बिजनेस स्टैंडर्ड - जीएसटी पर पुनर्विचार
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जीएसटी पर पुनर्विचार

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  December 20, 2019

मोदी सरकार ने परिवहन क्षेत्र के बुनियादी ढांचे के विकास और आम नागरिकों के वास्ते उपयोगी वस्तुओं के लिए प्रावधान करने की खातिर महत्त्वाकांक्षी व्यय योजना की शुरुआत की है। दिक्कत इसके लिए धन जुटाने की रही है। एक प्रमुख अनुमान यह था कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने के बाद सकल घरेलू उत्पाद में अप्रत्यक्ष कर का योगदान बढ़ेगा और इससे मदद मिलेगी। परंतु ऐसा नहीं हुआ। इस वर्ष जीएसटी से हासिल केंद्रीय राजस्व की बात करें तो वह तय लक्ष्य से करीब 40 फीसदी कम रहा। अब राज्य भी जीएसटी हिस्सेदारी प्राप्त न होने की शिकायत कर रहे हैं। ऐसे में परेशान सरकार अपने बिल का परोक्ष भुगतान करने या शायद न करने के तरीके तलाश रही है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने कहा है कि केंद्र सरकार का घाटा आधिकारिक तौर पर घोषित आंकड़े से कम से कम 2 प्रतिशत अंक अधिक है। 

 
जीएसटी में चार गलतियां की गईं। पहली, राजनीतिक नेतृत्व को लंबे समय तक यह अहसास नहीं हुआ कि जीएसटी परिवर्तन वाला एक सपाट कर है। ऐसे में गरीबों द्वारा ग्रहण की जाने वाली और कर राहत वाली चीजों पर अब अधिक कर दर लगेगी। इसके साथ ही समृद्घ तबके द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली वस्तुओं पर कम कर दर लगेगी। यानी यदि जीएसटी दर राजस्व निरपेक्ष रही तो गरीब ज्यादा कर चुकाएंगे और अमीर अपेक्षाकृत कम कर चुकाएंगे। इसके चलते पहली गलती हुई और राजनीतिक कारणों से जीएसटी दरों में भारी बदलाव किया गया। यह बिना जीएसटी के तर्क वाला जीएसटी था।
 
दूसरी गलती थी राज्यों को एक वर्ष से दूसरे वर्ष में जाने पर जीएसटी राजस्व में 14 फीसदी के इजाफे की गारंटी। ऐसा तब किया गया जब रिजर्व बैंक के लिए मुद्रास्फीति को 4 फीसदी (2 फीसदी इधर-उधर के साथ) पर लक्षित करते हुए मौद्रिक नीति का एक नया ढांचा तय किया जा रहा था। इसका अर्थ यह था कि 7 फीसदी की दर से विकसित होती अर्थव्यवस्था से मुद्रास्फीति को शामिल करते हुए करीब 11 फीसदी की वृद्घि दर देने की उम्मीद थी। यह राज्यों से किए गए 14 फीसदी राजस्व वृद्घि के वादे से काफी कम था। अंतर को पाटने के लिए क्षतिपूर्ति उपकर की व्यवस्था केवल पांच साल के लिए की गई।
 
तीसरी गलती थी कई अहम वस्तुओं को जीएसटी के दायरे से बाहर रखना। इसमें पेट्रोलियम उत्पाद, तंबाकू और शराब शामिल हैं। चूंकि उत्पाद राजस्व का बड़ा हिस्सा इन्हीं मदों में आता है इसलिए इसने राजस्व निरपेक्ष जीएसटी दर की संभावना को प्रभावित किया। चौथी गलती थी मोदी सरकार द्वारा आम चुनाव के मद्देनजर वस्तुओं की लागत में कमी करना। इस प्रक्रिया में कई खपत वाली वस्तुओं की कर दर उनके कच्चे माल पर लगने वाली कर दर से भी कम हो गई। ऐसे में अब कंपनियां कच्चे माल पर लगे कर पर रिफंड की मांग कर रही हैं क्योंकि वह उनके द्वारा अंतिम उत्पाद पर चुकाए जाने वाले कर से अधिक है। 
 
इस बीच क्रियान्वयन की प्रक्रिया में हमें उसी बात को दोहराव देखने को मिला जो तीन साल पहले नोटबंदी के दौरान देखने को मिला था: लोगों ने काले धन को सफेद करने के तमाम तरीके तलाश लिए थे। जीएसटी के मामले में फर्जी बिल बनाने का एक उद्योग ही चल पड़ा जिसने उत्पादकों को उनकी जरूरत के मुताबिक बिल बनाकर दिए। इस बीच कई उत्पादन शृंखलाओं ने जीएसटी के दायरे से बचने का रास्ता तलाश लिया। शुरुआती वादा कि बिलों का मिलान करके ऐसी धोखाधड़ी रोकी जाएगी, का परीक्षण अप्रैल में होगा। हमें देखना होगा कि क्या ऐसा हो सकता है या इससे भी अफरातफरी ही मचेगी। अगर यह कारगर नहीं हुआ तो जीएसटी का एक प्रमुख वादा झूठा साबित होगा जिसमें कहा गया था कि यह कर वंचना को रोकेगा और जीडीपी में कर हिस्सेदारी बढ़ाएगा। 
 
यदि इनवॉइस मिलाने की प्रक्रिया भी सफल रही तो भी व्यवस्था के कई अन्य तत्त्व ऐसे हैं जो टूटे हुए हैं। शायद जीएसटी की व्यवस्था विकास के मौजूदा चरण में अर्थव्यवस्था के लिए बेहद जटिल थी। केंद्र को जीएसटी परिषद के साथ मिलकर नई दरें और नए कर स्लैब (जितने कम हों उतना बेहतर) बनाने होंगे तथा एक नई शुरुआत करनी होगी। कोई अर्थव्यवस्था ऐसे कर प्रयोग के साथ नहीं चल सकती जो नाकाम साबित हुआ हो। 
Keyword: transport, gst, input tax, credit,,
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