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व्यापार नीति के मोर्चे पर जहां के तहां हम

राहुल खुल्लर /  December 18, 2019

बीते पांच वर्षों की बात करें तो व्यापार नीति के मामले में देश वहीं खड़ा है जहां से हमने आगे बढऩे की शुरुआत की थी। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं राहुल खुल्लर

 
देश की अर्थव्यवस्था संकट में है और सरकार का आर्थिक प्रबंधन आलोचकों के निशाने पर है। इन बातों से अविचलित सरकारी अधिकारी बुनियाद मजबूत होने की बात कहते हैं। यदि हम अपने अविश्वास को एक पल के लिए परे कर दें तो भी यह सवाल तो बरकरार है कि आखिर अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने के लिए क्या नीति है? केवल बुनियादी चीजें ठीक होने से बात नहीं बनेगी। वर्ष 2014 के बाद से विदेश व्यापार के लिए समुचित रणनीति का अभाव सबसे ज्यादा महसूस किया जा रहा है। 
 
वर्ष 2004-14 के दौरान सहारा देने वाली एक नीति मौजूद थी: इसके तहत शेष विश्व के साथ आर्थिक एकीकरण को बढ़ावा दिया गया, संरक्षण और शुल्क कम किए गए और उद्योग एवं निर्यात क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया गया। मुक्त व्यापार समझौते और व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौतों की मदद से व्यापार और विदेश नीति के लक्ष्यों को जोड़ा गया। हालांकि सन 2014 तक कुछ उनींदापन आने लगा था। परंतु नीतियों में कोई एकरूपता नहीं थी, सार्थक नीति की तो बात ही छोड़ दें। हां, परोक्ष रूप से दिए जा रहे वक्तव्य और निर्यात संवद्र्घन नीतियों के नाम बदलने का सिलसिला अवश्य जारी था। परंतु इससे कोई नीति तो नहीं बनती। 
 
आंकड़े खुद पूरी कहानी बयां करते हैं। सन 2003-04 से एक दशक तक वाणिज्यिक वस्तुओं का निर्यात और आयात क्रमश: 17.3 फीसदी और 19.1 फीसदी वार्षिक की दर से बढ़ा। सन 2013-14 से अब तक के पांच वर्ष में इनकी वार्षिक वृद्घि दर क्रमश: निर्यात के लिए 0.9 फीसदी और आयात के लिए 2.7 फीसदी रही। महा मंदी के आगमन तक व्यापार का विस्तार हो रहा था और मात्रात्मक राहत ने भी इसमें मदद की। अब आप इसे सही समय पर सही नीति मानें या अच्छी तकदीर यह आप पर है। 
 
इसके उलट बीते पांच वर्ष में सरकार ने मानो विपरीत बाह्य परिस्थितियों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया है। इसमें कितनी सच्चाई है? इन पांच वर्षों में एशिया से होने वाला निर्यात 20 फीसदी बढ़ा। कुछ देशों का प्रदर्शन तो इससे भी बेहतर रहा। बांग्लादेश का वस्त्र निर्यात इस अवधि में 40 फीसदी बढ़ा। अकेले 2018 में मलेशिया और वियतनाम ने क्रमश: 14 प्रतिशत और 15 प्रतिशत की निर्यात वृद्घि दर्ज की। सच कहा जाए तो कोई विदेश व्यापार नीति थी ही नहीं। तेल कीमतों में गिरावट के रूप में अप्रत्याशित लाभ अवश्य मिला। व्यापार संतुलन बढऩे के साथ ही यह धारणा बढ़ी कि बाहरी व्यापार में कोई संकट नहीं है। दुख की बात है कि कुछ बातों का पूर्वानुमान नहीं था। वास्तविक विनिमय दर में इजाफा हुआ और नीतिगत प्रतिक्रिया के अभाव में निर्यात स्थिर हो गया। 
 
मेक इन इंडिया पहल को बढ़ावा देकर विनिर्माण और रोजगार में इजाफा लाने का प्रयास किया गया। दुर्भाग्य से मेक इन इंडिया पहल नारा बनकर रह गई। इससे न तो विनिर्माण को गति मिली और न रोजगार को। जब इसकी शुरुआत हुई थी तब आशंका जताई गई थी कि यह अतीत के आयात प्रतिस्थापन जैसा कदम न साबित हो। दुख की बात है कि हुआ भी ऐसा ही। बीते कुछ वर्षों में संरक्षणवाद में निरंतर इजाफा हुआ है। सबसे पहले 2016 में लोहे और इस्पात की वस्तुओं के लिए न्यूनतम आयात मूल्य तय किया गया। इसके बाद जुलाई और सितंबर 2018 में विभिन्न वस्तुओं का आयात शुल्क बढ़ाया गया। जुलाई 2019 के बजट में स्वर्ण समेत 75 वस्तुओं पर शुल्क बढ़ाया गया। लक्ष्य: घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना। 
 
