बिजनेस स्टैंडर्ड - क्यों क्रांतिकारी कदम है फास्टैग
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क्यों क्रांतिकारी कदम है फास्टैग

शुभमय भट्टाचार्य /  12 15, 2019

बदलाव की राह

बिजनेस स्टैंडर्ड क्यों क्रांतिकारी कदम है फास्टैगसड़क क्षेत्र में भारत का तीसरा बड़ा प्रयोग तीन साल से भी कम समय में दिसंबर में शुरू हो गया है। हालांकि राष्ट्रीय राजमार्गों के टोल प्लाजा पर फास्टैग को अनिवार्य रूप से लागू करने की अंतिम तिथि 15 दिसंबर थी, लेकिन सरकार ने लोगों को थोड़ी रियायत दी है। सरकार ने कहा है कि टोल प्लाजा पर कम से कम 75 फीसदी लेन को इलेक्ट्रॉनिक टोल संग्रह फास्टैग का इस्तेमाल करना होगा। सड़क एवं परिवहन मंत्रालय ने कहा है कि राष्ट्रीय राजमार्ग टोल प्लाजा पर 25 फीसदी तक फास्टैग लेन को एक महीने के लिए हाइब्रिड लेन बनाया जा सकता है। इसका मतलब है कि वे 15 जनवरी तक नकदी स्वीकार करेंगे, लेकिन वाहनों से जुर्माने के तौर पर दोगुना टोल वसूला जाएगा। हालांकि लोग अब भी फास्टैग खरीद सकते हैं। 

एक साल पहले देश में वाहनों के लिए एक वर्ष की बीमा नीति से बहुवार्षिक नीति की योजना लागू की गई थी। अगले साल अप्रैल से देश में बिकने वाले हर नए वाहन को कड़े बीएस-छह उत्सर्जन मानकों का पालन करना होगा।  इस दौरान नियमों में कई और बदलाव किए गए जैसे ड्राइविंग लाइसेंस के नियमों को सख्त बनाया गया और यातायात नियमों का उल्लंघन करने पर जुर्माने में भारी बढ़ोतरी की गई।

कुल मिलाकर देश में राजमार्गों पर वाहन चलाने के नियमों में पहले कभी भी इतने कम समय में इतने अधिक बदलाव नहीं हुए थे। इनमें से सभी वाहनों पर फास्टैग लगाने की योजना क्रांतिकारी साबित हो सकती है। इसके तहत सभी वाहनों पर रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन (आरएफआईडी) चिप लगाए जाएंगे। हालांकि दिसंबर 2017 के बाद से शोरूम से बाहर आने वाले हर वाहन पर ये उपकरण लगाए जा रहे हैं लेकिन ये केवल सजावटी बनकर रह गए थे। पुराने वाहनों की विंडस्क्रीन पर यह चिप लगानी होगी।

लेकिन 1 दिसंबर से यह चिप सक्रिय हो गई है। अब केवल इसी चिप से टोल का भुगतान किया जा सकता है। 15 दिसंबर से जिन वाहनों पर यह चिप नहीं होगी, उन्हें टोल की राशि से दोगुना जुर्माना देना होगा। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के एक सूत्र ने कहा, 'सरकार जुर्माना से पैसा नहीं बनाना चाहती है। इसका मकसद लोगों में इलेक्ट्रॉनिक तरीके से टोल के भुगतान की आदत डालना है।' हर जगह फास्टैग के इस्तेमाल को सुनिश्चित करने के लिए मंत्रालय 2012 से प्रयास कर रहा है। तब उसने इसके लिए एक संयुक्त उपक्रम इंडियन हाइवेज मैनेजमेंट कंपनी लिमिटेड (आईएचएमसीएल) बनाई थी। यह एनएचएआई, बैंक और प्रमुख सड़क निर्माण कंपनियों का संयुक्त उपक्रम है।

आईएचएमसीएल में एनएचएआई की 41.38 फीसदी, निर्माण कंपनियों की 33.81 फीसदी और वित्तीय संस्थानों की 24.81 फीसदी हिस्सेदारी है। देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था अन्य कई चीजों की तरह यह भी नंदन निलेकणी द्वारा लिखी गई रिपोर्ट पर आधारित है। कई प्रयासों के बाद मंत्रालय को उम्मीद है कि इस महीने से देश के राष्ट्रीय राजमार्गों पर टोल संग्रह की व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव आएगा और यह पूरी तरह इलेक्ट्रॉनिक तरीके से वसूला जाएगा। आईएचएमसीएल के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक आशीष शर्मा कहते हैं कि फास्टैग से किसी सड़क पर चलने वाले वाहनों की सटीक संख्या का पता चल सकेगा। उन्होंने कहा, 'इससे टोल-ऑपरेट-ट्रांसफर सड़क परियोजनाओं के लिए बोली लगाने वाली कंपनियों को सटीक आंकड़े मिलेंगे जो उन्हें अभी नहीं मिल रहे हैं। साथ ही इन आंकड़ों से सरकार को भी इन परिसंपत्तियों की बिक्री में बेहतर कीमत मिलेगी।' 

