बिजनेस स्टैंडर्ड - टाटा को झटका
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टाटा को झटका

संपादकीय /  December 18, 2019

राष्ट्रीय कंपनी लॉ अपील पंचाट (एनसीएलएटी) ने साइरस मिस्त्री को टाटा संस के चेयरमैन के पद पर बहाल कर दिया है और उनके उत्तराधिकारी एन चंद्रशेखरन की नियुक्ति को अवैध ठहराया है। यह फैसला समूचे टाटा समूह के लिए भारी अनिश्चितता लेकर आएगा और साथ ही व्यापक कारोबारी जगत भी इससे प्रभावित होगा। टाटा संस को पब्लिक से प्राइवेट किए जाने के निर्णय को भी अवैध ठहराया गया और पलट दिया गया। हालांकि निर्णय का क्रियान्वयन चार सप्ताह के बाद किया जाएगा। इस बीच टाटा समूह को यह अवसर दिया गया है कि वह इसका प्रतिवाद कर सके। समूह पर काफी गंभीर आरोप हैं। इनमें अल्पमत अंशधारकों (शापूरजी पलोनजी समूह उनमें से एक है) का दमन, टाटा संस का कुप्रबंधन और मिस्त्री को चेयरमैन पद से हटाने में अनावश्यक हड़बड़ी शामिल है। यदि एनसीएलएटी का निर्णय समुचित मंच पर बरकरार रहा तो नये प्रबंधन द्वारा लिए गए कई अहम निर्णय जांच के दायरे में आ जाएंगे। इससे अनिश्चितता और बढ़ेगी। टाटा समूह की कंपनियों पर इसका तत्काल नकारात्मक असर देखने को मिला।

 
एनसीएलएटी के निर्णय से यह स्पष्ट है कि टाटा संस में कई बदलाव होंगे। टाटा समूह पारंपरिक तौर पर देश में कारोबार शासन के बेहतरीन मानक पेश करता रहा है लेकिन एनसीएलएटी का निर्णय बताता है कि टाटा संस में कई तरह की दिक्कतें थीं। यह समूह के लिए और व्यक्तिगत तौर पर रतन टाटा के लिए बड़ा झटका है। पंचाट ने कहा है कि वे समूह में हस्तक्षेप करने से बचें। मिस्त्री की शिकायत थी कि टाटा के साथ मुद्दों पर चर्चा के लिए निदेशकों ने बोर्ड बैठक बीच में छोड़ दी थी और उन्हें टाटा संस के बोर्ड के बजाय मुद्दों की रिपोर्टिंग अलग से टाटा ट्रस्ट को करनी पड़ती थी। ये दोनों बातें एनसीएलएटी के निर्णय में नजर आईं। ऐसे में यह स्पष्ट है कि टाटा ट्रस्ट और टाटा को टाटा संस में अपनी अभिरुचि को समुचित और पारदर्शी ढंग से प्रबंधित करना होगा। उन्हें इस आरोप का जवाब देना होगा कि होल्डिंग कंपनी का परिचालन कंपनियों में अल्पांश हिस्सेदारी वाला न्यास अहम निर्णय लेता है, न कि परिचालन कंपनियों का बोर्ड अथवा मुख्य कार्याधिकारी। यह प्रबंधन की एजेंसी व्यवस्था का प्रदर्शन है जिसका आधी सदी पहले अंत हो चुका है। टाटा समूह का कॉर्पोरेट ढांचा वैसा ही अस्पष्ट है और टाटा संस की दोतिहाई हिस्सेदारी न्यासों के पास है। इसका आधुनिकीकरण आवश्यक है।
 
बहरहाल, इस निर्णय से चेयरमैन की नियुक्ति और उसे हटाए जाने के बारे में व्यापक प्रश्न उठे हैं। एक ऐसा चेयरमैन जिसने बोर्ड तथा प्रमुख अंशधारकों का भरोसा गंवा दिया है वह कैसे पद पर काम जारी रखेगा? मिस्त्री समूह ने आरोप लगाया था कि चेयरमैन को बिना नोटिस दिए हटाया गया जो अवैध है। परंतु तथ्य तो यह भी है कि टाटा संस के नौ में से सात निदेशकों ने मिस्त्री को हटाने के पक्ष में मत दिया था। उम्मीद की जानी चाहिए कि कार्यपालिका और सर्वोच्च न्यायालय एनसीएलएटी के निर्णय के असर का सावधानी से आकलन करेंगे और जरूरत होने पर उपयुक्त बदलाव करेंगे। पंचाट का यह आकलन पर्याप्त नहीं है कि बहुलांश हिस्सेदारों की मंजूरी से चेयरमैन नियुक्त हो सकता है। अल्पांश धारकों की सहमति की आवश्यकता की बात भी विवादास्पद है। यदि सर्वोच्च न्यायालय इसे पलट नहीं देता तो आम तौर पर कंपनियों पर इस निर्णय के असर के बारे में भी सवाल होना चाहिए। मसलन एनसीएलएटी का जोर है कि अधिसूचना और बिना पंचाट को जानकारी दिए कंपनियों के प्राइवेट होने के बारे में विशिष्ट नियमों के बावजूद, ऐसे मामलों में कंपनी अधिनियम 2013 की मूल आवश्यकताओं का पालन किया जाए। कंपनी मंत्रालय को इस अनिश्चितता को जल्द से जल्द स्पष्ट करना चाहिए। 
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