संक्षेप में कहें तो शुल्क दरों में चरणबद्घ कमी की नीति को उलट दिया गया। ऐसे में भले ही विदेश व्यापार नीति को लेकर कुछ स्पष्ट नहीं कहा गया लेकिन मानसिकता समझी जा सकती है। वाणिज्य मंत्री ने हाल ही में कहा कि लक्ष्य था आयात को कम करके चालू खाते के घाटे पर नियंत्रण करना। व्यापार संतुलन और चालू खाता घाटे का संबंध विनिमय दर और राजकोषीय घाटे से है। घरेलू विसंगति और नीतिगत निष्क्रियता बढ़े हुए चाले खाता घाटे का कारण रही है। बीते पांच वर्ष के दौरान इन नीतिगत विसंगतियों से निपटने के लिए कुछ खास नहीं किया गया। वर्ष 2018-19 में कोयला आयात बिल 26.2 अरब डॉलर का था जो 2013-14 से 60 फीसदी अधिक था। देश के कुल आयात में कोयले की हिस्सेदारी 5 फीसदी है। घरेलू कोयला उत्पादन जरूरतों का 60 फीसदी ही पूरा कर पाता है। उच्च शिक्षा की त्रासदी देखिए कि भारत हर साल विदेशों में उच्च शिक्षा पर 21 अरब डॉलर खर्च करता है। मात्र पांच वर्ष में यह राशि दोगुनी हो चुकी है। इस अवधि में इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं का आयात 70 फीसदी बढ़ा और 2018-19 में यह 56 अरब डॉलर हो गया। औषधि और रसायन क्षेत्र का भी यही किस्सा है।
 
निर्यात और बाहरी क्षेत्र की इस अनदेखी ने प्रतिस्पर्धा, उत्पादकता और सकल घरेलू उत्पाद की वृद्घि तीनों को प्रभावित किया। अब तो नए संकट भी सामने नजर आने लगे हैं। 2011-12 में उच्चतम व्यापार घाटा 190 अरब डॉलर था जो 2018-19 में 184 अरब डॉलर हो गया। यह 2013-14 के 136 अरब डॉलर से बहुत अधिक है। ङ्क्षचता की बात यह है कि महज दो वर्ष में व्यापार संतुलन में 70 फीसदी की गिरावट आई है। दूसरा, शुद्घ तेल आयात 2013-14 में 101 अरब डॉलर था और 2018-19 में यह 94 अरब डॉलर का स्तर पार कर गया। यह 2015-16 से लगभग दोगुना है। तेल कीमतों में कमी के बावजूद हम जहां के तहां हैं। तेल कीमतों में गिरावट का भी हम लाभ न ले सके। तीसरा, वर्ष 2013-14 के बाद के पांच वर्ष में भारतीयों द्वारा विदेशों से भेजे जाने वाले धन में 1.5 फीसदी की वृद्घि हुई है। शुद्घ निवेश आय घाटा इस पांच वर्ष की अवधि में 5.8 फीसदी वार्षिक की दर से बढ़ा। नतीजा: हम अब बाहरी धनप्रेषण पर पहले की तुलना में अधिक निर्भर हैं और चालू खाते के घाटे को प्रबंधनीय स्तर पर रखने के लिए अन्य सेवाओं की बाट जोहनी पड़ रही है। 
 
क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक सहयोग साझेदारी से बाहर निकलने का निर्णय खूब चर्चा में रहा। ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार एक आवश्यकता को विशेषता बताने का प्रयास कर रही है। देखा जाए तो कोई ऐसी विदेश व्यापार नीति अथवा अन्य नीति नहीं हो सकती है जो उपचारात्मक उपायों के माध्यम से घरेलू नीति की विसंगतियों को दूर करने के लिए प्रयास कर सके। अतीत की ओर वापसी असर हम देख ही चुके हैं। 
Keyword: india, economy, trade,,
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