आईएचएमसीएल के आंकड़ों के मुताबिक नंवबर के पहले सप्ताह में फास्टैग के जरिये 72.5 लाख टोल का भुगतान किया गया था। राजस्व के संदर्भ में यह संग्रह 173 करोड़ रुपये से थोड़ा अधिक था। अगर पूरे महीने के लिए यह रुझान देखा जाए तो फास्टैग के जरिये टोल भुगतान की संख्या करीब तीन करोड़ होगी और इससे करीब 700 करोड़ रुपये का राजस्व आएगा। देश में कुल टोल संग्रह में फास्टैग की हिस्सेदारी 30 फीसदी से कम है लेकिन सरकारी सूत्रों के मुताबिक पिछले कुछ सप्ताह में यह संख्या 50 फीसदी पहुंच चुकी है। प्राइसवाटरकूपर्स के एक अध्ययन के मुताबिक अप्रैल 2017 में सभी टोल प्लाजा पर ई-टोल लेनदेन की औसत संख्या करीब 75 लाख थी। 

दुनिया में बहुत पहले से ही राजमार्गों पर टोल के भुगतान के लिए त्वरित, सुगम और नकदीरहित व्यवस्था के रूप में इलेक्ट्रॉनिक टोल का इस्तेमाल किया जा रहा है। दुनिया का पहला इलेक्ट्रॉनिक टोल प्लाजा नॉर्वे में 1986 में शुरू किया गया था। इस शताब्दी के शुरू होने कई देशों ने इस व्यवस्था को अपना लिया था। एशिया में जापान ने 2001 में और चीन ने 2014 में इसे अपनाया था। जाहिर है कि इसमें भी भारत पिछड़ गया था। इसके लिए एक जरूरी शर्त देश में सभी राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित टोल प्लाजा को जोडऩे के लिए एकीकृत केंद्रीय व्यवस्था मुहैया कराना है। भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) के गठन से अब यह संभव हो गया है।  

कैसे काम करता है फास्टैग

यह एक सामान्य प्रौद्योगिकी है जो कुछ ही सेकंड में सिग्नल साझा करने के आठ चरणों से गुजरती है। इसमें फास्टैग जारी करने वाले बैंक, एनपीसीआई द्वारा संचालित नैशनल इलेक्ट्रॉनिक टोल कलेक्शन और टोल गेट शामिल होता है। जब फास्टैग लगी कोई कार टोल प्लाजा की तरफ बढ़ती है तो गेट पर लगा एंटीना टैग की रेडियो फ्रीक्वेंसी को लॉक कर लेता है और संबंधित बैंक को उसकी जानकारी सत्यापित करने के लिए मैसेज भेजता है। बैंक एनपीसीआई स्विच को वाहन की जानकारी को सत्यापित करने को कहता है। अगर दोनों का ब्योरा मेल खाता है तो स्विच बैंक को इस बात की पुष्टिï करता है कि टैग सही है। बैंक फिर टोल की राशि की गणना करता है। बैंक फिर एनपीसीआई स्विच को ग्राहक के फास्टैग से टोल की राशि काटने को कहेगा।

राशि कटने पर बैंक ग्राहक को एसएमएस अलर्ट भेजेगा। अगर निर्धारित समय के भीतर बैंक से जवाब नहीं मिला तो इस लेनदेन को स्वीकार्य माना जाएगा। लेकिन सिग्नल की व्यवस्था अभी पूरी नहीं हुई है। एनपीसीआई स्विच बैंक को सूचित करेगा कि लेनदेन हो चुका है और बैंक इसकी सूचना टोल ऑपरेटर को देगा। 

एनपीसीआई की मौजूदगी से निश्चित है कि कोई भी बैंक फास्टैग जारी कर सकता है। हालांकि अभी केवल 24 बैंकों को ही इसके लिए अधिसूचित किया गया है। लेकिन 10 बैंकों ने ही इसके लिए प्रौद्योगिकी प्लेटफॉर्म की व्यवस्था की है। इनमें ऐक्सिस बैंक, एसबीआई, एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक और पीएनबी शामिल हैं। साफ है कि फास्टैग में वाहन की जानकारी रहती है। इसे एक वाहन से दूसरे वाहन पर नहीं लगाया जा सकता है। ग्राहक इसे अपने बैंक खाते से जोड़कर इसमें पैसा हस्तांतरित कर सकता है या प्रीपेड व्यवस्था अपना सकता है। दोनों मामलों में वे 2.5 फीसदी छूट के हकदार हैं। लेकिन प्रीपेड अकाउंट के साथ समस्या यह है कि ग्राहक को इसे रिचार्ज करना होगा। अगर टैग में पैसा नहीं होगा तो यह टोल प्लाजा पर ब्लैकलिस्ट हो जाएगा और इसे दोबारा शुरू करने के लिए बहुत झंझट है।

Keyword: Fastag, Toll, Trafic, Axis Bank, HDFC bank, ICICI Bank, PNB, Vehicle, Highway, Toll Plaza,
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