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कोलकाता को जकड़ते पुराने शहर के रोग

नम्रता आचार्य / कोलकाता December 22, 2019

इस साल कोलकाता में त्योहारी मौसम उतने खुशनुमा तरीके से खत्म नहीं हुआ। छठ पूजा के अवसर पर हजारों श्रद्धालुओं ने राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) के आदेश का उल्लंघन करते हुए रवींद्र सरोवर झील के दरवाजों पर लगे ताले तोड़ डाले। इस बात पर श्रद्धालुओं की पर्यावरण प्रेमियों के साथ तीखी झड़प भी हो गई। एनजीटी ने दक्षिण कोलकाता में मौजूद इस झील में पूजा-पाठ करने पर रोक लगा रखी है। हरित पट्टी से सटी इस झील में पूजा-पाठ करने से फल-फूल की शक्ल में भारी कचरा पैदा होने की आशंका होती है।

झील को प्रदूषण से बचाने के लिए एनजीटी का जो आदेश लागू था, उसकी धज्जियां उड़ाने पर उतारू भीड़ को पुलिस भी नहीं रोक पाई। यह देखकर पर्यावरण प्रेमियों ने पश्चिम बंगाल सरकार को जमकर खरी-खोटी सुनाई। लेकिन उनकी चिंता की वजह केवल झील में होने वाला प्रदूषण ही नहीं था। 

भले ही पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली की छवि दुनिया की प्रदूषण राजधानी के तौर पर बनती जा रही है लेकिन कोलकाता की भी हालत कई दिन दिल्ली से कोई बेहतर नहीं होती है। कभी-कभी तो कोलकाता प्रदूषण स्तर के मामले में दिल्ली को भी पीछे छोड़ देता है। 

अगर पिछले महीने की ही बात करें तो कोलकाता के कई इलाकों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 400 के निशान को भी पार कर गया था। इसका मतलब है कि कोलकाता में वायु गुणवत्ता 'खतरनाक' स्तर के करीब थी, जबकि उसी समय दिल्ली में हवा 'बेहद खराब' से सुधरते हुए 'खराब' स्तर पर आ गई थी। कोलकाता में डीजल से चलने वाली गाडिय़ों की संख्या इतनी अधिक है कि इसे 'भारत की डीजल राजधानी' भी कह दिया जाता है। मोटे तौर पर अनुमान है कि इस शहर में दौडऩे वाली 80 फीसदी गाडिय़ां डीजल पर ही चलती हैं। इनमें पीली टैक्सियों का भारी-भरकम बेड़ा भी शामिल है। डीजल-चालित गाडिय़ों से निकलने वाले धुएं में हानिकारक कणों की संख्या काफी अधिक होती है।

सरकार ने प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए कुछ कदम उठाए भी हैं। मसलन, निर्माण स्थलों पर पानी का छिड़काव, 15 साल से पुरानी कारों को सड़कों से हटाना और सड़क के किनारे खानपान बिक्री केंद्रों पर कोयले की अंगीठी का इस्तेमाल प्रतिबंधित करना। पर्यावरणप्रेमियों की चिंता केवल प्रदूषण तक ही सीमित नहीं है बल्कि करीब 50 लाख लोगों के शहर के तौर पर कोलकाता के बरकरार रहने की फिक्र भी उन्हें है। एक तरफ कोलकाता के चरमराते बुनियादी ढांचे को फौरन मरम्मत की जरूरत है, दूसरी तरफ तटीय इलाके पर समुद्र के बढ़ते जलस्तर से खतरा मंडराने लगा है। पर्यावरण संरक्षण की कोशिश में जुटे संगठनों के मंच साबुज माछा के सचिव नभ दत्ता कहते हैं, 'पश्चिम बंगाल सरकार पर्यावरण से जुड़े मुद्दों के समाधान के लिए कुछ नहीं कर रही है। पार्क बनाने या पानी के छिड़काव से पर्यावरण की समस्याएं दूर नहीं होतीं।'

 

उनकी यह चिंता हाल की कई शोध रिपोर्टों से भी सही होती हुई दिखाई देती है। ये रिपोर्ट कोलकाता पर जलवायु परिवर्तन का खतरा मंडराने का दावा करती हैं। अमेरिका स्थित गैर-लाभकारी संगठन 'क्लाइमेट सेंट्रल' के वैज्ञानिकों ने एक हालिया अध्ययन में यह पाया है कि बढ़ते समुद्र स्तर से कोलकाता के कुछ तटीय इलाके वर्ष 2050 तक या तो पानी में डूब जाएंगे या फिर लगातार आने वाली बाढ़ से तबाह होते रहेंगे।

