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नफरत की आग भड़का रहे भारतीय समाचार चैनल

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  December 20, 2019

भारत के लिए यह हफ्ता रक्तरंजित रहा है। नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। इनमें से कुछ प्रदर्शनों ने हिंसा का रूप ले लिया। ऐसा लगता है कि टेलीविजन चैनलों, समाचारपत्रों और सोशल मीडिया के शोरशराबे में यह बात कहीं गुम हो गई कि ऐसा क्यों और कैसे हुआ? मीडिया खासकर टीवी इस कानून के बारे में जानकारी देने, लोगों को जागरूक करने और उनके उमड़ते जज्बात को शांत करने में नाकाम रहा है। इस कानून से क्या होगा? अपनी नागरिकता साबित करने का क्या मतलब है? समाचारपत्रों, एक-दो समाचार चैनलों और करीब आधा दर्जन समाचार वेबसाइट को छोड़कर बाकी सभी मीडिया प्रतिष्ठानों ने इस मुद्दे की रिपोर्टिंग में बेहद खराब काम किया है।

 
भारत में टीवी की पहुंच 83.6 करोड़ लोगों तक है जबकि इंटरनेट उपभोक्ता 66 करोड़ और समाचारपत्र पाठक 40 करोड़ ही हैं। टीवी दर्शक अनुसंधान परिषद बार्क के आंकड़े बताते हैं कि समाचार चैनलों की पहुंच 26 करोड़ से अधिक दर्शकों तक है। इसके साथ 5-10 करोड़ उन लोगों को भी जोड़ लीजिए जो ऑनलाइन माध्यमों से समाचार चैनल देखते हैं। वर्ष 2000 में जहां भारत में मुश्किल से दस समाचार चैनल थे, वहीं अब यह संख्या दुनिया में सर्वाधिक 400 के पार हो चुकी है। इनमें से आधे समाचार चैनलों का स्वामित्व रियल एस्टेट दिग्गजों, नेताओं और उनके सहयोगियों के पास है। मांग से अधिक चैनल वाला यह बाजार पूरी तरह विज्ञापन पर निर्भर है। विज्ञापन अधिक दर्शकों वाले चैनलों के ही खाते में जाते हैं। इसका नतीजा यह है कि बीते दशक में गुणवत्ता लगातार नीचे की तरफ गिरती चली गई। इस होड़ में बलात्कार एवं हत्या को सांप्रदायिक रंग देने से लेकर हिंसा के लिए उकसाने जैसी सभी बातें सही मान ली जाती हैं। अहम मसलों पर भारतीय समाचार चैनलों की नादानी एवं कायरता एकदम साफ नजर आती है। मसलन, अर्थव्यवस्था की गिरती सेहत और बढ़ती आय असमानता के मुद्दों पर अधिकतर चैनल चुप रहते हैं। 
 
यूट्यूब पर पीइंग ह्यूमन चैनल चलाने वाले रमित वर्मा मीडिया एवं समसामयिक मुद्दों पर अपना नजरिया पेश करते हैं। इस साल 19 अक्टूबर तक देश के चार बड़े हिंदी समाचार चैनलों पर प्रसारित चार प्रमुख टीवी शो में होने वाली बहसों का उनका विश्लेषण बहुत कुछ बयां कर देता है। इस दौरान इन चैनलों पर प्राइम टाइम में हुई 202 बहसों में से 79 पाकिस्तान पर हमले से संबंधित थीं जबकि 66 बहसों के केंद्र में विपक्षी दल और जवाहरलाल नेहरू थे। हजारों जमाकर्ताओं की जिंदगी भर की बचत जिस पीएमसी बैंक के डूबने से खतरे में पड़ चुकी है, उस बारे में महज एक बहस हुई। शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, पर्यावरण, भीड़ की हिंसा, अर्थव्यवस्था या किसानों की बदहाली पर कोई भी चर्चा नहीं हुई। पाकिस्तान जैसे अप्रासंगिक देश को लेकर समाचार चैनलों में छाई सनक को पेचीदा मानकर खारिज किया जा सकता है लेकिन इसका असर वास्तविक है।
 
