहा कि इसने वादियों और अदालतों को समय-सीमा को गंभीरता से लेना सिखा दिया।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस कानून के आने से अदालतों में मामलों को निपटाने की रफ्तार बढ़ी है। कुमार ने कहा, 'राज्य सरकारों ने अपने राज्यों में वाणिज्यिक अदालतों की स्थापना में उत्साह दिखाया है। जबकि शुरू में माना जा रहा था कि दिल्ली और मुंबई के बाहर कुछ ही मामलों को इससे फायदा होगा।'

हालांकि न्यायिक सीमा को 1 करोड़ रुपये से घटाकर 3 लाख रुपये किए जाने से यह कानून कमजोर हुआ है। कुमार ने कहा, 'किसी भी वाणिज्यिक मामलों को शामिल करते हुए अदालतों पर अत्यधिक बोझ डालने से भारत की कारोबारी सुगमता रैंकिंग में सुधार तो हुआ है लेकिन इससे वाणिज्यिक अदालतों का उद्देश्य धूमिल हो रहा है।'

काला धन अधिनियम, 2015

मामूली सफलता

सरकार ने कर चोरी पर लगाम लगाने के उद्देश्य से यह कानून बनाया था। कर सलाहकार फर्म नगीना एंडर्सन के निदेशक संदीप झुनझुनवाला ने कहा, 'कालेधन के खिलाफ जंग में एक महत्त्वपूर्ण सफलता इस कानून को पिछली तारीख से लागू करने के मामले में सर्वोच्च न्यायालय की मुहर और इस कानून के दायरे में प्रवासी भारतियों को शामिल करना रहा है।' विशेषज्ञों ने कहा कि इस कानून से विदेश भाग चुके हाई-प्रोफाइल कर चोरों की बेनामी परिसंपत्तियों की वसूली में मदद मिलेगी। हालांकि इस कानून के लागू होने के बाद अब तक जब्त की गई बेनामी परिसंपत्तियों का आंकड़ा काफी कमजोर रहा है। 

औद्योगिक संबंध संहिता, 2019

थोड़ी राहत मिली

विशेषज्ञों का कहना है कि इस संहिता में कुछ नई अवधारणाएं शामिल की गई हैं जैसे छंटनी के शिकार कर्मचारियों के प्रशिक्षण के लिए 'री-स्कीलिंग फंड' की स्थापना, लेकिन यह सरलीकरण से अधिक सुदृढीकरण का कानून दिखता है। इस संहिता के तहत बेवजह हड़ताल के खिलाफ कर्मचारियों को थोड़ी राहत दी गई है।

अवित्रा लीगल के संस्थापक पार्टनर, रौनक सिंह ने कहा कि अब हड़ताल के लिए 75 फीसदी श्रमिकों का समर्थन आवश्यक होगा और 14 दिन पहले उसकी सूचना देनी होगी। विशेषज्ञों का कहना है कि कर्मचारियों की छंटनी के मामलों में सरकार से मंजूरी आदि का प्रावधान विनिर्माण क्षेत्र में नियोक्ताओं की प्रमुख चुनौतियां रही हैं। सिंह ने कहा कि यह संहिता समस्या को निपटाने में विफल रही क्योंकि इसमें 100 श्रमिकों की सीमा को बरकरार रखी गई है। हालांकि सरकार उस सीमा में बदलाव कर सकती है।

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