विश्व बैंक ने भी वर्ष 2011 में चेतावनी देती एक रिपोर्ट जारी की थी। उस रिपोर्ट ममें कहा गया था कि शहर के सबसे तेजी से विकसित होते हिस्से पूर्व कोलकाता पर जलवायु परिवर्तन से जुड़े दुष्प्रभाव सबसे ज्यादा नजर आएंगे। इसी इलाके में ईस्टर्न मेट्रोपॉलिटन बाईपास पर बेहद महंगी रियल एस्टेट परिसंपत्तियां भी हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक पूर्वी कोलकाता के नौ वार्डों पर सबसे ज्यादा खतरा मंडरा रहा है। रिपोर्ट कहती है कि कोलकाता नगर निगम के इलाकों में जलवायु परिवर्तन की वजह से आने वाली बाढ़ से होने वाला आर्थिक नुकसान वर्ष 2050 में बढ़कर 680 करोड़ डॉलर तक पहुंच जाएगा। विश्व बैंक ने कोलकाता की बिगड़ती स्थिति के लिए जिम्मेदार कारकों में जमीन के बेतरतीब इस्तेमाल, खराब सामाजिक-आर्थिक एवं पर्यावरणीय हालात और जर्जर होती ढांचागत सुविधाओं का जिक्र किया था। ढांचागत सुविधाओं की हालत खस्ता होने की गवाही राज्य सरकार की अपनी ऑडिट रिपोर्ट भी देती है। रिपोर्ट से यह पता चला कि शहर के सात फ्लाईओवरों को फौरन मरम्मत की जरूरत है। ईस्ट कोलकाता की नमी से भरपूर जमीन अपने आप में बेहद खास है। यह आद्र्र-भूमि प्राकृतिक होने के साथ-साथ मानव-निर्मित भी है। कोलकाता शहर से सटे करीब 125 वर्ग किलोमीटर इलाके में यह फैली हुई है। उनमें नमकीन दलदल, नमक के मैदान, सीवेज फार्म और तालाब शामिल हैं।

अपशिष्ट जल में मौजूद पोषक तत्व मछलीपालन फार्म और खेती में भी बचे रह जाते हैं। इसके अलावा जलाशयों में कार्बन की अच्छी-खासी मात्रा भी पाई जाती है। हालांकि गत तीन दशकों में रियल एस्टेट निर्माण बढऩे से बहुत कुछ बदल गया है। आज कई जलाशयों को निर्माण कार्यों की वजह से भरा जा चुका है जिससे आद्र्र-भूमि का इलाका करीब 70 फीसदी तक कम हो चुका है।

दत्ता कहते हैं, 'पूर्वी कोलकाता की नम भूमि में पानी का स्तर लगातार गिरता जा रहा है और इस पर फौरन ध्यान देने की जरूरत है। रियल एस्टेट गतिविधियों के चलते यहां मौजूद तालाबों की संख्या पहले ही 300 से घटकर करीब 200 पर सिमट चुकी है।' लेखिका एवं पर्यावरणविद जया मित्रा का मानना है कि कोलकाता सेहत के लिए बेहद खतरनाक पर्यावरण की ओर बढ़ रहा है। वह कहती हैं, 'मेट्रो या सड़क निर्माण जैसी ढांचागत परियोजनाओं के लिए इतने सारे पेड़ काटे जा रहे हैं। सड़कों पर गाडिय़ों की संख्या बढ़ रही है और  एयर कंडीशनरों का इस्तेमाल भी बढ़ रहा है।' कोलकाता के ढांचागत क्षेत्र की खामियां वर्ष 2016 में हुए भीषण हादसे में उजागर हो गई थीं। गिरीश पार्क इलाके में विवेकानंद रोड पर बन रहे फ्लाईओवर का एक हिस्सा गिर जाने से करीब 50 लोगों की मौत हो गई थी और 80 अन्य घायल हुए थे। पिछले साल भी माजेरहाट में एक पुल का 20 मीटर लंबा हिस्सा धंस गया था।

अभी हाल ही में ईस्ट-वेस्ट मेट्रो के निर्माण के दौरान उत्तरी कोलकाता की कई पुरानी इमारतों में दरारें पड़ गई थीं जिसके बाद सैकड़ों लोगों को जान बचाने के लिए घर छोड़कर जाना पड़ा। देश के दूसरे मेट्रो शहरों की तरह ढांचागत सुविधाओं की कमी और बढ़ते प्रदूषण की समस्या से कोलकाता भी दो-चार हो रहा है। लेकिन बढ़ता समुद्र स्तर कोलकाता के वजूद के लिए भी बड़ी चुनौती पेश करता हुआ नजर आ रहा है। अगर इन समस्याओं पर फौरन ध्यान नहीं दिया गया तो कोलकाता का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा।

Keyword: Kolkata, NGT, Old City, Greenery, Waste, Ravindra Sarovar Jheel,
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