बिजनेस स्टैंडर्ड - वृद्धि दर बढ़ाने के लिए निर्यात प्रोत्साहन जरूरी
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वृद्धि दर बढ़ाने के लिए निर्यात प्रोत्साहन जरूरी

शंकर आचार्य /  December 19, 2019

सुस्ती के दौर से गुजर रही भारतीय अर्थव्यवस्था को तीव्र वृद्धि की राह पर लाने के लिए निर्यात स्थिरता का दौर खत्म करना होगा। इस बारे में विस्तार से बता रहे हैं शंकर आचार्य

 
भारतीय अर्थव्यवस्था एक गहरी एवं व्यापक होती सुस्ती के बीच में है। आर्थिक वृद्धि दर लगातार छह तिमाहियों से गिरते हुए सितंबर तिमाही में 4.5 फीसदी पर आ चुकी है और हालात जल्द सुधरने की गुंजाइश भी नहीं दिख रही है। इस बात पर मीडिया एवं अन्य क्षेत्रों में काफी चर्चा हो रही है कि कुल मांग के उपभोग और निवेश जैसे मुख्य अवयवों में कैसे तेजी लाई जाए और क्या मुश्किल राजकोषीय स्थिति में सरकारी व्यय बढ़ाने की गुंजाइश बाकी है? आश्चर्यजनक ढंग से निर्यात के बारे में चर्चा लगभग नदारद है। 
 
फिर भी वर्ष 2013-14 तक उत्पादों एवं सेवाओं का निर्यात सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 25 फीसदी था जो सरकारी व्यय की हिस्सेदारी से अधिक और निर्धारित निवेश से थोड़ा ही कम है। दुर्भाग्य से, भारत का उत्पाद निर्यात वर्ष 2011-12 से ही करीब 300 अरब डॉलर पर स्थिर रहने से कुल निर्यात का हिस्सा वर्ष 2018-19 में 20 फीसदी से नीचे आ गया और उत्पाद निर्यात की हिस्सेदारी 12.4 फीसदी पर आ गई। वैश्विक विकास अनुभव बताते हैं कि कोई भी बड़ी अर्थव्यवस्था निर्यात में सशक्त वृद्धि बनाए रखे बगैर तीव्र आर्थिक वृद्धि (सात फीसदी से अधिक) नहीं कायम रख पाई है। खुद हमारा अनुभव भी ऐसा ही है। भारत की आर्थिक वृद्धि के दो बेहतरीन दौर (1992-97 और 2003-11) में निर्यात वृद्धि का सिलसिला मजबूत रहा था। निर्यात गतिविधियों में रोजगार के अवसर अधिक होते हैं और भारत में एमएसएमई क्षेत्र का उत्पाद निर्यात में हिस्सा परंपरागत तौर पर 35-40 फीसदी रहा है। कुछ हद तक कमजोर बाह्य वित्त को मजबूती देने के लिए भी निर्यात वृद्धि जरूरी है। फिर निर्यात को नजरअंदाज करने वाली नीति को पलट क्यों देते हैं?
 
नीतियों में बदलाव करने के पहले हमें उस भ्रामक धारणा से भी निपटना है जिसके मुताबिक भारत की व्यापार नीतियों में खास गड़बड़ी नहीं है और हमारी निर्यात स्थिरता वर्ष 2011 के बाद वैश्विक कारोबार में आई स्थिरता के चलते है। वास्तव में, उसके बाद से वैश्विक निर्यात वृद्धि डांवाडोल रही है। लेकिन हमने तीव्र वृद्धि के दोनों ही चरणों में वैश्विक निर्यात वृद्धि को मात दी है। इसके अलावा हमसे उलट कुछ अन्य एशियाई देशों ने हाल के वर्षों में काफी अच्छा काम किया है। आंकड़े बताते हैं कि 2011 से 2018 के बीच भारत का उत्पाद निर्यात केवल आठ फीसदी ही बढ़ा है जबकि इसी अवधि में वियतनाम ने 154 फीसदी, कंबोडिया ने 114 फीसदी, म्यांमार ने 82 फीसदी, बांग्लादेश ने 61 फीसदी, फिलीपींस ने 40 फीसदी और चीन ने 31 फीसदी तक की वृद्धि दर्ज की। तीव्र निर्यात वृद्धि का मतलब बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने से है। वर्ष 2011 और 2018 के बीच विश्व निर्यात में हमारा हिस्सा 1.7 फीसदी पर स्थिर बना रहा जबकि वियतनाम का हिस्सा लगभग दोगुना, म्यांमार का 80 फीसदी, बांग्लादेश का 50 फीसदी से अधिक, फिलीपींस का 27 फीसदी और व्यापार युद्ध में उलझने के बावजूद चीन का हिस्सा 20 फीसदी से अधिक बढ़ा। विश्व निर्यात में चीन की हिस्सेदारी पिछले सात वर्षों में 2.4 फीसदी बढ़ गई जो वर्ष 2018 में भारत की कुल हिस्सेदारी से 60 फीसदी अधिक है।
 
