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भ्रष्टाचार और सियासी तमाशे ने हिला दीं दिल्ली की चूलें

मेघा मनचंदा /  12 22, 2019

अनदेखी के मकड़जाल में कसमसाते शहर

बिजनेस स्टैंडर्ड भ्रष्टाचार और सियासी तमाशे ने हिला दीं दिल्ली की चूलेंरविवार को एक प्लास्टिक फैक्टरी में आग लगने से 43 लोगों की मौत हो गई। दिल्ली में यह पिछले दो दशक की सबसे भयानक दुर्घटना हो सकती है, लेकिन अंधाधुंध निर्माण, अवैध कॉलोनियों का नियमित होना तथा बिगड़ती आबोहवा इस शहर के लिए नई परेशानी बनती जा रही हैं। उत्तर पश्चिमी दिल्ली में रानी झांसी रोड की एक आवासीय कॉलोनी में चल रही वह फैक्टरी उन दर्जनों फैक्टरियों में शुमार थी, जिन्हें वहां होना ही नहीं चाहिए था। दिल्ली दुनिया के सबसे बेहतरीन मेट्रो नेटवर्क पर गर्व करती है और यहां का बुनियादी ढांचा भी लाजवाब है। लेकिन उसी दिल्ली के भीतर अवैध निर्माण महानगर की उसकी छवि पर धब्बा लगाता है।

डेलॉयट इंडिया के पार्टनर प्रणवंत का कहना है, 'इमारतों का नियमन करना ही होगा और। नियामकों और इस्तेमाल करने वालों के बीच मिलीभगत भी है, जिसका नतीजा ऐसे हादसों की शक्ल में सामने आता है। दिल्ली का ऐसा हाल है तो छोटे और मझोले शहरों की हालत की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती।'  उत्तरी दिल्ली नगर निगम की आयुक्त वर्षा जोशी के मुताबिक अतिरिक्त आयुक्त संदीप जैक्स इस मामले की जांच कर रहे हैं। जोशी ने सोमवार को ट्वीट किया, 'जांच में जो भी निकलेगा उस पर हमें कार्रवाई करनी है।'

केंद्र और राज्य सरकारें राजनीतिक फायदे के लिए अवैध कॉलोनियों को अधिकृत करती हैं जिससे समस्याएं और बढ़ती हैं। 23 अक्टूबर को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने दिल्ली में अवैध कॉलोनियों में रह रहे लोगों को मकान का मालिकाना हक देने को मंजूरी देते हुए अवैध कॉलोनियों को नियमित करने का फैसला किया। दिल्ली में विधानसभा चुनाव सिर पर हैं और इस फैसले से दिल्ली के 175 वर्ग किलोमीटर के दायरे में बसी अवैध कॉलोनियों के करीब 4 लाख बाशिंदों को फायदा होगा। उन्हें नगर निगम की सेवाएं मिलेंगी, जिससे स्वास्थ्य सेवा बेहतर होगी, लेकिन शहर के बुनियादी ढांचे पर दबाव भी पड़ेगा। 

इस महीने की शुरुआत में राष्ट्रीय राजधानी की हवा की गुणवत्ता सुधरी और तापमान भी गिरा। मगर वायु गुणवत्ता सूचकांक एक बार फिर 302 पर पहुंच गया है। नवंबर में सर्वोच्च न्यायालय ने पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली के अधिकारियों को लताड़ लगाई थी क्योंकि इन इलाकों में पराली जलने पर रोक नहीं लगाई गई थी और इसे प्रदूषण बढ़ने की बड़ी वजह माना जाता है। अदालत ने यहां तक कहा कि दिल्ली के लोगों को मरने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। 

शहर में प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए दिल्ली सरकार ने 4 से 16 नवंबर तक सड़कों पर ऑड-ईवन योजना लागू की। लेकिन लोगों का कहना था कि इससे समस्या का आंशिक समाधान ही होगा, जबकि इसे पूरी तरह हलग करने की जरूरत हे। सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वॉयरमेंट (सीएसई) के एक अध्ययन के मुताबिक आम तौर पर गर्मी के दिनों में प्रदूषण का स्तर कम रहता है क्योंकि तापमान ज्यादा होने पर प्रदूषणकारी तत्व वायुमंडल से बाहर चले जाते हैं। यह अध्ययन 1 अप्रैल से 15 जून, 2019 के बीच दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के दैनिक ओजोन आंकड़ों पर आधारित है। इसमें पता चला कि तापमान बढऩे के साथ ही ओजोन का स्तर भी बहुत बढ़ गया। कई आवासीय और औद्योगिक इलाकों में प्रदूषण का स्तर कई दिनों तक बहुत अधिक रहा। सीएसई की कार्यकारी निदेशक (शोध एवं एडवोकेसी) अनुमिता रायचौधरी का कहना है, 'यह बहुत चिंता की बात है क्योंकि अस्थमा तथा सांस की बीमारी से जूझ रहे लोगों पर ओजोन का बुरा प्रभाव पड़ सकता है।' 

इधर पानी की गुणवत्ता और पाइप के जरिये पानी की उपलब्धता सियासी मुद्दा बन गया है। 2011 की जनगणना के मुताबिक राष्ट्रीय राजधानी में कुल 6.25 लाख परिवारों में से केवल 18 फीसदी को पाइप वाला पानी मिल पाता है। उपभोक्ता मामलों के केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान ने भी भारतीय मानक ब्यूरो का एक शोध जारी कर विवाद बढ़ा दिया। शोध में कहा गया था कि दिल्ली में पानी की गुणवत्ता सबसे खराब थी।

पेयजल के 11 नमूनों की गुणवत्ता और उनमें मौजूद रसायानों तथा जीवाणुओं की जांच की गई और नमूने मानक ब्यूरो के एक या अधिक मानकों पर विफल पाए गए। यह अलग बात है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मानक ब्यूरो की रिपोर्ट पर सवाल खड़े कर दिए और कहा कि इन नमूनों को मंत्री के एक करीबी शख्स से लिया गया था। दिल्ली में पाइप से पानी की आपूर्ति दिल्ली जल बोर्ड करता है और उसका दावा है पिछले हफ्ते शहर में बोर्ड ने 4,204 नमूनों का संग्रह किया और उनमें से 98.19 फीसदी पीने के लिए उपयुक्त थे। बहरहाल इन सब के बीच वैश्विक संपत्ति सलाहकार कुशमैन ऐंड वेकफील्ड ने दिल्ली के खान मार्केट को दुनिया के 20 सबसे महंगे बाजारों में शुमार किया है। यह बात अलग है कि यह शहर अपने ही बोझ तले दरकता जा रहा है। 

पानी की गुणवत्ता पर विवाद 

पेयजल के 11 नमूनों की गुणवत्ता की जांच की गई ताकि उनमें रसायन, विषाक्त तत्वों और जीवाणुओं आदि की जांच की जा सके। ये नमूने एक या अधिक पैमानों पर विफल हो गए। इस पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने रिपोर्ट की सत्यता पर ही सवाल खड़े कर दिए और आरोप लगाया कि नमूने अधिकृत व्यक्ति से नहीं लिए गए।

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