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जलवायु परिवर्तन के खिलाफ जंग अब लाने लगी है रंग

तकनीकी तंत्र
देवांग्शु दत्ता /  December 18, 2019

टाइम पत्रिका की पर्सन ऑफ 2019 ग्रेटा थनबर्ग ऐसी एकमात्र शख्सियत हैं जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र में खड़े होकर दुनिया के नेताओं की आलोचना की। स्वीडन की यह किशोरी अभी मतदान की उम्र से काफी छोटी हैं। न तो वह वैज्ञानिक हैं और न ही नीति निर्माता। जलवायु परिवर्तन की समस्या के खिलाफ उनकी बातों से पूरी दुनिया में एक व्यापक आंदोलन खड़ा करने में मदद मिली है। लेकिन जलवायु परिवर्तन की समस्या के खिलाफ उनकी मुहिम रंग ला रही है और यह एक बड़े आंदोलन का रूप ले रहा है। कई स्थानों पर युवाओं ने इस मुद्दे पर व्यापक जनसभाएं की हैं जिससे अब लोगों का रुझान इस तरफ बढ़ा है। पिछले दशकों के दौरान जलवायु परिवर्तन पर हुई बहस और बैठकों की तुलना में युवाओं का आंदोलन ज्यादा कारगर रहा है। 

 
ग्रीनहाउस प्रभाव के कारण धरती का तापमान बढऩे से जलवायु परिवर्तन हो रहा है। सौर उष्मा के फंसने से पृथ्वी गर्म होती है। दिन के समय वायुमंडल और पृथ्वी की सतह धूप और उष्मा सोखती है। रात के समय पृथ्वी की सतह वायमुंडल में उष्मा छोड़कर ठंडी होती है। इसमें से कार्बन डाई ऑक्साइड और मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसों की मौजूदगी के कारण कुछ उष्मा सोख ली जाती है। ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढऩे पर औसत तापमान भी बढ़ता है। इसका एक और भयावह प्रभाव होता है। इससे मौसम के चक्र में बदलाव होता है जिससे बेमौसम चक्रवाती तूफान आते हैं, बर्फ के पिघलने से समुद्रतल का स्तर बढ़ता है, गर्मियों का मौसम औसत से ज्यादा गरम और लंबा होता है। शताब्दियों पहले इस बात को समझ लिया गया था। जोसफ फूरियर जैसे वैज्ञानिकों ने 1820 के दशक में इसकी संभावना पर चर्चा की थी। वर्ष 1903 में रसायन शास्त्र का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले स्वैंट ऐरेहीनियस ने वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा दोगुनी होने की संभावना पर उसके प्रभावों के बारे में एक मॉडल बनाया था। जलवायु परिवर्तन शब्द 1900 के दशक की शुरुआत में आया था। (एरेहीनियस थनबर्ग के दूर के पूर्वज हैं।)
 
औद्योगिक क्रांति के बाद विकसित अधिकांश प्रौद्योगिकी जीवाश्म ईंधन पर आधारित है। जीवाश्म ईंधन जलने से कार्बन डाईऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसें पैदा होती हैं। ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के कारण जलवायु परिवर्तन प्रभावों के सटीक मॉडल की शुरुआत 50 साल पहले 1970 के दशक में हुई थी। वैज्ञानिक संदर्भ में ये अध्ययन सटीक थे। एक नए अध्ययन के मुताबिक 1970 से 2007 के बीच जारी किए गए 17 मॉडलों में से 14 में ऐसे प्रभावों का अनुमान जताया गया था जो हम आज देख रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के बारे में वैज्ञानिकों के बीच आम सहमति है और हर वह आंकड़ा जो हम माप सकते हैं, वह यही बताता है कि चीजें बदतर हो रही हैं। साल दर साल औसत तापमान बढ़ रहा है। आर्कटिक और हिमनदों में मौजूद बर्फ सोखी गई मीथेन और दूसरी ग्रीनहाउस गैसें छोड़ रही हैं। इससे चीजें और बदतर हो रही हैं। इससे बड़ी मात्रा में जीवजंतुओं की प्रजातियों का लुप्तप्राय होना शुरू हो गया है।
 
