बिजनेस स्टैंडर्ड - देश की अर्थव्यवस्था का पतन हो रहा है?
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देश की अर्थव्यवस्था का पतन हो रहा है?

अजित बालकृष्णन /  December 16, 2019

क्या देश की अर्थव्यवस्था में तेजी से गिरावट आ रही है और क्या इसे उबारने के लिए हमें नये तौर तरीके अपनाने होंगे? इन सवालों के  जवाब दे रहे हैं अजित बालकृष्णन

कोई भी समाचार पत्र या वेबसाइट खोलकर देखिए, बुरी खबरों का सिलसिला शुरू हो जाएगा। ऐसा लगता है जैसे एक के बाद एक उद्योग धंधे धराशायी हो रहे हैं। यात्री कार निर्माता, दूरसंचार सेवा प्रदाता, विमानन कंपनियां, छोटे कारोबारों को कर्ज देने वाले बैंक, अचल संपत्ति कारोबारी, विनिर्माण कंपनियां, टेलीविजन प्रसारक और सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की बड़ी निर्यातक कंपनियां तक संकट का सामना कर रही हैं। खबरों की सुर्खियां देखें तो लगता है कि अर्थव्यवस्था के तमाम संकेतक नकारात्मक दिशा में बढ़ रहे हैं। फिर चाहे सकल घरेलू उत्पाद हो, रोजगार दर हो या डॉलर के मुकाबले रुपया हो।

 
लेखक और स्तंभकार अपने राजनीतिक झुकाव के आधार पर यह तय करते हैं कि इस गिरावट के लिए किसे उत्तरदायी ठहराना है: भ्रष्ट कारोबारियों को, मोदी सरकार बिना सोचे विचारे उठाए गए आधुनिकीकृत कदमों मसलन नोटबंदी, वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) और इलेक्ट्रिक कार पर जोर देने को या हताश वित्त मंत्री द्वारा देश के कारोबारियों पर अकल्पनीय रूप से गलत कर लगाने को, दुनिया पर दबदबा कायम करने की चीन की महत्त्वाकांक्षा को या डॉनल्ड ट्रंप और अमेरिका के नये संरक्षणवादी रुख को।  
 
इस हताश करने वाले माहौल के लिए जो हल सुझाए जा रहे हैं वे इस प्रकार हैं: बैंक ब्याज दरों में कमी करना, मुद्रास्फीति में कमी लाना और घाटे में चल रहे सरकारी उपक्रमों को बेचना। ये सारे उपाय सन 1960 के दशक के लता मंगेशकर तथा मोहम्मद रफी द्वारा गाये युगल गीत की याद दिलाते हैं। यहां हमें रुककर इस बात पर विचार करना होगा कि क्या इन गिरावट वाले रुझानों में कहीं कोई अंत:संबंध हैं। क्या कार पार्किंग की जगह की कमी और शहरों में अत्यधिक भीड़भाड़ वाले मार्गों की वजह से बड़ी तादाद में लोगों ने कार खरीदना कम कर दिया है? क्या इसकी वजह से कारों की बिक्री में कमी आ रही है और कार निर्माता तथा उनके कलपुर्जों का उत्पादन करने वाली कंपनियां उत्पादन कम कर रही हैं और लोगों को काम से हटा रही हैं? क्या इसकी वजह से ही कार डीलरों, पेट्रोल पंप, मरम्मत करने वालों और कार के लिए ऋण देने वाली कंपनियों का कामकाज प्रभावित हो रहा है। क्या इन तमाम वजहों से देश में ऋण का प्रमुख माध्यम मानी जाने वाली गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की हालत इतनी खस्ता है और पूरे देश में कारोबार लडख़ड़ाया हुआ है? यदि यह आंशिक रूप से भी सच है तो क्या हमें नेटवर्क इकनॉमिक्स के उपकरणों का इस्तेमाल करके यह पता लगाने का प्रयास करना चाहिए कि समस्या की जड़ें दरअसल कहां निहित हैं? या फिर क्या संभव है कि मांग और रोजगार की अगली तेजी सेवा क्षेत्र में आएगी? क्या नई तकनीक चिकित्सकों, विधिक शुल्क, बीमा आदि की कीमतों में इतनी कमी लाएगी कि वह शायद मौजूदा मूल्य के 10वें हिस्से के बराबर हो जाए? उदाहरण के लिए क्या किसी सामान्य चिकित्सक के पास आम चिकित्सा जांच 10 रुपये में कराई जा सकती है जिसके लिए आज 600 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। और क्या किसी रिक्शा चालक के पूरे परिवार के लिए संपूर्ण चिकित्सा बीमा बिना किसी सरकारी सब्सिडी के 100 रुपये वार्षिक की दर पर हासिल किया जा सकता है। 
 