लिहाजा हमें विश्व व्यापार प्रवृत्तियों को दोष नहीं देना चाहिए। सही नीतियों के साथ हम विश्व निर्यात में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा सकते हैं जिससे जीडीपी, रोजगार, एमएसएमई आउटपुट और सशक्त बाह्य वित्त में बढ़ोतरी का लाभ मिल सके। इसके उलट मौजूदा अपर्याप्त नीतियों के चलते निर्यात में स्थिरता बनी रह सकती है जिसके नकारात्मक असर समग्र आर्थिक वृद्धि, रोजगार और बाह्य वित्तीय व्यवहार्यता पर हो सकते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि निर्यात के मोर्चे पर हमारे कमजोर प्रदर्शन को सुधारने के लिए कौन से नीतिगत कदम उठाने होंगे? हमें कम मजदूरी पर काम कर रहे श्रमिकों को बेहतर शिक्षा देने और कुशल बनाने, संपर्क एवं भंडारण सुविधा बढ़ाने के लिए अधिक संख्या में एवं बेहतर ढांचे के निर्माण के अलावा सस्ती ऊर्जा की उपलब्धता सुधारने, भूमि एवं श्रम कानूनों में सुधार और अपने खस्ताहाल वित्तीय प्रणाली में नई जान फूंकनी होगी। इन कदमों से कुल आर्थिक उत्पादकता बढ़ेगी जिससे एक प्रतिस्पद्र्धी एवं उत्पादक अर्थव्यवस्था बनाने में मदद मिलेगी।
 
संक्षिप्त एवं मध्यम अवधि के भुगतान से विदेश व्यापार नीतियों का दायरा कम होने से हमारा ध्यान उन नीतियों पर होना चाहिए जिन्होंने पिछले सात वर्षों से निर्यात को स्थिर रखने में बड़ी भूमिका निभाई है। इनमें चार नीतियां खास तौर पर अहम हैं। पहली, हमारी मुद्रा के मौजूदा अधिमूल्यन को दुरुस्त करना है क्योंकि यह निर्यात पर कर लगाने एवं आयात को सब्सिडी देने के बराबर है। आंकड़े बताते हैं कि इस दशक में रुपये की वास्तविक प्रभावी विनिमय दर खासी अधिक रही है। भारतीय रिजर्व बैंक के 36 देशों के सूचकांक से यह पता चलता है। 
 
इस अधिमूल्यन में गिरावट आने से न केवल निर्यात को बढ़ावा मिलेगा बल्कि इससे तीन वर्षों से जारी आयात शुल्क संरक्षण को भी पलटने में मदद मिल सकती है। हमें इस बात को मानना होगा कि ऊंचे आयात शुल्क न केवल अक्षम एवं उच्च लागत वाले घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देते हैं बल्कि उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल के महंगा होने से निर्यात भी हतोत्साहित होता है। कोई भी देश आयात शुल्क संरक्षण की राह पर चलते हुए उच्च निर्यात वृद्धि कायम नहीं रख सकता है। अगर हम तीव्र निर्यात वृद्धि बहाल करने को लेकर गंभीर हैं तो हमें हाल के वर्षों में की गई आयात शुल्क वृद्धि को वापस लेना होगा। और मुद्रा अधिमूल्यन की पृष्ठभूमि में ऐसा करना कहीं अधिक आसान होगा।
 
तीसरी, हमें यह समझना चाहिए कि गत दो दशकों में विश्व व्यापार वृद्धि का एक बड़ा हिस्सा वैश्विक (एवं क्षेत्रीय) मूल्य शृंखलाओं (जीवीसी) से चालित होता रहा है। यह महज संयोग नहीं है कि तीव्र निर्यात वृद्धि के अधिकांश प्रतिमान भारत की तुलना में जीवीसी में कहीं बेहतर ढंग से अंतर्निहित हैं। इसके अलावा वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में भले ही जीवीसी की अहमियत स्वीकार की, लेकिन व्यापक एवं अप्रत्याशित आयात शुल्क की तरफ लौटना जीवीसी में सफल भागीदारी को कमतर बनाता है। जीवीसी में भागीदारी के लिए नगण्य या निम्न आयात शुल्क होना और उत्पादों की सरल एवं सीमापार आवाजाही जरूरी है। क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसेप) समझौते का संस्थापक सदस्य बनने से हमारे इनकार का हमारे व्यापार एवं निर्यात संभावनाओं पर असर समय बीतने के साथ गंभीरता से महसूस किया जाएगा। अगर अब भी इस समझौते का हिस्सा बन पाना संभव है तो हमें आरसेप का हिस्सा बन जाना चाहिए। अन्यथा, समय बताएगा कि हमने व्यापार नीति में एक ऐतिहासिक भूल कर दी थी।
 
चौथी, जीएसटी लागू होने के बाद से ही निर्यातक इनपुट टैक्स क्रेडिट के अधूरे एवं विलंबित भुगतान की शिकायतें लगातार करते रहे हैं। हमें प्रक्रियागत सुधारों से इन समस्याओं को युद्धस्तर पर दूर करना होगा। जीएसटी प्रणाली में शून्य-दर वाले निर्यात का किताबी नियम व्यवहार में लाना होगा। निर्यात वृद्धि अधिक होने से आर्थिक सुस्ती दूर करने, नए रोजगार पैदा करने और हमारे बाह्य वित्त को मजबूत करने में मदद मिलेगी।                                      
Keyword: india, economy, GDP, growth,,
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