हिमालय और आर्कटिक जैसी नाजुक पारिस्थिकी तंत्रों पर इसका भयावह असर हो सकता है। समुद्री जल का स्तर बढऩे से समुद्र के किनारे बसे शहर और द्वीपसमूह जलमग्न हो जाएंगे। भारत की समुद्री सीमा बहुत व्यापक है और वह उन पांच देशों में शामिल है जो समुद्र का जलस्तर बढऩे से सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। इनमें बांग्लादेश पहले स्थान पर है। जलवायु वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ा तो 35 करोड़ लोग सूखे से प्रभावित होंगे और कम से कम 12 करोड़ लोग गरीबी की रेखा से नीचे चले जाएंगे। ऐसा 2030 तक हो सकता है। 
 
दुर्भाग्य से वैज्ञानिक आम सहमति का मतलब भूराजनीतिक आम सहमति नहीं है। दुनियाभर के देशों को इस समस्या से निपटने के लिए उपाय करने की जरूरत है। इसके लिए 2030 तक उत्सर्जन में कम से कम 7.6 फीसदी की सालाना दर से कटौती करनी होगी। यह सैद्घांतिक रूप से संभव है, लेकिन इसके लिए भूराजनीतिक आम सहमति की जरूरत होगी। जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटने के लिए न केवल नई ग्रीन प्रौद्योगिकी की जरूरत है बल्कि हर देश में इसका क्रियान्वयन जरूरी है। इसकी लागत बहुत ज्यादा है। इसके लिए जीवनशैली में भी बदलाव की जरूरत होगी जिससे हर कोई प्रभावित होगा। जीवाश्म ईंधन की जगह अक्षय ऊर्जा के इस्तेमाल से बिजली और ऊष्मा की लागत बढ़ सकती है। साथ ही इससे ज्यादा मुनाफा कमाने वाले उद्योग (कोयला, तेल एवं गैस, जहाजरानी, वायु परिवहन) नष्ट हो जाएंगे और लाखों लोगों का रोजगार प्रभावित होगा। उभरती अर्थव्यवस्थाओं में उत्सर्जन में कमी के लिए पूरी अर्थव्यवस्था को बदलना पड़ सकता है जो सस्ती ताप ऊर्जा पर निर्भर हैं। 
 
कई ऐसे धड़े हैं जो इसका विरोध करते हैं। परंपरागत ऊर्जा उद्योगों के अलावा कई राजनीतिज्ञ भी इस वैज्ञानिक वास्तविकता से इनकार करते आए हैं। जलवायु परिवर्तन को खारिज करने वाली राजनेताओं की इस शक्तिशाली लॉबी में उन देशों के राजनेता शामिल हैं जो ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में शीर्ष पर हैं। साथ ही जीवाश्म ईंधन का निर्यात करने वाले प्रमुख देशों के नेता भी इस जमात का हिस्सा हैं। डॉनल्ड ट्रंप और जेयर बोलसोनारो ने सार्वजनिक रूप से थनबर्ग की उपेक्षा की है। व्लादीमिर पुतिन भी इसे खारिज करते आए हैं। 
 
लेकिन कुछ सकारात्मक बदलाव हुए हैं। ज्यादा सरकारें अब पेरिस समझौते को गंभीरता से ले रही हैं। शायद इसकी वजह यह है कि राजनेताओं के बच्चों ने इसमें पहल शुरू कर दी है। ब्रिटेन ने शून्य उत्सर्जन विधेयक पारित किया है। यूरोपीय संघ पेरिस समझौते का पालन नहीं करने वाले देशों से आयात पर भारी कर लगाने की तैयारी कर रहा है। यह देखना होगा कि अगले कुछ वर्षों में इसका क्या असर देखने को मिलता है। संभव है कि ग्रेटा और उनकी पीढ़ी ने पृथ्वी को जलवायु परिवर्तन की समस्या से बचाने की लड़ाई में फर्क पैदा करने के लिए पर्याप्त कोशिश की है।
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