तकनीक में यह क्षमता है कि वह इन सेवाओं की मांग में कई गुना इजाफा कर सके। जैसा कि जेम्स बेसेन ने जनवरी 2018 में प्रकाशित राष्ट्रीय आर्थिक शोध ब्यूरो के पर्चा क्रमांक 24,235 में लिखा है, 'पहले के युग में, कपास के वस्त्र की खपत बढ़ी। ऐसा सन 1814 में अमेरिकी टेक्सटाइल यूनिटों में पावर लूम के आगमन के बाद हुआ, स्टील की खपत में तब इजाफा हुआ जब 1856 में अमेरिका में बेसमेर स्टील निर्माण की प्रक्रिया आरंभ हुई, जबकि सन 1913 में हेनरी फोर्ड द्वारा असेंबली लाइन शुरू करने के बाद मोटर वाहनों के निर्माण में तेजी आई।'
 
ऐसा करने के लिए हमें नवाचार को लेकर देश के रुख पर नए सिरे से नजर डालनी होगी। अमेरिका जैसे पूंजीवादी देश में भी नवाचार सरकार समर्थित पहल से आता है। इसे गोपनीय रखा जाता है और अमेरिकी मीडिया व्यक्तिगत तौर पर उद्यमियों को नायक के रूप में पेश करता है। मारियाना मज्जुकाटो की पुस्तक द आंत्रेप्रेन्योरियल स्टेट में राह रोकने वाली अफसरशाही व्यवस्था बनाम जीवंत निजी क्षेत्र के मिथक को खत्म करती हैं। आईटी से लेकर बायोटेक्रॉलजी तक केस स्टडीज के एक पूरे सिलसिले में वह दिखाती हैं कि निजी क्षेत्र केवल तभी निवेश का साहस दिखाता है जब सरकारी क्षेत्र इसमें भी अक्सर रक्षा क्षेत्र उच्च जोखिम वाला निवेश करता है। वह एक अध्याय में बताते हैं कि कैसे आईफोन को स्मार्ट बनाने वाली की तकनीक अमेरिकी रक्षा विभाग द्वारा फंड की गई और निजी कंपनी द्वारा उसे अंजाम दिया गया। भारत इस क्षेत्र में बुरी तरह नाकाम है। रक्षा क्षेत्र की फंडिंग सरकारी शोध संस्थानों के माध्यम से होती है जहां वैज्ञानिक अफसरशाहों की तरह बैठक करते हैं और प्रेस विज्ञप्तियां जारी करते हैं। नवाचार तो काफी पहले बंद हो चुका है। जब तक इस दिक्कत को दूर नहीं किया जाता, भारत के नए उद्योगों में रोजगार पैदा करने और दुनिया में अग्रणी होने की संभावना कम है।
 
असल बात यह है कि भारत के लिए वक्त आ गया है कि वह नई औद्योगिक नीति तैयार करे जो पूरी तरह सरकारी या निजी के बजाय बीच का कोई समझदारी भरा रास्ता अपनाए। फ्रेड ब्लॉक का 2008 का पर्चा स्विमिंग अगेंस्ट द करेंट: द राइज ऑफ द हिडेन डेवलपमेंट स्टेट इन द यूनाइटेड स्टेट्स में इस बारे में बात करता है और कहता है कि हमें आर्थिक नीति के लिए ऐसा एजेंडा बनाना होगा जो बीच का समझदारी भरा रास्ता अपनाए। औद्योगिक नीति में बदलाव की इस आवश्यकता को अतीत के उन दिनों को वापस लाने की बात नहीं समझा जाना चाहिए जब अर्थव्यवस्था पर राज्य का दबदबा था। बल्कि कहने का अर्थ यह है कि तेज तकनीकी बदलाव एक हकीकत है और कारोबारी अर्थव्यवस्था में इस बदलाव को बढ़ावा देने में सरकार की अहम भूमिका होनी चाहिए। जैसा कि ब्लॉक कहते हैं इसके लिए ऐसी औद्योगिक नीति चाहिए जहां सरकारी अधिकारी तकनीकविदों से मशविरा करें और तकनीकी चुनौतियों का पता लगाएं। इसका निस्तारण पूरी तरह नए उद्योगों को सामने लाएगा। ब्याज दरों के साथ छेड़छाड़, मुद्रास्फीति को निशाना बनाने या सब्सिडी से कोई कोई सहायता नहीं मिलने वाली। 
Keyword: india, economy, GDP, GST,,
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