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वित्त वर्ष 2020-21 का बजट व्यय के लिहाज से रह सकता है खास

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  December 19, 2019

पिछले कई वर्षों के दौरान केंद्र सरकार के सालाना बजट के महत्त्व एवं इसकी उपयोगिता में ह्रास हुआ है। एक समय था जब बजट को लेकर उद्योग जगत उत्साहित रहता था और यह जानने की उत्सुकता बनी रहती थी कि किन उत्पादों या सेवाओं पर कर बोझ कम होगा या नए कर लगाए जाएंगे। सभी यह समझने की कोशिश करते थे कि अगले वर्ष से उन्हें प्रत्यक्ष कर से जुड़े क्या लाभ मिलेंगे। अब वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की शुरुआत और व्यक्तिगत करदाताओं और कंपनियों के लिए अपेक्षाकृत कर दरें अधिक स्थिर रहने से संघीय बजट का आकर्षण कम हुआ है और इसे लेकर लोगों की उत्सुकता भी पहले जैसी नहीं रह गई है। 

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वित्त वर्ष 2020-21 का बजट कुछ अलग होगा। प्रत्यक्ष कर एवं जीएसटी दर स्थिर रहने के बावजूद 1 फरवरी को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किए जाने वाला बजट सभी का ध्यान आकृष्ट करेगा। पिछली छह तिमाहियों से भारतीय अर्थव्यवस्था के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर लगातार कमजोर हो रही है। सरकार ने इस स्थिति से निपटने के लिए कुछ कदम अवश्य उठाए हैं, लेकिन इनका कोई सकारात्मक असर अब तक नहीं दिखा है। वित्तीय क्षेत्र भी संकट से उबर नहीं पाया है। इससे पहले कि सरकारी बैंकों को नई पूंजी देने और कई भारतीय कंपनियों द्वारा लिए ऋण के समाधान से जुड़े उपाय किए जाते, गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) के संकट ने समस्या कई गुना और बढ़ा दी। 
 
हाल में एक शहरी सहकारी बैंक के पतन ने वित्तीय क्षेत्र की हालत और बिगाड़ दी। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) इस वर्ष अब तक रीपो दर 135 आधार अंक तक कम कर चुका है। हालांकि इससे ऋण आवंटन में सुधार नहीं हुआ है और न ही विनिर्माण क्षेत्र की क्षमता की उपयोगिता ही बढ़ी है। बेरोजगारी दर 6 प्रतिशत पार कर चुकी है, जो पिछले चार दशकों का सर्वाधिक चिंताजनक आंकड़ा है। इन कारणों से आगामी बजट पर सभी का ध्यान जाना लाजिमी है। बजट को लेकर उत्सुकता बढऩे के दो अन्य कारण भी हैं। पहला कारण तो यह है कि चालू वित्त वर्ष के लिए राजस्व संग्रह का अनुमान काफी खुशनुमा है, लेकिन इसे प्राप्त करना सहज नहीं लग रहा है। राजस्व संग्रह के वर्तमान आंकड़ों से तो यही लगता है कि राजकोषीय घाटा जीडीपी का 3.3 प्रतिशत तक रखने का लक्ष्य हासिल नहीं हो पाएगा। इस वर्ष के पहले आठ महीने में राजस्व संग्रह की अनुमानित दर महज 1.5 प्रतिशत रही है, जबकि लक्ष्य 18 प्रतिशत रखा गया है। दूरसंचार कंपनियों को अतिरिक्त दूरसंचार शुल्क देने का सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश और आरबीआई से एकबारगी लाभांश से सरकार को 1.3 लाख करोड़ रुपये राजस्व की प्राप्ति होगी। हालांकि अंतर तब भी रह जाएगा। वित्त वर्ष 2019-20 के लिए राजकोषीय घाटा 3.8 प्रतिशत स्तर तक रह सकता है।
 
