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असम एमएफआई संकट में आंध्र की घटना की झलक

हंसिनी कार्तिक /  December 18, 2019

उज्जीवन स्मॉल फाइनैंस बैंक सूचीबद्घ होने के बाद से तेजी से बढ़ रहा है। वह खास वर्गों की जरूरतों के मुताबिक नई योजनाएं लाने जा रहा है और उनमें से कुछ का परीक्षण भी किया जा रहा है। लेकिन चिंता की बात यह है कि असम में हो रही घटनाएं उसके कारोबार को प्रभावित कर सकती हैं। उज्जीवन फाइनैंशियल सर्विसेज के संस्थापक समित घोष ने राज्य में व्याप्त संकट और अविभाजित आंध्र प्रदेश के सूक्ष्म वित्त उद्योग के साथ उसकी समानता पर हंसिनी कार्तिक से बातचीत की। प्रमुख अंश: 

 
सूक्ष्म वित्त कंपनी के तौर पर आप असम में चल रहे घटनाक्रम को किस रूप में देखते हैं?  
 
बहुत सारे संस्थान, सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) हमें कम विकसित क्षेत्रों में जाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। दक्षिण में हम पहले से हैं और नौ साल पहले हमने असम में कदम रखा। हमें पता था कि असम का बाजार बहुत अलग है और हमने उस कारोबार को धीरे-धीरे आगे बढ़ाया। कारोबार के लिहाज से असम के निचले इलाके अपेक्षाकृत सुविधाजनक हैं। वहां पर हमारी 13 शाखाएं हैं और ऊपरी असम में केवल तीन शाखा हैं। यह पहाड़ी इलाका है, जो आर्थिक दृष्टिï से थोड़ा कमजोर है। अब दुर्भाग्य से नोटबंदी के बाद दक्षिण से बहुत बड़ी संख्या में सूक्ष्म वित्त संस्थाओं (एमएफआई) ने पूर्वोत्तर की तरफ बढऩे का निर्णय लिया और वहां पर जोरदार तरीके से कर्ज बांटे। नौ वर्ष के बाद असम का हमारा कुल पोर्टफोलियो करीब 450 करोड़ रुपये है। लेकिन दक्षिण के बहुत से एमएफआई ने ढाई वर्षों में 500 से 750 करोड़ रुपये का पोर्टफोलियो तैयार किया है। इन क्षेत्रों में आपको नियुक्ति को लेकर बहुत सचेत रहना होता है। जब काम स्थानीय लोगों के माध्यम से किया जाता है तो समुदाय के साथ जुड़ाव काफी मजबूत होता है। यदि आप पूरे भारत से लोगों को लाकर यहां नियुक्त करते हैं तब भाषा समस्या बन जाती है और समुदाय के साथ आपका कोई जुड़ाव नहीं होता। ऊपरी असम में पहला विरोध बलपूर्वक वसूली करने का हुआ। किसी तरह से माइक्रोफाइनैंस इंस्टीट्ïयूशंस नेटवर्क या एमएफआईएन इसको शांत कर पाने में सफल हुए। लेकिन उसी दौरान एमएफआई ने अपनी क्षमता से काफी अधिक ऋण बांटे। इसलिए आज नहीं तो कल यह बुलबुला फूटना ही था। मेरे हिसाब से असम की समस्या अधिक ऋण दिए जाने और बलपूर्वक वसूली करने से जुड़ी है।
 
असम में जो कुछ हो रहा है, उसमें और करीब एक दशक पहले अविभाजित आंध्र प्रदेश में हुए घटनाक्रम में आपको कोई समानता नजर आती है?
 
जब तक इन पर काबू नहीं हो पाता तब तक ये काफी हद तक आंध्र जैसे ही हैं। लेकिन बड़ा अंतर यह है कि असम सरकार ने काफी सहयोग किया है। एमएफआई ने असम में निवेश किया है, बंधन ने बड़ा निवेश किया है जो सराहनीय है लेकिन यदि वे राज्य छोड़ देते हैं तो दिक्कत हो सकती है। मगर सरकार और रिजर्व बैंक सहयोग कर रहे हैं। असम में जनता प्रदर्शन कर रही है और आप इसके पीछे राजनेताओं का हाथ होने की बात कहकर इसे खारिज नहीं कर सकते। एमएफआईएन और हमारे स्व नियामकीय संगठन को सुधार के कदम उठाने होंगे। हम ऐसा करते दिखे तो सरकार और रिजर्व बैंक और खुलकर सामने आएंगे। वरना जनता के आक्रोश के बीच वे हमारी मदद नहीं कर सकते। उम्मीद करते हैं कि यह प्रदर्शन आंध्र प्रदेश के संकट के स्तर तक न पहुंचे। लेकिन फिलहाल हमें चिंताजनक संकेत दिख रहे हैं मसलन ऊपरी असम में 30 दिन से भी ज्यादा पुराने बकाये के मामले बढ़ गए हैं।
 
