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सेबी के नए नियम से पीएमएस योजनाओं का बदला गणित

संजय कुमार सिंह /  December 22, 2019

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने हाल में ही पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेस (पीएमएस) में न्यूतनम निवेश सीमा 25 लाख रुपये से बढ़ाकर 50 लाख रुपये कर दी है। सेबी के इस कदम के बाद अब कुछ ही लोग निवेश के इस साधन की ओर रुख कर पाएंगे। पिछले कुछ वर्षों में पीएमएस में प्रबंधनाधीन परिसंपत्ति (एयूएम) और ग्राहकों की संख्या दोनों लिहाज से तेजी आई है। अब जरा यह समझने की कोशिश करते हैं कि सेबी के इस कदम का क्या असर हो सकता है। इसके साथ ही हम उन निवेश साधनों पर भी विचार करेंगे, जिन पर 50 लाख रुपये न्यूनतम निवेश सीमा की शर्त पूरी नहीं करने वाले निवेशक दांव लगा सकते हैं।  

निवेशकों की सुरक्षा

म्युचुअल फंडों के मुकाबले पीएमएस थोड़े जोखिम भरे होते हैं। म्युचुअल फंडों में निवेशकों की सुरक्षा के लिए सेबी ने कई उपाय कर रखे हैं। एमएफ पोर्टफोलियो में विविधता रखनी जरूरी है और किसी खास शेयर में निवेश की एक सीमा तय होती है। पीएमएस में किसी एक शेयर, क्षेत्र में निवेश के संबंध में सीमा निश्चित नहीं की गई है। पीएमएस संबंधित सूचना मुहैया करने वाली वेबसाइट पीएमएसबाजार डॉट कॉम के संस्थापक-निदेशक पल्लवराजन आर कहते हैं,'पीएमएस में थोड़ी आजादी से पोर्टफोलियो मैनेजर को अधिक प्रतिफल हासिल करने में मदद जरूर मिलती है, लेकिन इससे अनिश्चितता और जोखिम भी बढ़ जाते हैं।'

म्युचुअल फंड पोर्टफोलियो में विविधता होती है। अमूमन 90 प्रतिशत से अधिक इक्विटी फंडों के पोर्टफोलियो में 50-60 या इनसे अधिक शेयर होते हैं। इससे जोखिम अपेक्षाकृत कम हो जाता है। पीएमएस में पोर्टफोलियो में शेयरों की संख्या 7 या 8 से लेकर 25 तक हो सकती है। ज्यादातर पीएमएस प्रबंधक औसतन 15-20 शेयरों के साथ पोर्टफोलियो तैयार करते हैं। शेयरों की संख्या कम रहने से जोखिम बढ़ जाता है और अनिश्चितता भी अधिक हो जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि सेबी ने पीएमएस में न्यूनतम निवेश सीमा इसलिए बढ़ाई है क्योंकि जोखिम की समझ रखने वाले लोग और वित्तीय उतार-चढ़ाव झेलने वाले लोग ही इसमें निवेश कर सकें।  

कम ग्राहक, अधिक समझ

इस समय कुल 1,45,000 पीएमएस निवेशक है। पल्लवराजन का कहना है कि उन्हें ऐसी उम्मीद थी कि अगले साढ़े तीन वर्षों में अतिरिक्त 1,50,000 निवेशक जुड़ेंगे, लेकिन अब यह आंकड़ा कम होकर 75,000 से 1,00,000 तक रह सकता है। सेबी ने पीएमएस प्रबंधकों के लिए भी शुद्ध परिसंपत्ति की शर्त भी 2 करोड़ रुपये से बढ़ा कर 5 करोड़ रुपये कर दी है। इस वजह से पीएमएस प्रबंधकों की संख्या भी मौजूदा करीब 320 से कम हो सकती है। यहां भी सेबी का मकसद केवल गंभीर प्रबंधकों को ही इस कारोबार में आने देना है। न्यूनतम निवेश सीमा 20 लाख से 50 लाख रुपये करने का पहला नतीजा यह होगा कि जो निवेशक बच जाएंगे उनकी अपने पोर्टफोलियो प्रबंधकों तक पहुंच बढ़ जाएगी। प्रबंधकों के साथ बेहतर संवाद से निवेशकों को समझने में मदद मिलेगी कि पोर्टफोलियो प्रबंधक ने क्यों कुछ खास शेयर खरीदे हैं या फिर फंड का प्रदर्शन किस वजह से फिलहाल कमजोर चल रहा है। इन सभी बातों से निवेशक अपने पोर्टफोलियो प्रबंधकों के साथ जुड़े रहेंगे और लंबे समय तक निवेश बनाए रखेंगे।  

