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ढहते पुलों और उफनते समंदर का तमाशा बन गया मुंबई

अमृता पिल्लई /  December 22, 2019

करीब 90 साल के हो चुके पूर्व मुंबई पुलिस आयुक्त जूलियो रिबेरो शहर में कुछ ऐसा देख रहे हैं, जो पहले कभी नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि शहर में निर्माण कार्य युद्घस्तर पर जारी है और ऐसा पहली बार हो रहा है। उनका इशारा मेट्रो नेटवर्क के निर्माण की ओर है क्योंकि इस वक्त मायानगरी के ज्यादातर हिस्सों में 'कार्य प्रगति पर है' का बोर्ड नजर आ रहा है। मुंबई के कमजोर बुनियादी ढांचे की दिक्कत दूर करने के लिए बनाई जा रही 80,000 करोड़ रुपये की मेट्रो परियोजना असल में एक बड़ी योजना का हिस्सा है। मेट्रो के अलावा यहां समुद्र तट पर एक सड़क और नया हवाई अड्डïा बनाने की योजना भी है। इसके अलावा ट्रांस-हार्बर लिंक भी बनाया जाना है। रिबेरो कहते हैं, 'हमारी आंखें दिक्कत बढऩे के बाद ही खुलती हैं। मुश्किल आने से पहले हम उसके बारे में सोचते ही नहीं।' 

2011 तक मुंबई और इसके उपनगरीय जिले की आबादी करीब 1.2 करोड़ थी और इनमें से आधे लोग झुग्गी-झोपडिय़ों में रहते हैं। पश्चिम रेलवे की वेबसाइट के मुताबिक भारतीय रेल के जरिये यात्रा करने वाले 1.4 करोड़ लोगों में से 60 लाख से ज्यादा लोग रोजाना मुंबई लोकल पर ही सवार होते हैं। शहर का बुनियादी ढांचा मुंबई को मिले दर्जे पर खरा नहीं उतरता। इस साल मार्च में मुंबई के सबसे गहमागहमी भरे रेलवे स्टेशन छत्रपति शिवाजी टर्मिनल का फुटब्रिज ढह गया।

इस तरह के हादसों की वजह से ही अधिकारियों को शहर के कुछ पुलों को तोडऩा या बंद करना पड़ा। मुंबई का रेल नेटवर्क ही इस शहर की जीवनरेखा है, लेकिन 2018 में इसकी वजह से रोजाना औसतन 9 से ज्यादा लोग मारे गए। शहरी योजनाकार पेड्रो ऑर्टिज को लगता है कि शहर में बुनियादी ढांचे की दिक्कत रख-रखाव में कमी का नतीजा है। वह कहते हैं, 'नेताओं को फीता काटना पसंद है आसैर वे चाहते हैं कि उनकी तस्वीर अखबार में छपे, लेकिन वे ऐसे बुनियादी ढांचे के रख-रखाव पर पैसे खर्च करना नहीं चाहते हैं जहां उन्हें चर्चा हासिल नहीं हो सके।'

फिलहाल मेट्रो नेटवर्क के लिए कार शेड देने की योजना भी राजनीतिक युद्ध का केंद्र बन गई है। हाल ही में निर्वाचित शिवसेना के नेतृत्व वाली महा विकास अघाडी सरकार ने पर्यावरण की फिक्र का हवाला देकर कार शेड पर काम बंद कर दिया है। मुंबई में बुनियादी ढांचा सुधारने की यह दूसरी कोशिश है। इससे पहले 1970 के दशक में भी ऐसी ही कवायद की गई थी। 1940 और 1970 के बीच मुंबई के कई हिस्सों में जीर्णोद्घार का काम शुरू हुआ, लेकिन इससे मुंबई की परिवहन व्यवस्था पर बोझ बहुत बढ़ गया और शहर के दक्षिणी हिस्से में लोगों की आवाजाही भी खासी बढ़ गई। 1965 में मुंबई में रहने वाले एक सक्रिय कार्यकर्ता श्याम सक्सेना कहते हैं, 'सुधार के इन कार्यों के बाद यह महसूस हुआ कि मुंबई की स्थिति बेहद नाजुक है और उसी वक्त नवी मुंबई की परिकल्पना की गई।'

सक्सेना बताते हैं, 'नवी मुंबई में बड़े निवेश के बावजूद कोई वहां जाना नहीं चाहता था। वहां कोई सरकारी विभाग या मंत्रालय भी नहीं भेजा गया।' मुंबई के लिए नवी मुंबई असल में सैटेलाइट शहर है और यहां शहर का दूसरा हवाई अड्डïा बनने वाला है। दूसरे हवाई अड्डे और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की वजह से मुंबई के लिए अलग ही मुश्किल खड़ी हो गई है। अमेरिका के एक शोध संस्थान क्लाइमेट सेंट्रल ने अपने एक अध्ययन में कहा कि शहर साल 2050 तक जलमग्न हो सकता है। ऑर्टिज कहते हैं, 'इस बात को ध्यान में रखे बगैर ही फैसला लिया गया। नया हवाईअड्डïा समुद्र के अंदर ही होगा। मुंबई अपनी जमीन को संभालने में बुरी तरह नाकाम रहा है। ऐसे में आपको समुद्र पर ही सड़क बिछानी पड़ रही है।'

इन बाधाओं के बावजूद शहर के अधिकारी मुंबई को बेहतर बनाने के लिए लंबी योजना पर काम कर रहे हैं। शहर के नगर निगम आयुक्त प्रवीण परदेशी कहते हैं, 'हमारी विकास योजना में मैनग्रोव के संरक्षण को पूरा ध्यान देना है। हम यह सुनिश्चित करेंगे कि सभी मैनग्रोव क्षेत्र संरक्षित हैं और ये समुद्र तट को और बड़ा तथा चौड़ा नहीं होने देते।' मुंबई में पिछले दो दशक में बाढ़ की समस्या काफी बढ़ी है। मुंबई में जुलाई 2005 में सबसे भयंकर बाढ़ का सामना करना पड़ा, जिसमें सैकड़ों लोगों की जान चली गई और करीब 5,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। रिबेरो कहते हैं, 'जब मुंबई के बुनियादी ढांचे में पहली बार सुधार कार्य शुरू किया गया तब मैं युवा था और उस वक्त यह बात होती थी कि हम प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन हो रहा है और पिछले दो सालों में हमने इसका असर देखा है।' 

परदेशी कहते हैं कि तटीय क्षेत्र में सड़क योजना बढ़ते समुद्र स्तर के लिहाज से बेहद जरूरी है। विडंबना यह है कि पर्यावरणीय क्षति की चिंताओं और कानूनी लड़ाई की वजह से काम को रोका गया है।
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