आवास और वाहन ऋण लेने वाले आपके एमएफआई ग्राहकों से आपका क्या अनुभव रहा है?
 
हमने चार साल पहले किफायती आवास ऋण आजमाए थे और अब उन्हें बढ़ाया जा रहा है। आवास क्षेत्र में संकट हमारे लिए अवसर है। लेकिन हमें समझना होगा कि गांवों, कस्बों और शहरों के बाजारों की जरूरतें अलग-अलग होती हैं। हमें इन बाजारों के लिए खास उत्पाद तैयार करने होंगे। दिक्कत यह भी है कि हर राज्य में इससे जुड़े कानून अलग-अलग हैं। विद्युत वाहन ऋण अभी शुरुआती चरण में है, लेकिन हमारे लिए वृद्घि का अगला क्षेत्र वही बनेगा। अभी हम व्यवस्था जमाने में जुटे हैं और हमने ऐसे छोटे कारोबारों, व्यापारियों, वेतनभोगी कर्मचारियों, छोटे संस्थानों की पहचान की है जिन्हें बैंकों से उचित सेवा नहीं मिल रही।
 
लेकिन कुछ बैंक भी ऐसा ही कर रहे हैं...  
 
इस जमात को बैंकों से सेवा नहीं मिल रही। हम एचडीएफसी बैंक और दूसरे बैंकों के कारोबार की बात नहीं कर रहे। ग्र्राहकों का यह तबका बिल्कुल अलग है। इन्हें गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों से कर्ज मिल रहे थे और उनकी ज्यादातर वित्तीय जरूरतें अब भी असंगठित क्षेत्र से ही पूरी होती हैं। हम एचडीएफसी बैंक, एक्सिस बैंक या कोटक बैंक आदि से मुकाबला नहीं कर रहे। उनका ज्यादा जोर अमीर ग्राहकों पर ही है। हालांकि एचडीएफसी बैंक इस वर्ग में पैठ जमाने की कोशिश कर रहा है और हम उससे मुकाबला करेंगे क्योंकि यहां उसकी मजबूत पकड़ नहीं है।
 
कारोबार को परिपक्व होने में कितना समय लगेगा?
 
खुदरा कर्ज कारोबार का चक्र तीन सााल का होता है। जैसे ही हम व्यक्तिगत ऋण की ओर बढ़ेंगे, गैर निष्पादित संपत्तियां बढऩे लगेंगी। सामूहिक ऋण में झंझट होते हैं। आपको ग्राहकों से हर हफ्ते, पखवाड़े या महीने मिलना होता है और उनसे गारंटी लेनी होती है। कुछ अरसा बाद लोग ऊब जाते हैं और गारंटी के झंझट में पडऩे से इनकार कर देते हैं। माली हालत सुधरते ही ग्राहक व्यक्तिगत ऋण की ओर बढ़ते हैं। तब हमें केवल एक ही फायदा होता है कि हमें ग्राहकों के ऋण चुकाने के व्यवहार की जानकारी होती है।
 
उज्जीवन एसएफबी को सार्वभौम बैंक में कब बदलेंगे?
 
दो वर्षों में हमें (उज्जीवन फाइनैंशियल सर्विसेज) एसएफबी में अपनी हिस्सेदारी को 40 फीसदी से नीचे लाना होगा। नियमों के मुताबिक लघु वित्त बैंक के पांच साल पूरे होने पर रिजर्व बैंक की रजामंदी से प्रवर्तक बैंक से बाहर हो सकते हैं। इसलिए पहले हमें हिस्सेदारी 40 फीसदी से नीचे लाने का तरीका देखना होगा, जिसके बाद हम सार्वभौम बैंकिंग के लाइसेंस के लिए आवेदन करेंगे।  
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