समाचार चैनलों पर परोसा जाने वाला कचरा सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप संदशों की शक्ल में विस्तार पा लेता है। फिर सम्मेलनों और डाइनिंग रूम में उन्हें उद्धृत किया जाता है। इस तरह वह ऐसे उत्पाद में बदल जाता है जो हमारे राजनीतिक एवं सामाजिक निर्णयों को बदलने लगता है। इस वजह से होने वाला ध्रुवीकरण, भारतीयता की हमारी सामूहिक भावना और ज्ञान के स्तर को होने वाली क्षति उस समय नजर आती है जब लोग निहत्थे छात्रों की पिटाई करने वाली पुलिस के पक्ष में भी तालियां पीटने लगते हैं। तमाम भारतीय अभी इस बात को नहीं समझ पा रहे हैं कि वे बड़ी मुश्किल से हासिल एवं सींचे गए लोकतंत्र की कुछ आखिरी निशानियों की मौत पर जश्न मना रहे हैं।
 
वित्तीय रूप से इनमें से किसी भी चैनल का अधिक प्रभाव नहीं है। समाचार टीवी चैनलों का बाजार महज 3,000-4,000 करोड़ रुपये है जबकि टीवी उद्योग का आकार 74,000 करोड़ रुपये है। इतने चैनलों में से बमुश्किल दो चैनल ही लाभ कमाते हैं। लेकिन समाचार चैनलों ने सामाजिक रूप से उस भारत को तबाह कर दिया है जिसकी सारी दुनिया विविधता को जगह देने के लिए तारीफ करती रही है। सवाल उठता है कि क्या किया जा सकता है? इस स्तंभ में पहले भी सुझाए जा चुके बिंदुओं में तीन काफी अहम हैं। पहला, दूरदर्शन और आकाशवाणी का संचालन करने वाले प्रसार भारती कॉर्पोरेशन को केंद्र सरकार से वित्तीय एवं प्रशासनिक तौर पर स्वतंत्र किया जाए। इसे बीबीसी की तर्ज पर एक विश्वस्तरीय सार्वजनिक प्रसारक बनने के लिए करदाताओं के पैसे का इस्तेमाल करने दीजिए। ब्रिटेन में बीबीसी ऐसे मानदंडों का मानक तय करता है जिसके अनुसरण के लिए निजी चैनल बाध्य होते हैं।
 
दूसरा, समाचार प्रसारण में विदेशी निवेश के स्तर को 49 फीसदी से बढ़ाकर 100 फीसदी किया जाए। अधिकांश विदेशी समाचार प्रसारक इसके लिए अधिक इच्छुक नहीं नजर आते हैं। लेकिन अगर कुछ प्रसारक भारत आते हैं और प्रशिक्षण एवं रिपोर्टिंग में निवेश करते हैं तो यह काफी अच्छा होगा। भारतीय समाचार चैनलों के तेजी से बढऩे का सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ है कि जमीनी स्तर पर रिपोर्टिंग खत्म हो चुकी है और पूरी व्यवस्था एंकरों के इर्दगिर्द संचालित हो रही है।
 
तीसरा, चैनलों के स्वामित्व मानकों को बदलिए। यह इसलिए अहम है कि अगर गुणवत्तापरक पत्रकारिता और अन्य दबावों में से चुनने का मौका आता है तो मालिक किसे तरजीह देंगे? सबसे अच्छे एवं मुनाफे में चलने वाले वैश्विक समाचार ब्रांड का स्वामित्व ऐसी कंपनियों के पास है जिसकी कमान ट्रस्ट संभालता है। जैसे, द इकनॉमिस्ट, द न्यूयॉर्क टाइम्स और फाइनैंशियल टाइम्स। अगर भारतीय सिनेमा ने हमारी सॉफ्ट पावर का प्रतीक बनकर हमें वैश्विक गौरव दिया है तो भारतीय समाचार चैनलों ने सबसे खराब पत्रकारिता से हमें शर्मसार भी किया है। अब समस्या दूर करने का वक्त आ गया है।
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