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विधि का शासन जरूरी बदले का भाव नहीं

श्याम सरन /  December 17, 2019

विधि के शासन को प्रोत्साहित करने के बजाय हैदराबाद में सामूहिक बलात्कार के आरोपियों की हत्या ने देश के सामने एक बदनुमा नजीर पेश कर दी है। बता रहे हैं श्याम सरन

 
बलात्कार के चार संदिग्धों की एक 'मुठभेड़' में हत्या करने वाली हैदराबाद पुलिस की हो रही तारीफों के अश्लील प्रदर्शन के बीच यह सुनना आश्वस्त करता है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश ने इस प्रवृत्ति को लेकर सजग किया है। उन्होंने त्वरित एवं सक्षम न्याय की जरूरत पर बल देने के साथ ही कहा, 'मुझे नहीं लगता है कि न्याय कभी भी झटपट हो सकता है या उसे ऐसा होना चाहिए। न्याय को कभी भी प्रतिशोध का रूप नहीं लेना चाहिए। मेरा मत है कि न्याय अगर प्रतिशोध बन जाता है तो वह न्याय का चरित्र ही खो देता है।'
 
इस बयान को तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव के बयान के बरक्स रखकर देखते हैं। राव ने दावा किया कि 'यह मुठभेड़ पूरे देश के लिए एक संदेश देती है।' उन्होंने मुठभेड़ में संदिग्धों की हत्या को सही ठहराते हुए 'तत्काल कार्रवाई के लिए बन रहे दबाव' की तरफ इशारा किया। उन्होंने कहा कि इस बात पर संदेह था कि अदालती रास्ते से क्या इंसाफ मिल पाएगा? कहा गया कि भारतीय न्यायिक प्रक्रिया लंबे समय तक चलती है। तेलंगाना सरकार ने इस गैरकानूनी कृत्य से खुद को अलग करने की बात तो दूर, सार्वजनिक रूप से इसका श्रेय लेने की भी कोशिश की। मानो मुठभेड़ में मार गिराने की इस घटना को राज्य के राजनीतिक नेतृत्व की मंजूरी हासिल थी। यह दिखावा करने की भी कोशिश नहीं की गई कि सुरक्षाबलों ने आत्मरक्षा में गोली चला दी। आपराधिक न्याय व्यवस्था को प्रभावी बनाने के साथ ही गली-मोहल्लों में पुलिस गतिविधि को भी अधिक असरदार बनाना होगा। लेकिन इसके लिए जरूरी कड़ी मेहनत एवं त्वरित सुधारों से बचने के लिए मनमाने ढंग से सजा देने का तरीका खतरनाक एवं निंदनीय है। आपराधिक न्याय व्यवस्था को कमतर करने वाले तत्त्व भी इसकी कमजोरी के लिए जिम्मेदार हैं। उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2006 में केंद्र एवं राज्य सरकारों को 'पुलिस के कामकाज के लिए दिशानिर्देश जारी करने, पुलिस के प्रदर्शन की समीक्षा करने, ट्रांसफर एवं पोस्टिंग और पुलिस कदाचार की शिकायतों पर कार्रवाई के लिए निकाय बनाने' को कहा था। ये निर्देश अभी तक महज कागज पर ही दर्ज हैं। नेता पुलिस को संरक्षण एवं विरोधियों को निशाना बनाने के साधन के तौर पर देखते हैं। न केवल पुलिस बल्कि शासन प्रणाली के भीतर भी पेशेवर रुख एवं जनसेवा की भावना का तेजी से क्षरण हुआ है।
 
भारत की आबादी के अनुपात में यहां पुलिस कर्मचारियों का घनत्व बेहद कम है। स्वीकृत अनुपात प्रति एक लाख आबादी पर 181 पुलिस कर्मियों का है लेकिन वास्तविक अनुपात महज 137 है। संयुक्त राष्ट्र ने पुलिसकर्मियों एवं जनसंख्या का आदर्श मानक 222 रखा हुआ है। पुलिसकर्मियों की गुणवत्ता खराब होने के साथ गिरावट पर है। जिस तेलंगाना में जघन्य बलात्कार एवं हत्या की वारदात हुई हैं, वहां पर पुलिस के 26 फीसदी पद रिक्त हैं जबकि राष्ट्रीय दर 24 फीसदी है। महिलाओं की सुरक्षा पर सबसे ज्यादा शोर मचाने वाले हमारे राजनीतिक नेता खुद ऐसे सुरक्षा घेरे में चलते हैं जिसमें सैकड़ों जवान होते हैं। इनमें कई सांसद भी शामिल हैं जिन पर हत्या एवं बलात्कार जैसे बेहद गंभीर मामले दर्ज हैं। क्या उन्हें इस आधार पर संक्षिप्त न्याय का विषय बनाना चाहिए कि 'भारतीय न्यायिक प्रक्रिया अनंतकाल तक चलती रहेगी?'
 
