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ईपीएफ अंशदान में कटौती अभी अच्छी लगेगी, आगे भारी पड़ेगी

संजय कुमार सिंह /  December 15, 2019

संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों को जल्दी ही कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) में अपना अंशदान घटाने का विकल्प मिल सकता है। अभी उनके मूल वेतन की 12 फीसदी राशि ईपीएफ में जाती है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हाल में सामाजिक सुरक्षा संहिता विधेयक, 2019 को मंजूरी दी है। मीडिया के मुताबिक इसमें कर्मचारियों को ईपीएफ में अंशदान घटाने का विकल्प देने का प्रावधान है। साथ ही श्रम मंत्रालय ने कर्मचारियों को कर्मचारी पेंशन योजना (ईपीएस) से राष्ट्रीय पेंशन योजना (एनसीएस) में जाने की अनुमति वाला प्रावधान भी हटा दिया है।

ईपीएफ अंशदान में कमी
सरकार चाहती है कि वेतन के रूप में कर्मचारियों के हाथ में पास ज्यादा राशि आए ताकि वे ज्यादा खर्च करें और खपत में तेजी आए। इसी के मद्देनजर सरकार यह कदम उठा रही है। विलिस टावर्स वाटसन इंडिया के रिटायरमेंट मामलों के प्रमुख ऋतुव्रत सरकार कहते हैं, 'कम आय और ज्यादा कर्ज वाले युवा कर्मचारियों के लिए यह स्वागतयोग्य कदम हो सकता है।' लेकिन दीर्घावधि में इसमें कई जोखिम हैं। उन्होंने कहा, 'विलिस टावर्स वाटसन द्वारा कराए गए एक अध्ययन के मुताबिक कर्मचारियों को समुचित रिटायरमेंट कोष बनाने के लिए अपने सकल वेतन का कम से कम 20 फीसदी बचाने की जरूरत है। जितनी देर में बचत शुरू करेंगे, उतना ही अधिक आपको बचाना पड़ेगा। कर्मचारियों के पास अभी अनिवार्य सेवानिवृत्ति विकल्प के रूप में केवल ईपीएफ ही है। अगर यह अनिवार्य नहीं होगा तो इस बात की प्रबल आशंका है कि कर्मचारी अपने रिटायरमेंट कोष का लक्ष्य पूरा नहीं कर पाएंगे।' साथ ही ईपीएफ के जरिये बचत बहुत ज्यादा नहीं है। सेबी में पंजीकृत निवेश सलाहकार फर्म पर्सनलफाइनैंसप्लान.इन के संस्थापक दीपेश राघव ने कहा, 'ईपीएफ में कर्मचारी का अंशदान मूल वेतन का 12 फीसदी होता है, न कि पूरे वेतन का। खासकर निजी क्षेत्र में कर्मचारियों के वेतन में कई घटक होते हैं और अक्सर मूल वेतन बहुत अधिक नहीं होता है।' अगर कोई अपना अंशदान कम करता है तो उसे जल्दी से जल्दी फिर से बढ़ाकर 12 फीसदी के स्तर पर पहुंचाना चाहिए। इक्विरस वेल्थ मैनेजमेंट के मुख्य कार्याधिकारी अंकुर माहेश्वरी ने कहा, 'कर्मचारी अगर सक्षम हैं तो उन्हें ईपीएफ में अंशदान घटाने के बजाय स्वैच्छिक भविष्य निधि (वीपीएफ) के जरिये इसे 12 फीसदी से अधिक करना चाहिए।'

पोर्टेबिलिटी योजना हटी
विशेषज्ञों के मुताबिक ईपीएस से एनपीएस में जाने की अनुमति देने की योजना बोझिल और प्रशासनिक रूप से जटिल होती और कर्मचारियों के लिए इसे समझना आसान नहीं होता। सरकार ने कहा, 'इस फैसले से कर्मचारियों के लिए सुगमता कम हो सकती है, खासकर जो वित्तीय रूप से जागरूक हैं और जो ज्यादा रिटर्न पाने के लिए एनपीएस जैसे ज्यादा जोखिमपूर्ण निवेशों में निवेश करना चाहते हैं। कर्मचारियों को अतिरिक्त सेवानिवृत्त विकल्प के लिए ईपीएफ के इतर एनपीएस में निवेश करना चाहिए।'