कम विविधता

हालांकि सेबी की इस पहल का एक नकारात्मक असर यह होगा कि इससे विविधता की गुंजाइश कम हो जाएगी। उदाहरण के लिए जिस निवेशक के पास पहले पीएमएस में निवेश करने के लिए 1 करोड़ रुपये थे, वह केवल दो शेयरों में निवेश कर पाएगा। चूंकि, पीएमएस में निवेशकों की संख्या कम रहती है, इसलिए विविधता का पहलू अहम हो जाता है। यानी सेबी के कदम से विविधता लाने की बहुत अधिक गुंजाइश नहीं बचेगी। ऐसे लोगों को ही अब पीएमएस में निवेश करने के बारे में सोचना चाहिए, जिनका कुल पोर्टफोलियो कम से कम 4 से 5 करोड़ रुपये है। इनमें अगर उनका शेयरों में आवंटन 2 से 3 करोड़ रुपये है तो वे तीन से चार पीएमस योजनाओं में निवेश कर सकते हैं। केवल पीएमएस में निवेश करने से बचना चाहिए।  

दूसरे भी विकल्प

कई निवेशकों ने म्युचुअल फंडों में भारी निवेश कर रखा है। वे ऐसी योजनाओं में निवेश करना चाहते हैं, जो उन्हें अधिक प्रतिफल दे सकती हैं। कई ऐसे निवेशक भी हैं, जिन्होंने शेयरों में बड़े दांव लगाए हैं, लेकिन समय या समझदारी के अभाव में उनका प्रबंधन ठीक ढंग से नहीं कर पा रहे हैं। ये दोनों तरह के निवेशक पहले पीएमएस का रुख करते थे, लेकिन अब पीएमएस का विकल्प चुनना आसान नहीं हो सकता है। अब वे दो विकल्पों पर विचार कर सकते हैं: तैयार शेयर पोर्टफोलियो (स्मॉलकेस)और दूसरा सेबी-पंजीकृत निवेश सलाहकार, जो शेयर से जुड़ी सलाह देते हैं। 

पहले से तैयार पोर्टफोलियो 

स्मॉलकेस से मतलब शेयर या एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) के तैयार पोर्टफोलियो से है। ऐसे पोर्टफोलियो में अधिक विविधता होती है और इस वजह से इनके साथ जोखिम भी कम होता है। ब्रोकरेज कंपनियां अपने ग्राहकों को एक शेयर के बजाय अधिक शेयरों वाले पोर्टफोलियो की पेशकश कर (जैसा कि उन्होंने परंपरागत रूप से किया है) सकती हैं। 

एचडीएफसी, कोटक और कई अन्य ऐसे योजनाओं की पेशकश कर सकते हैं। फिलहाल 70 से अधिक स्मॉलकेस उपलब्ध हैं, जो नए निवेशकों से लेकर पुराने निवेशकों तक की जरूरतें पूरी कर सकते हैं। ये स्मॉलकेस निवेशकों के जोखिम लेने की कुव्वत के हिसाब से अलग-अलग होते हैं। कुछ उन निवेशकों के लिए फायदेमंद होते हैं, जो हाल में ही बाजार में उतरे हैं, जबकि कुछ ऐसे निवेशकों के लिए हैं, जो अधिक प्रतिफल पाने के लिए जोखिम लेने के लिए तैयार हैं। एक दूसरा लाभ लागत से जुड़ा है। नियमित म्युचुअल फंडों का एक्सपेंस रेशियो 1.5-2.0 प्रतिशत होता है, जबकि यहां आपको संबंधित शेयरों की बिक्री या खरीदारी के लिए ब्रोकरेज शुल्क अदा करना होगा।  