दूसरा कारण यह है कि 2020-21 के बजट में 15वें वित्त आयोग की सिफारिशें भी शामिल करनी होंगी। हालांकि इस महत्त्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर 1 फरवरी को ही मिल पाएगा कि क्या राज्यों के साथ कर राजस्व के बंटवारे के लिए विभाज्य कोष से रक्षा एवं आंतरिक सुरक्षा पर व्यय होने वाली केंद्र की रकम के समतुल्य राशि अलग की जाएगी या नहीं। जीएसटी संग्रह की सुस्त गति से परेशान राज्यों के लिए यह दोहरी मार होगी और इससे उनका राजकोषीय घाटा भी बढ़ सकता है। जीएसटी संग्रह में कमी के मद्देनजर जीएसटी परिषद के समक्ष कर दरों में अधिक कटौती की गुंजाइश नहीं रह जाती है। इसके उलट कच्चे माल की तुलना में तैयार उत्पादों पर दरें कम करने के नकारात्मक असर को दूर करने के लिए जीएसटी दरें अधिक तर्कसंगत बनाने की जरूरत है। तैयार उत्पादों पर दरें घटाने से कर वापसी में तेजी आई है, जिसका सीधा असर कर संग्रह पर हुआ है। कॉर्पोरेट टैक्स में पहले ही कमी की जा चुकी है। आरबीआई ने 1,500 कंपनियों का सर्वेक्षण किया है, जिसके अनुसार नई क्षमता विकसित करने या पूंजी परिसंपत्तियों के सृजन के लिए इन कंपनियों द्वारा किए गए निवेश की दर में स्वागत योग्य बढ़ोतरी हुई है। आय कर दरों में कमी से लोगों के पास उपभोक्ताओं एवं निवेशकों के पास खर्च या बचत करने योग्य रकम बढ़ जाएगी। इससे देश में मांग में तेजी आने में मदद मिलनी चाहिए। वित्त मंत्रालय को प्रत्यक्ष कर समिति अपनी रिपोर्ट सौंप चुकी है, जिसमें कर रियायत तर्कसंगत बनाने एवं व्यक्तिगत आयकर में कमी करने की सिफारिश की गई है। 
 
भारतीय अर्थव्यवस्था में कई ढांचागत क्षेत्रों पर बड़े पैमाने पर व्यय की दरकार है। पिछले कुछ वर्षों में ढांचागत क्षेत्र पर व्यय घटा है और इसकी भरपाई के लिए बजट में संसाधन जुटाने की जरूरत है। अतिरिक्त संसाधन का प्रावधान करने की राह आसान नहीं होगी और इससे राजकोषीय मजबूती का निश्चय कमजोर पड़ सकता है। अगर सरकार ढांचागत क्षेत्र के निर्माण के लिए अतिरिक्त संसाधनों का उपयोग सूझ-बूझ के साथ करती है तो राजकोषीय मजबूती से भटकाव को भी उचित ठहराया जा सकता है। वैसे भी जब आर्थिक वृद्धि दर पिछले 18 महीने में आधी रह गई है तो अर्थव्यवस्था में जान डालने के लिए राजकोषीय घाटे में इजाफा नजरअंदाज किया जा सकता है।  
 
बजट 2020 इस बात के लिए याद रखा जाएगा कि इसमें व्यय के मोर्चे पर क्या कदम उठाए जाते हैं। पिछले सप्ताह टी वी सोमनाथन को वित्त मंत्रालय में नया व्यय सचिव नियुक्त किया गया है। सोमनाथन की नियुक्ति कोई सामान्य बात नहीं मानी जा सकती। वह 2015 से 2017 तक दो वर्षों के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय में थे। इस दौरान उन्होंने आर्थिक नीतियों के क्रियान्वयन पर नजर रखी थी। इसके बाद अगले दो वर्षों तक उन्होंने तमिलनाडु के वित्त एवं वाणिज्यिक कर विभाग का कामकाज देखा था। अब वह केंद्र की व्यय योजना के लिए क्या करते हैं इस पर सबकी नजरें होंगी। 
Keyword: budget, GST, economy, bank,,
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