ईपीएफ के फायदे
ईपीएफ 8.65 फीसदी का ब्याज देता है जो किसी भी ऋण प्रतिभूति के लिए बहुत आकर्षक है। इसमें रिटर्न हर साल बदल सकता है लेकिन इसमें सरकार की गारंटी है। साथ ही इसमें कर में भी छूट है। 

ईपीएफ के नुकसान
ईपीएफ निवेशकों को इक्विटी में भागीदारी की अनुमति नहीं देता है। साथ ही सेवानिवृत्ति के बाद ब्याज से होने वाली आय पर कर लगता है।
ईपीएफ में ढांचागत समस्या भी है। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) अब अपने वृद्घिशील कोष का 15 फीसदी इक्विटी में निवेश करता है। इक्विटी उतारचढ़ाव वाली परिसंपत्ति है लेकिन इसके बावजूद यह निश्चित रिटर्न दे रहा है। राघव ने कहा, 'किसी बिंदु पर यह मुश्किल हो सकता है। आदर्श रूप से निश्चित रिटर्न केवल अपने ऋण निवेश घटक पर ही दिया जाना चाहिए। इक्विटी घटक पर रिटर्न बाजार से जुड़ा होना चाहिए। इस बारे में एक प्रस्ताव था लेकिन इस मोर्चे पर कोई प्रगति नहीं हुई है।'

एनपीएस के फायदे
एनपीएस के तहत निवेशक 75 फीसदी निवेश इक्विटी में कर सकते हैं। इससे दीर्घावधि में रिटर्न बढ़ सकता है। एनपीएस में 0.01 फीसदी निवेश प्रबंधन फीस है जो बहुत कम है। 
एनपीएस को कर में भी छूट दी गई है। धारा 80सी के तहत 1.5 लाख रुपये तक निवेश पर कर छूट ली जा सकती है। धारा 80 सीसीडी (1बी) में भी 50 हजार रुपये तक की अतिरिक्त कर छूट है। जो कॉरपोरेट एनपीएस का हिस्सा हैं वे धारा 80 सीसीडी (2) के तहत अपने नियोक्ता के अंशदान पर मूल वेतन के 10 फीसदी तक कर कटौती का दावा कर सकते हैं। एनपीएस साथ ही आपके पोर्टफोलियो का खुद ब खुद संतुलन करता है जबकि अधिकांश निवेशक ऐसा नहीं करते हैं।

एनपीएस के नुकसान
एनपीएस निवेशक को इसकी कम तरलता बोझिल लग सकती है। निवेशक का पैसा सेवानिवृत्ति तक एक तरह से फंस जाता है। किसी आपात स्थिति में वे अपने अंशदान का केवल 25 फीसदी हिस्सा ही निकाल सकते हैं।
अगर कोई सेवानिवृत्त होने से पहले एनपीएस से निकलना चाहता है तो उसे एकमुश्त राशि के तौर पर कोष का केवल 20 फीसदी हिस्सा ही मिलेगा। 80 फीसदी हिस्सा एन्युटी खरीदने में जाएगा। राधव ने कहा, 'इससे उन लोगों को समस्या हो सकती है जो पहले रिटायर होते हैं।' नौकरी के शुरुआती वर्षों में खरीदी गई एन्युटी के रिटर्न की दर भी कम रहती है। इन नियमों का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि रिटायरमेंट के समय आपको अच्छी खासी राशि मिले, लेकिन अगर किसी को तत्काल पैसों की जरूरत है तो उनके लिए यह अड़चन बन सकती है।  जो लोग लंबे समय तक अपन पैसों को फंसाना नहीं चाहते हैं वे एनपीएस से दूर रह सकते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद आपको कुल कोष के 40 फीसदी राशि से एक एन्युटी खरीदनी पड़ती है। एन्युटी से होने वाली आय पर मामूली आय कर लगता है। माहेश्वरी ने कहा, 'लोग नौकरी के दौरान अपनी आय पर कर देते हैं। सेवानिवृत्ति के एन्युटी से होने वाली आय पर कर लगाने से एनपीएस का आकर्षण कम होता है।' अंत में अगर आपकी ईपीएफ बचत सेवानिवृत्ति कोष के लिए पर्याप्त नहीं है और आप ऐसा उत्पाद चाहते हैं जो मजबूरन बचत वाला अनुशासन प्रदान करे तो आपको एनपीएस का विकल्प चुनना चाहिए।
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