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तेल व गैस उत्पादन के महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य की राह में पर्यावरण का रोड़ा

शाइन जैकब / नई दिल्ली 12 22, 2019

तेल व गैस का घरेलू उत्पादन बढ़ाने के भारत के महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य की राह में पर्यावरण का व्यवधान आ गया है। डिस्कवर्ड स्माल फील्ड (डीएसएफ 1 और 2) और ओपन एकरेज लाइसेंसिंग पॉलिसी के तहत आने वाली कुछ संपत्तियों को पर्यावरण, वन और वन्य जीव विभाग से मंजूरियां लेने में कठिनाई आ रही है। सूत्रों के मुताबिक डीएसएफ-1 के तहत ब्लॉक हासिल करने वाली कुछ कंपनियां अपने ब्लॉक छोड़ देने पर भी विचार कर रही हैं। इसकी वजह यह है कि उनके पास उत्पादन शुरू करने के लिए महज 3 महीने हैं। किसी भी डीएसएफ ब्लॉक से वाणिज्यिक उत्पादन शुरू नहीं हुआ है और उनमें से बड़ी संख्या में ब्लॉकों में अभी शुरु आती काम भी रुका हुआ है। कुछ और समय की मांग को लेकर आवेदन कर सकते हैं। 

ऑयल इंडिया और अनिल अग्रवाल की वेदांता सहित कुछ कंपनियों के पूर्वोत्तर में स्थित ब्लॉक वन और वन्य जीव विभाग से मंजूरियां न हासिल होने के कारण अटके हैं। तेल व गैस संपत्तियों को मंजूरी दिलाने के मसले को गति देने के लिए कैबिनेट सचिव के नेतृत्व में कठित समिति सीधे निगरानी कर रही है, इसके बावजूद यह हाल है। तेल मंत्रालय और पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के बीच मतभेद का एक बड़ा मसला यह है कि क्या अन्वेषण को खनन की तरह माना जाएगा। 

हाइड्रोकार्बन महानिदेशालय ने पहले ही इस सिलसिले में पर्यावरण मंत्रालय को पत्र लिखकर कहा है कि अन्वेषण एवं खनन पर अलग-अलग गतिविधियों के रूप में विचार किया जाना चाहिए। एक अन्वेषण कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'प्रमुख मसला यह है कि पर्यावरण अधिसूचना 2006 में तेल एवं गैस को औद्योगिक परियोजना माना गया है, वहीं उसी मंत्रालय का वन एवं वन्यजीव विभाग तेल एवं गैस को ओपन कास्ट माइनिंग इंडस्ट्री मानता है। इस वजह से बहुत कठिनाई आ रही है और अनावश्यक देरी हो रही है।' 

कंपनियों के मुताबिक सरकार के भीतर खनिजों की सामान्य खनन प्रक्रिया और मिनरल ऑयल (कच्चा तेल व प्राकृतिक गैस) के लिए कुओं की हाइटेक ड्रिलिंग गतिविधियों को लेकर कोई स्पष्ट समझ नहीं है। कोयला और लौह अयस्क जैसे जिंसों का खनन ज्यादातर ओपन कास्ट एक्टिविटी है, जिसमें लंबे समय से वायु, जल एवं ध्वनि प्रदूषण हो रहा है। वहीं तेल एवं प्राकृतिक गैस के लिए ऑनशोर कुओं की खुदाई इससे पूरी तरह से अलग है। अधिकारी ने कहा, 'कुएं की खुदाई सीधे पाइप घुसाने के लिए होती है, जो संसाधन तक गहराई में जाती है। इससे कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस अपने प्राकृतिक रूप से बाहर आता है। उसके बाद कच्चे तेल या प्राकृतिक गैस को क्लोज सर्फेस पाइपलाइन के माध्यम से दूसरी जगह ले जाया जाता है। इसका पर्यावरण पर मामूली प्रभाव होता है।' 

डीएसएफ में बोली लगाकर ब्लॉक हासिल करने वालों में से तमाम समय विस्तार या ब्लॉक छोडऩे के लिए आवेदन पर विचार कर रहे हैं, जिनके ब्लॉक पर्यावरण व वन मंजूरी की वजह से अटके हैं। डीएसएफ-1 में शामिल एकमात्र विदेशी कंपनी साउथ एशिया कंसल्टेंसी एफजेडई के प्रबंध निदेशक डीएस राजपूत ने कहा, 'मेरे ब्लॉक को पहले ही पर्यावरण मंजूरी मिली हुई है, जो ओएनजीसी ने लिया था। बाद में इसे 4 ब्लॉकों में बांट दिया गया और अलग अलग कारोबारियोंं को आवंटित कर दिया गया। पर्यावरण नीतियां ऐसी हैं, जिसकी वजह से उस ब्लॉक के लिए फिर से पर्यावरण मंजूरी लेने को बाध्य होना पड़ रहा है। इसकी वजह से अन्वेषण कार्य अटका हुआ है।' 

उन्होंने कहा कि हाइड्रोकार्बन महानिदेशालय की शुरुआती अंतिम तिथि में 3 महीने बचे हैं, वहीं कंपनी अब तक परिचालन शुरू करने में सक्षम नहीं है, जबकि सहमति पत्र में ऐसा करने की अनुमति है। बहरहाल पर्यावरणविद उद्योगों की राय से सहमत नहीं हैं। रांची के बिसरा माइंस ऐंड मिनरल्स मॉनिटरिंग सेंटर के निदेशक जेवियर दियास ने कहा, 'यह सरकार और कंपनियों की रणनीति है कि वे पर्यावरण कार्यकर्ताओं पर आरोप लगाते हैं, जब काम नहीं हो पाता। इसके अलावा पेट्रोलियम और खनन का श्रेणीकरण मायने नहीं रखता क्योंकि प्रदूषण को वन्यजीव या जंगल के लिए कम या ज्यादा खतरनाक के रूप में नहीं श्रेणीकृत किया जा सकता।' 

Keyword: oil, gas, ONGC,,
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