बिजनेस स्टैंडर्ड - जलवायु परिवर्तन की दर दुरुस्त करने की पहल
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जलवायु परिवर्तन की दर दुरुस्त करने की पहल

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  December 16, 2019

जलवायु परिवर्तन पर चर्चा का एक और दौर मैड्रिड में संपन्न हुआ है। कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज (सीओपी-25) कुछ मामलों में अलग है। इस बार लगभग आम-सहमति बनी है कि जलवायु परिवर्तन वास्तव में हो रहा है। अब हर कोई यह मानता है कि इस दिशा में काम करने का वक्त हो गया है। अब और हीलाहवाली नहीं चलेगी। तथ्य यह है कि मैड्रिड में कदमों को गलत ठहराने या नाममात्र एवं सस्ते कदम उठाने के तरीके तलाशने को लेकर नए खेल खेले गए। सीओपी-25 सम्मेलन में विश्वसनीय बाजार प्रणाली के विकास को लेकर काफी चर्चा हुई। देशों को कार्बन-तटस्थ या विशुद्ध रूप से शून्य-कार्बन वाला बनाने के लिए ऐसी बाजार प्रणालियां बेहद जरूरी हैं। 
 
यह सब सुनने में काफी अच्छा और बड़ा लग रहा है। लेकिन कहते हैं न कि प्याले से मुंह तक पहुंचने में बहुत कुछ हो सकता है। जलवायु संबंधी वार्ताओं में मैंने यह पाया है कि अक्सर सराहनीय विचार पेचीदा बहसों तक ही सीमित होकर रह जाते हैं। असल में यह रोजमर्रा का काम है। इसका पता आपको तब चलता है जब गुबार थम चुका होता है। मसलन, वर्ष 2015 में पेरिस में संपन्न सीओपी-21 की घटनाओं को लीजिए। उस समय मनोदशा उत्साह से भरपूर थी क्योंकि एक नया समझौता हुआ था। सभी देशों ने उत्सर्जन में कटौती संबंधी प्रतिबद्धता पर सहमति जताई थी। राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित अंशदान (एनडीसी) कहे जाने वाले इन लक्ष्यों तक काफी चर्चा के बाद पहुंचा जा सका था। यह भी तय किया गया था कि एनडीसी का मकसद धरती का तापमान पूर्व-औद्योगिक काल से 1.5 डिग्री सेल्सियस वृद्धि के खतरनाक स्तर से नीचे ही रखना है। लेकिन अब पेरिस की 'सफलता' के भेद खुल रहे हैं। 
 
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की उत्सर्जन अंतराल रिपोर्ट 2019 में कहा गया है कि अगर सभी देश एनडीसी में दर्ज कदमों पर चलते हैं तो वर्ष 2100 तक वैश्विक तापमान में 3.2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो जाएगी। इतना ही नहीं, देश खासकर कार्बन बजट का बेजा इस्तेमाल कर चुके अमीर देश उतना भी नहीं कर रहे हैं जिनके लिए वे हामी भर चुके हैं। मसलन, जर्मनी स्थित संगठन क्लाइमेट ट्रैकर के मुताबिक, अमेरिका, रूस और सऊदी अरब के कदम 4 डिग्री सेल्सियस, चीन एवं जापान के कदम 3-4 डिग्री सेल्सियस और यूरोपीय संघ के भी कदम 2-3 डिग्री सेल्सियस वृद्धि का सबब बनते हैं। इसका मतलब है कि अगर सभी देशों ने उत्सर्जन के इसी स्तर का अनुसरण किया तो इस सदी के अंत तक तापमान 2-4 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा। अब हकीकत पर लौटते हैं। ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन पर काबू पाने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए जा रहे हैं और ऐसा तब हो रहा है जब करोड़ों लोगों को बुनियादी ऊर्जा सुरक्षा मिलने का अब भी इंतजार है।
 