सार्वजनिक सुरक्षा को सुधारने और कानूनों को लागू करने के बजाय सार्वजनिक गुस्सा कम करने के लिए सभी कानूनी मानकों को परे रखते हुए जानबूझकर एवं मनमाने ढंग से संदिग्धों को मार डाला गया। अगर ऐसे आचरण को राजनीतिक एवं लोकप्रिय स्तर पर वैधता मिल जाती है तो फिर आम नागरिक के पास कोई सुरक्षा ही नहीं रह जाएगी। यह दलील दी जा रही है कि इस मामले में संदिग्धों के दोषी होने को लेकर कोई संदेह नहीं था। अगर ऐसा था तब भी उन्हें निर्धारित प्रक्रिया के बगैर जीवन के अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए था। एक खतरनाक नजीर पेश की जा रही है जो इस देश के सभी नागरिकों को उनके संवैधानिक अधिकारों के मनमाने उल्लंघन की जद में ला देता है। यह उच्चतम न्यायालय के लिए स्वत:संज्ञान लेने का एकदम वाजिब मामला है ताकि मुठभेड़ हत्या में शामिल लोगों और उकसाने वाले नेताओं को न्यायिक प्रक्रिया के दरवाजे पर खड़ा किया जाए।
 
इस तुरंत एवं कठोर 'न्याय' को सही ठहराने के लिए लोकप्रिय भावना और जन आक्रोश का हवाला दिया जाता है। यह भीड़ के शासन का दरवाजा खोल रहा है। ऐसे में राजनीतिक नेतृत्व की जिम्मेदारी बनती है कि वह लोकप्रिय भावना को प्रश्रय देने के बजाय कानून के शासन को सुनिश्चित करे। चुनावी जीत राजनीतिक नेतृत्व को यह विशेषाधिकार देती है कि वह संविधान के शब्दों एवं आत्मा दोनों का ध्यान रखते हुए देश की जनता की सेवा करे। लोकप्रिय मत कानून से ऊंचा नहीं हो सकता है। सदाशयी लोगों ने भी बलात्कार की घटना से पैदा हुए गुस्से और जल्द न्याय नहीं मिलने से उपजी हताशा के चलते मुठभेड़ में की गई हत्या का समर्थन किया है। लेकिन उन्हें थोड़ा पीछे हटकर यह देखने की जरूरत है कि असल में शासन के हर पहलू में हमें नाकाम बनाने वाले लोगों को ही यह अधिकार दिया जा रहा है कि वे नागरिकों को किसी कानूनी सुरक्षा-उपाय के बगैर जीवन के अधिकार से भी वंचित कर सकते हैं।
 
ऐसी सोच दिख रही है कि एक साथी नागरिक को आज जो झेलना पड़ रहा है वह कानून का पालन करने वाले हमारे जैसे लोगों के साथ कभी नहीं होगा। जब तक हमारे साथ ऐसा नहीं होता है तब तक यही सोचते रहते हैं। कश्मीर में अपने ही नागरिकों को आजादी से वंचित किए जाने पर तालियां बजाने की अदूरदर्शिता बेहद परेशान करती है। ऐसा हरेक मामला देश के दूसरे हिस्सों में वैसा ही काम दोहराने के लिए नजीर पेश करता है। राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर नागरिकों को प्राप्त मूलभूत अधिकारों पर तर्कसंगत रोक लगाना जरूरी हो सकता है लेकिन यह कौन तय करेगा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में क्या है और पाबंदियों के मामले में कौन सी बात तर्कसंगत है? अगर राज्य मनमाने ढंग से यह काम करता है तो ताकत के बेशर्म इस्तेमाल का दरवाजा खुल जाता है। हालिया मामलों में अदालतें यह बात मानती दिखी हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर राज्य उद्घोषणा के बगैर किसी भी तरह की पाबंदी लगा सकता है। इसके लिए अस्पष्ट आतंकी खतरों या कानून-व्यवस्था के उल्लंघन की आशंका का हवाला दिया जाता है। ठोस सबूतों के आधार पर संदिग्धों को दोषी सिद्ध करना अक्सर इसका मकसद भी नहीं होता है। जांच के दौरान की प्रताडऩा और सुनवाई के दौरान कारावास में रखा जाना अपने-आप में सजा होती है।
 
उच्चतम न्यायालय के प्रांगण में एक बच्चे को आश्रय दे रहीं मदर इंडिया की कांस्य प्रतिमा लगी हुई है। यह बच्चा भारतीय गणराज्य की बाल्यावस्था को प्रतिबिंबित करता है। मदर इंडिया की गोद में कानून की एक खुली किताब भी रखी है। उस पर एक तराजू उकेरा गया है जो न्याय की समानता प्रदर्शित करता है। इसका संदेश पूरी तरह साफ है: एक युवा गणराज्य को एक गौरवान्वित एवं स्थायी लोकतंत्र बनने के लिए जरूरी है कि बच्चा कभी भी देश के कानून से न भटके। सुरक्षा का अहसास देने वाली मां की गोद तभी तक मिलेगी जब तक कानून का सम्मान एवं पालन होता रहेगा। 
 
(लेखक पूर्व विदेश सचिव और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के सीनियर फेलो हैं)
Keyword: supreme court, high court, justice,,
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