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आईबीसी और पीएमएलए में वर्चस्व की अंतहीन जंग

ईशिता आयान दत्त /  December 15, 2019

दिवालिया समाधान प्रक्रिया को बेहतर बनाने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) में संशोधनों को मंजूरी दी है। यह संशोधन ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (दूसरा संशोधन) विधेयक, 2019 के जरिये किए जाएंगे। इन संशोधनों में सबसे अहम धारा 32बी जोडऩा है जिसमें कॉरपोरेट कर्जदार को पिछले आपराधिक कृत्यों से बचाने का प्रावधान है। सवाल यह है कि क्या इससे दो अतिव्यापी कानूनों धनशोधन रोकथाम कानून (पीएमएलए) और आईबीसी के बीच प्रधानता की लड़ाई खत्म हो जाएगी? विशेषज्ञों को इसे लेकर संदेह है। 

 

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने जिन 12 बड़े गैर निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) को आईबीसी के तहत समाधान के लिए भेजा था, उनमें भूषण पावर ऐंड स्टील भी शामिल थी। राष्ट्रीय कंपनी कानून पंचाट (एनसीएलटी) ने सितंबर की शुरुआत में इसके समाधान को मंजूरी दी थी। एक महीने बाद प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने बैंक धोखाधड़ी के एक मामले में कंपनी की 4,023 करोड़ रुपये की अचल संपत्ति कुर्क कर दी। इस एक घटना ने न केवल बोली जीतने वाली कंपनी जेएसडब्ल्यू स्टील बल्कि तमाम समाधान आवेदकों और ऋणदाताओं को हिलाकर रख दिया। 

इन संशोधनों से सरकार ने अपनी मंशा स्पष्टï कर दी है। आवेदकों और कॉरपोरेट कर्जदार को आपराधिक कार्यवाहियों से बचाने के लिए यह संशोधन किया गया है। साफ है कि इस संशोधन का मकसद दिवालिया समाधान योजना मंजूर होने के बाद किसी कंपनी की संपत्ति को कुर्की या जब्ती से बचाना है। एलऐंडएल में पार्टनर भरत चुग ने कहा, 'इसकी व्यापक परिभाषा तय की गई है और इसके दायरे में पीएमएलए के तहत ईडी द्वारा की गई कुर्की बल्कि अन्य विशेष कानूनों के तहत दूसरी एजेंसियों द्वारा की गई कार्यवाही को भी शामिल किया जा सकता है। इनमें भ्रष्टïाचार रोकथाम कानून और भगोड़ा आर्थिक अपराध कानून शामिल हैं।'

उन्होंने कहा, 'किसी कंपनी के लिए बोली लगा रहे व्यक्ति को यह आश्वासन मिलना चाहिए कि नया प्रबंधन और कंपनी की बाकी परिसंपत्तियां सुरक्षित हैं। कोई भी इसी उम्मीद में कंपनी और परिसंपत्तियों में निवेश करेगा कि उसे अपनेे निवेश का वास्तविक मूल्य मिलेगा।' खेतान ऐंड कंपनी में पार्टनर कुमार सौरभ सिंह ने कहा, 'इस संशोधन से साफ हो गया है कि समाधान योजना को मंजूरी मिलने के बाद परिसंपत्तियों की कुर्की नहीं की जा सकती है, फिर चाहे पीएमएलए के तहत जांच क्यों न चल रही हो जहां किसी असंबद्घ पक्ष को परिसंपत्तियों के हस्तांतरण का मामला हो।' 

लेकिन इसमें एक छोटा पेच है। ईडी और दूसरी प्रवर्तन एजेंसियों को संशोधनों की भावना और मंशा का सम्मान करने की जरूरत है। ईडी वित्त मंत्रालय के तहत एक जांच एजेंसी है जबकि आईबीसी की जिम्मेदारी कंपनी मामलों के मंत्रालय के पास है। पीएमएलए कानून का क्रियान्वयन ईडी करता है और अदालतों में उसका आईबीसी के साथ टकराव चल रहा है। वह आईबीसी को सामान्य कानून के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। विशेष कानून सामान्य कानून पर भारी पड़ता है। कुछ मामलों में ईडी की दलील रही है कि पीएमएलए एक विशेष कानून है क्योंकि यह संदिग्ध संपत्ति और अपराध की आय से जुड़ा है जबकि आईबीसी एक सामान्य कानून है क्योंकि वह कंपनियों को वापस पटरी पर लाने से संबंधित है।  चुग ने कहा, 'दूसरी ओर यह दलील भी रही है कि इन दोनों कानूनों में आईबीसी विशेष कानून है क्योंकि यह बीमार कंपनी को पटरी पर लाने की कोशिश करता है। साथ ही आईबीसी बाद में बनाया गया कानून है और इसका मसौदा बनाते समय और इसे अधिभावी प्रभाव देते समय संसद पूरी तरह पीएमएलए के प्रावधानों से वाकिफ थी।'

आईबीसी में संशोधन जरूरी था लेकिन इससे यह सवाल भी खड़ा होता है कि क्या यह पर्याप्त है? चुग के मुताबिक संदेहों को दूर करने के लिए पीएमएलए में भी संशोधन करके स्थिति को स्पष्ट किया जाना चाहिए। अन्यथा इससे अलग-अलग अदालत अपने-अपने तरीके से इसकी व्याख्या करेगी। 


दिल्ली उच्च न्यायालय ने उपायुक्त, प्रवर्तन निदेशालय दिल्ली बनाम ऐक्सिस बैंक मामले में व्यवस्था दी कि पीएमएलए और आईबीसी में अधिभावी प्रावधान हैं लेकिन दोनों का क्षेत्र अलग है और वे सहअस्तित्व के साथ रह सकते हैं और यह नहीं कहा जा सकता है कि आईबीसी पीएमएलए के प्रावधानों पर भारी पड़ता है। लेकिन उसने कहा कि किसी खास मामले में अगर ऋणदाता का संपत्ति पर प्रामाणिक अधिकार था और उसका संबंधित अपराध से कोई लेनादेना नहीं है तो इसे कुर्की से बाहर किया जा सकता है। 

कारोबार को सुगम बनाने के लिहाज से पीएमएलए पर आईबीसी के वर्चस्व को रोका जाना चाहिए। ऐसा करने के लिए अभियोजक संस्थाओं को समय पर कार्रवाई करनी चाहिए और सरकार की भी यही मंशा लगती है। एमवी किनी ऐंड कंपनी में पार्टनर विदिशा कृष्णन ने कहा कि संशोधन से अभियोजक संस्थाओं पर समाधान योजना के मंजूर होने से पहले अपना काम करने का दबाव बनेगा। उन्होंने कहा, अगर समाधान योजना मंजूर हो गई और नए प्रबंधन ने कार्यभार संभाल लिया और इसके बाद कोई एजेंसी आकर दावा करती है कि कॉरपोरेट कर्जदार की संपत्ति अपराध की आय है तो यह कारोबार के अनुकूल नहीं है। इसलिए समाधान योजना मंजूर होने से पहले यह साबित करना अभियोजक संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि कंपनी की आय अपराध से जुड़ी है। 

अपराध की आय को साबित करना भी बहुत मुश्किल है। क्या इसके लिए कोई समयसीमा निर्धारित की जा सकती है? कृष्णन ने कहा कि इसमें समय लगता है। दुनियाभर में धन शोधन के कई मामले हैं जिसमें अपराध की आया को वसूल करने में कई साल लगे हैं।
Keyword: IBC, code, NCLT, Resolution, RBI, Lender, Resolution Scheme, ARC, SC, Supreme Court, Circular,
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