इस हकीकत के बीच विशुद्ध शून्य कार्बन का विचार सुनने में काफी अच्छा लगता है। इसका यह मतलब है कि देश अपने लक्ष्य से नीचे रह जाएंगे। यानी वे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करते रहेंगे लेकिन वे कार्बन के अवशोषण या निपटाने के तरीके निकालेंगे ताकि उनके बही-खाते में उत्सर्जन शुद्ध-शून्य नजर आए। लिहाजा इस कार्बन का अवशोषण कैसे काम करता है? एक, उत्सर्जन योग पेड़ों में मौजूद कार्बन डाई-ऑक्साइड की गणना करेगा कि कितना उत्सर्जन हुआ और कितना अवशोषित हुआ। 
 
फिर ऐसी नई तकनीकें भी हैं जो वातावरण से कई टन कार्बन डाई-ऑक्साइड सोखने और उसे जमीन के भीतर दफनाने का काम करेंगी। इसका यह मतलब होगा कि देश अब न केवल उत्सर्जन में कटौती करने बल्कि प्रसार जारी रखने और फिर सबकी सफाई की योजना बना सकता है। वे दूसरे देशों में कार्बन-अनुकूल परियोजनाओं में निवेश कर क्रेडिट भी खरीद सकते हैं और उसे अपने बही-खाते में उसे जोड़ सकते हैं। यहां पर बाजारों को लेकर चर्चा भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है। यह भी एक तथ्य है कि अफ्रीका या एशिया के सुदूर गांवों में पेड़ लगाना यूरोप या जापान में पेड़ लगाने से कहीं अधिक सस्ता है। हमारी दुनिया में अब भी उत्सर्जन कटौती के सस्ते विकल्प मौजूद हैं। लिहाजा बाजारों को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि कार्बन धमक एवं क्रेडिट के लिए विकासशील देशों में निवेश किया जा सकता है। इन जलवायु परिदृश्यों में काम कर चुके हम जैसे अधिकतर लोगों के लिए ये शब्दावलियां जानी-पहचानी हैं। 
 
वर्ष 1997 के क्योटो समझौते में क्लीन डेवलपमेंट मैकेनिज्म विकासशील देशों में तकनीकी संक्रमण के लिए भुगतान करने के ऐसे ही विचार से शुरू हुआ था लेकिन जल्द ही यह सस्ता एवं पेचीदा होते हुए भ्रष्ट विकास व्यवस्था में तब्दील होता चला गया। पेरिस समझौते के बाद इस बार सभी देशों को घरेलू स्तर पर उत्सर्जन कटौती करनी है। इसलिए अगर भारत अपना सस्ता उत्सर्जन कटौती विकल्प किसी अमीर देश को बेच देता है तो वह उस कटौती स्तर को कैसे हासिल कर पाएगा जिसकी जरूरत इस दुनिया को है? याद रखें कि अमीर एवं गरीब दोनों के लिए ही यह एक बड़ा संकट है क्योंकि तापमान वृद्धि का असर सब पर एक जैसा होगा। सवाल है कि क्या किया जाना चाहिए? शुद्ध-शून्य लक्ष्य तय करने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन इसका उद्देश्य देशों को घरेलू स्तर पर अधिक कदम उठाने के लिए प्रोत्साहित करना और फिर जो कुछ भी बचा हुआ है उसे वैश्विक लेनदेन प्रणालियों के जरिये खरीदने का होना चाहिए। लेकिन इसका मतलब कार्बन बिक्री पर एक आधार मूल्य तय करना है, इस दर से नीचे परियोजनाएं योग्य नहीं हो पाएंगी। 
 
इसका यह मतलब होगा कि विकासशील देशों में केवल उन्हीं परियोजनाओं को फंड मिलेगा जो कायापलट करने वाली हैं। भारत जैसा देश अधिक स्वच्छ भविष्य की तरफ छलांग लगा सकता है। हम पहले प्रदूषण फैलाने और फिर उसकी साफ-सफाई से बच सकते हैं। हम इसी भविष्य की चाह रखते हैं। लेकिन ऐसा होने के लिए जलवायु समझौतों के शब्दों पर अमल करना होगा, केवल बात करने से काम नहीं चलेगा।
 
(लेखिका सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट से संबद्ध हैं) 
Keyword: delhi, pollution, environment, COP 25,
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