सेबी आरआईए
कई सेबी आरआईए और शोध विश्लेषक स्वतंत्र शेयर शोध इकाइयों के तौर पर परिचालन करते हैं, जो सूचीबद्ध कंपनियों पर शोध रिपोर्ट प्रकाशित करती हैं। ये रिपोर्ट ब्रोकरेज रिपोर्ट से अलग होती हैं, क्योंकि इनमें किसी तरह के बदलाव (छेड़-छाड़) के लिए कोई फायदा नहीं दिया जाता है। यही वजह हैं कि इन इकाइयों को 'स्वतंत्र इक्विटी शोध' का दर्जा दिया गया है। आम तौर पर ऐसी शोध सेवाएं एक निश्चित सालाना शुल्क के एवज में मिल जाती हैं और पोर्टफोलियो के आकार से इनका कोई मतलब नहीं होता है। सलाहकार अपने ग्राहक की तरफ से सौदा नहीं करते हैं, इसलिए उन्हें पोर्टफोलियो के आकार के बारे में मालूम नहीं होता है। लिहाजा पूंजी के एक प्रतिशत के रूप में शुल्क लेने के बजाय वह एकएकमुश्त रकम के बदले अपनी पूरी शोध रिपोर्ट मुहैया करा देता है। ये ऐसे निवेशकों के लिए हैं, जो स्वयं अपने स्तर पर मुस्तैद रहकर अपनी पूंजी पर पूरा नियंत्रण रखना चाहते हैं। 
स्टालवार्ट एडवाइजर्स के संस्थापक एवं मुख्य कार्याधिकारी जतिन खेमानी कहते हैं, 'म्युचुअल या पीएमएस में आपको चेक जारी करना या फंड प्रबंधक को विशेष अधिकार (पावर ऑफ अटॉर्नी) देना पड़ता है, लेकिन इस मामले में पूरी रकम आपके मौजूदा ब्रोकिंग खाते में आपके नाम से और आपके अधीन ही रहती है। सलाहकार केवल शेयर खरीदने, इनकी संख्या और इसे बेचने से जुड़ी सलाह देते हैं। इसका एक खमियाजा यह है कि सलाह समझने और इस पर अमल करने में अधिक समय लगता है, जबकि म्युचुअल फंड या पीएमएस निवेश में अप्रत्यक्ष रूप में यह होता है।' कुछ निवेशक पूरा सलाह के अनुसार भारांश देखकर पोर्टफोलियो तैयार करते हैं, जबकि कुछ लोग अपनी पसंद के अनुसार शेयरों का चयन करते हैं। 
खेमानी का मानना है कि किसी व्यक्ति को सलाह शुल्क के रूप में 2 प्रतिशत से अधिक भुगतान नहीं करना चाहिए। अगर आप 20,000 रुपये सालाना रकम वाला पोर्टफोलियो खरीद रहे हैं तो आपको पास कम से कम 10 लाख रुपये निवेश करने के लिए होना चाहिए। जैसे-जैसे कोष का आकार बढ़ेगा और आप रकम लगाते जाएंगे वैसे ही कोष के प्रतिशत के तौर पर खर्च कम होता जाएगा। अपेक्षाकृत छोटे पोर्टफोलियो के लिए म्युचुअल फंड के जरिये निवेश किया जा सकता है। स्वयं अपने स्तर पर पोर्टफोलियो प्रबंधन में लगाने वाला समय, प्रयास और खर्च तभी सार्थक होता है जब पोर्टफोलियो का आकार एक निश्चित सीमा से अधिक  होता है। खेमानी के अनुसार पोर्टफोलियो का आकार कम से कम 10 लाख रुपये होना चाहिए। उन्हीं लोगों को आरआईए का रुख करना चाहिए जो सीधे तौर पर इसमें पूरी तरह लगे हैं। उन्हें न केवल विश्लेषक होना चाहिए, बल्कि निवेशक भी होना चाहिए, जिसने स्वयं उन शेयरों में निवेश किया है, जिनमें उसने अपने ग्राहकों को निवेश करने की सलाह दी है। सबसे पहले शेयर चयन, इसके पीछे तर्क, बाहर निकलने की वजह खंगाले और उसके बाद ही आरआईए का चयन करें। ज्यादातर सबस्क्रिप्शन आधारित शोध मॉडलों में गेस्ट अकाउंट ऑप्शन होता है, जिसके तहत कोई संभावित निवेशक मुफ्त में पंजीकृत होकर पिछले शेयरों का मूल्यांकन कर मौजूदा पोर्टफोलियो से शेयरों का चयन कर सकता है। 
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